आल-इमरान · 78/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَإِنَّ مِنْهُمْ لَفَرِيقًا يَلْوُونَ أَلْسِنَتَهُم بِالْكِتَابِ لِتَحْسَبُوهُ مِنَ الْكِتَابِ وَمَا هُوَ مِنَ الْكِتَابِ وَيَقُولُونَ هُوَ مِنْ عِندِ اللَّهِ وَمَا هُوَ مِنْ عِندِ اللَّهِ وَيَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَهُمْ يَعْلَمُونَ ۝٧٨
Wa inna minhum lafaree qany yalwoona alsinatahum bil Kitaabi litahsaboohu minal Kitaab, wa maa huwa minal Kitaabi wa yaqooloon huwa min `indillaahi wa maa huwa min `indillaahi wa yaqooloona `alal laahil kaziba wa hum ya`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
और अहले किताब से बाज़ ऐसे ज़रूर हैं कि किताब (तौरेत) में अपनी ज़बाने मरोड़ मरोड़ के (कुछ का कुछ) पढ़ जाते हैं ताकि तुम ये समझो कि ये किताब का जुज़ है हालॉकि वह किताब का जुज़ नहीं और कहते हैं कि ये (जो हम पढ़ते हैं) ख़ुदा के यहॉ से (उतरा) है हालॉकि वह ख़ुदा के यहॉ से नहीं (उतरा) और जानबूझ कर ख़ुदा पर झूठ (तूफ़ान) जोड़ते हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَرِيقًا: एक गिरोह या समूह।
  • يَلْوُونَ أَلْسِنَتَهُم: अपनी ज़ुबानों को मोड़ते हैं, यानी शब्दों को उनके सही अर्थ से हटाकर बोलते हैं।
  • بِالْكِتَابِ: किताब (तौरात) के मामले में।
  • لِتَحْسَبُوهُ: ताकि तुम उसे समझ लो।
  • مِنَ الْكِتَابِ: किताब (तौरात) का हिस्सा।
  • يَقُولُونَ عَلَى اللهِ الْكَذِبَ: अल्लाह पर झूठ बोलते हैं, यानी अल्लाह की तरफ झूठी बातें जोड़ते हैं।

तफसीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला यहूदियों के एक ऐसे गिरोह का ज़िक्र कर रहा है जो अपनी ज़ुबानों को घुमाकर किताब (तौरात) की आयतों को बदल देते थे। वे ऐसे अल्फाज़ बोलते थे जो असल तौरात में नहीं थे, लेकिन उन्हें इस तरह पेश करते थे कि सुनने वाला समझे कि यही अल्लाह की नाज़िल की हुई किताब है। हालाँकि वह किताब का हिस्सा नहीं था। वे साफ़ तौर पर कहते थे कि "यह अल्लाह की तरफ से है", जबकि वह अल्लाह की तरफ से नहीं था। इस तरह वे जानबूझकर अल्लाह पर झूठ बोलते थे, और उन्हें पूरा यक़ीन था कि वे झूठ बोल रहे हैं। उनका मक़सद दुनियावी फायदा हासिल करना और लोगों को गुमराह करना था। उन्होंने रज्म (पत्थर मारने की सज़ा) की आयत और नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सिफ़तों जैसी चीज़ों को तहरीफ़ (बदलाव) करके छिपाया और उनकी जगह अपनी मनघड़ंत बातें पेश कीं।


फायदे (सबक):

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि अल्लाह के कलाम (किताब) में किसी भी तरह की तहरीफ़ (बदलाव) करना सबसे बड़ा गुनाह है, और यह अल्लाह पर झूठ बोलने के बराबर है।
  2. हमें चाहिए कि हम अपनी ज़ुबान की हिफ़ाज़त करें और कभी भी अल्लाह की तरफ कोई ऐसी बात न जोड़ें जो उसने नहीं कही।
  3. यह आयत हमें सच्चाई पर क़ायम रहने की तरग़ीब देती है, चाहे दुनियावी मुआवज़ा मिले या न मिले। झूठ और धोखे से दुनिया में फायदा हो सकता है, लेकिन आख़िरत में यह बर्बादी का सबब है।
  4. इससे हमें यह भी पता चलता है कि अल्लाह का कलाम (कुरआन) महफूज़ है, और अल्लाह ने इसे हर तहरीफ़ से बचाने का वादा किया है। इसलिए हमें कुरआन को समझकर पढ़ना चाहिए और उसी पर अमल करना चाहिए।
  5. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि इल्म (ज्ञान) रखते हुए जानबूझकर झूठ बोलना और लोगों को गुमराह करना बहुत बड़ा जुर्म है, और अल्लाह के नज़दीक इसकी सज़ा बहुत सख्त है।
🎧 सुनें

📜 आयत 76-80 — आल-इमरान

76بَلَىٰ مَنْ أَوْفَىٰ بِعَهْدِهِ وَاتَّقَىٰ فَإِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ
हाँ (अलबत्ता) जो शख्स अपने एहद को पूरा करे और परहेज़गारी इख्तेयार करे तो बेशक ख़ुदा परहेज़गारों को दोस्त रखता है
77إِنَّ الَّذِينَ يَشْتَرُونَ بِعَهْدِ اللَّهِ وَأَيْمَانِهِمْ ثَمَنًا قَلِيلًا أُولَٰئِكَ لَا خَلَاقَ لَهُمْ فِي الْآخِرَةِ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ اللَّهُ وَلَا يَنظُرُ إِلَيْهِمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
बेशक जो लोग अपने एहद और (क़समे) जो ख़ुदा (से किया था उसके) बदले थोड़ा (दुनयावी) मुआवेज़ा ले लेते हैं उन ही लोगों के वास्ते आख़िरत में कुछ हिस्सा नहीं और क़यामत के दिन ख़ुदा उनसे बात तक तो करेगा नहीं ओर उनकी तरफ़ नज़र (रहमत) ही करेगा और न उनको (गुनाहों की गन्दगी से) पाक करेगा और उनके लिये दर्दनाम अज़ाब है
78وَإِنَّ مِنْهُمْ لَفَرِيقًا يَلْوُونَ أَلْسِنَتَهُم بِالْكِتَابِ لِتَحْسَبُوهُ مِنَ الْكِتَابِ وَمَا هُوَ مِنَ الْكِتَابِ وَيَقُولُونَ هُوَ مِنْ عِندِ اللَّهِ وَمَا هُوَ مِنْ عِندِ اللَّهِ وَيَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
और अहले किताब से बाज़ ऐसे ज़रूर हैं कि किताब (तौरेत) में अपनी ज़बाने मरोड़ मरोड़ के (कुछ का कुछ) पढ़ जाते हैं ताकि तुम ये समझो कि ये किताब का जुज़ है हालॉकि वह किताब का जुज़ नहीं और कहते हैं कि ये (जो हम पढ़ते हैं) ख़ुदा के यहॉ से (उतरा) है हालॉकि वह ख़ुदा के यहॉ से नहीं (उतरा) और जानबूझ कर ख़ुदा पर झूठ (तूफ़ान) जोड़ते हैं
79مَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُؤْتِيَهُ اللَّهُ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ ثُمَّ يَقُولَ لِلنَّاسِ كُونُوا عِبَادًا لِّي مِن دُونِ اللَّهِ وَلَٰكِن كُونُوا رَبَّانِيِّينَ بِمَا كُنتُمْ تُعَلِّمُونَ الْكِتَابَ وَبِمَا كُنتُمْ تَدْرُسُونَ
किसी आदमी को ये ज़ेबा न था कि ख़ुदा तो उसे (अपनी) किताब और हिकमत और नबूवत अता फ़रमाए और वह लोगों से कहता फिरे कि ख़ुदा को छोड़कर मेरे बन्दे बन जाओ बल्कि (वह तो यही कहेगा कि) तुम अल्लाह वाले बन जाओ क्योंकि तुम तो (हमेशा) किताबे ख़ुदा (दूसरो) को पढ़ाते रहते हो और तुम ख़ुद भी सदा पढ़ते रहे हो
80وَلَا يَأْمُرَكُمْ أَن تَتَّخِذُوا الْمَلَائِكَةَ وَالنَّبِيِّينَ أَرْبَابًا ۗ أَيَأْمُرُكُم بِالْكُفْرِ بَعْدَ إِذْ أَنتُم مُّسْلِمُونَ
और वह तुमसे ये तो (कभी) न कहेगा कि फ़रिश्तों और पैग़म्बरों को ख़ुदा बना लो भला (कहीं ऐसा हो सकता है कि) तुम्हारे मुसलमान हो जाने के बाद तुम्हें कुफ़्र का हुक्म करेगा
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अनुवाद — आल-इमरान 78

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Tuesday, August 18, 2026

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