आल-इमरान · 79/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
مَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُؤْتِيَهُ اللَّهُ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ ثُمَّ يَقُولَ لِلنَّاسِ كُونُوا عِبَادًا لِّي مِن دُونِ اللَّهِ وَلَٰكِن كُونُوا رَبَّانِيِّينَ بِمَا كُنتُمْ تُعَلِّمُونَ الْكِتَابَ وَبِمَا كُنتُمْ تَدْرُسُونَ ۝٧٩
Maa kaana libasharin ai yu`tiyahul laahul Kitaaba walhukma wan Nubuwwata summa yaqoola linnaasi koonoo `ibaadal lee min doonil laahi wa laakin koonoo rabbaaniy yeena bimaa kuntum tu`allimoonal Kitaaba wa bimaa kuntum tadrusoon
📖 हिंदी अर्थ
किसी आदमी को ये ज़ेबा न था कि ख़ुदा तो उसे (अपनी) किताब और हिकमत और नबूवत अता फ़रमाए और वह लोगों से कहता फिरे कि ख़ुदा को छोड़कर मेरे बन्दे बन जाओ बल्कि (वह तो यही कहेगा कि) तुम अल्लाह वाले बन जाओ क्योंकि तुम तो (हमेशा) किताबे ख़ुदा (दूसरो) को पढ़ाते रहते हो और तुम ख़ुद भी सदा पढ़ते रहे हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الحُكْم: गहरी समझ, निर्णय करने की शक्ति और धार्मिक ज्ञान।
  • رَبَّانِيِّينَ: ऐसे लोग जो अल्लाह के ज्ञान में गहरे हों, उसकी इबादत करने वाले हों और दूसरों को सीधे रास्ते पर चलने की शिक्षा दें।
  • تُعَلِّمُونَ: तुम दूसरों को सिखाते हो।
  • تَدْرُسُونَ: तुम स्वयं पढ़ते और दोहराते हो।

विस्तृत व्याख्या:

यह आयत उन लोगों की ग़लतफ़हमी को दूर करती है जो यह समझते हैं कि अल्लाह के नबी या रसूल लोगों को अपनी इबादत (पूजा) करने का आदेश देते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि किसी भी इंसान के लिए यह संभव और उचित नहीं है कि अल्लाह उसे किताब (जैसे तौरात, इंजील या कुरआन), गहरा ज्ञान और नबुव्वत (पैग़म्बरी) प्रदान करे, और फिर वह लोगों से कहे कि "तुम मेरी इबादत करो, मुझे अल्लाह के सिवा अपना स्वामी बनाओ।" यह बात पैग़म्बरों की महान शान के बिल्कुल विपरीत है। पैग़म्बर तो केवल अल्लाह की ओर बुलाते हैं।

बल्कि पैग़म्बरों का संदेश यह होता है कि "तुम रब्बानी बनो," यानी ऐसे लोग बनो जो अल्लाह के ज्ञान में गहरे हों, उसकी इबादत को अपना जीवन-लक्ष्य बनाएं, और दूसरों को भी सच्चाई और अच्छाई की शिक्षा दें। यह रब्बानी होने का दर्जा उन्हें मिलता है जो लगातार किताब (अल्लाह की रहमत) को दूसरों को सिखाते हैं और स्वयं भी उसे पढ़ते, दोहराते और उस पर अमल करते हैं। इसका मतलब यह है कि असली बुलंदी अल्लाह की किताब को सीखने, सिखाने और उस पर चलने में है, न कि किसी इंसान को खुदा बनाने में।

शिक्षाएँ और लाभ:

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि इस्लाम में किसी भी इंसान को, चाहे वह कितना ही बड़ा आलिम या पैग़म्बर ही क्यों न हो, पूजा का अधिकार नहीं दिया गया। पूजा केवल अल्लाह की है, और यही तौहीद (एकेश्वरवाद) का मूल सिद्धांत है।
  2. यह आयत हमें बताती है कि विद्वानों और धार्मिक नेताओं का काम लोगों को अपनी ओर नहीं बुलाना है, बल्कि उन्हें अल्लाह की इबादत और उसकी शिक्षाओं की ओर बुलाना है। एक सच्चा विद्वान वही है जो ज्ञान के साथ-साथ अमल भी करे और दूसरों को भी अच्छाई की तरफ प्रेरित करे।
  3. इस आयत में "रब्बानी" बनने की प्रेरणा दी गई है, यानी हमें चाहिए कि हम सिर्फ नाम के मुसलमान न हों, बल्कि अपने ज्ञान और अमल में गहराई पैदा करें, ताकि हम दूसरों के लिए मशाल बन सकें।
  4. यह आयत यह भी सिखाती है कि किताब (कुरआन) को पढ़ना, सिखाना और उस पर चिंतन करना एक बहुत बड़ी नेमत है। यही वह रास्ता है जो इंसान को अल्लाह के करीब लाता है और उसे समाज में एक सम्मानित और उपयोगी इंसान बनाता है।


📜 आयत 77-81 — आल-इमरान

77إِنَّ الَّذِينَ يَشْتَرُونَ بِعَهْدِ اللَّهِ وَأَيْمَانِهِمْ ثَمَنًا قَلِيلًا أُولَٰئِكَ لَا خَلَاقَ لَهُمْ فِي الْآخِرَةِ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ اللَّهُ وَلَا يَنظُرُ إِلَيْهِمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
बेशक जो लोग अपने एहद और (क़समे) जो ख़ुदा (से किया था उसके) बदले थोड़ा (दुनयावी) मुआवेज़ा ले लेते हैं उन ही लोगों के वास्ते आख़िरत में कुछ हिस्सा नहीं और क़यामत के दिन ख़ुदा उनसे बात तक तो करेगा नहीं ओर उनकी तरफ़ नज़र (रहमत) ही करेगा और न उनको (गुनाहों की गन्दगी से) पाक करेगा और उनके लिये दर्दनाम अज़ाब है
78وَإِنَّ مِنْهُمْ لَفَرِيقًا يَلْوُونَ أَلْسِنَتَهُم بِالْكِتَابِ لِتَحْسَبُوهُ مِنَ الْكِتَابِ وَمَا هُوَ مِنَ الْكِتَابِ وَيَقُولُونَ هُوَ مِنْ عِندِ اللَّهِ وَمَا هُوَ مِنْ عِندِ اللَّهِ وَيَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
और अहले किताब से बाज़ ऐसे ज़रूर हैं कि किताब (तौरेत) में अपनी ज़बाने मरोड़ मरोड़ के (कुछ का कुछ) पढ़ जाते हैं ताकि तुम ये समझो कि ये किताब का जुज़ है हालॉकि वह किताब का जुज़ नहीं और कहते हैं कि ये (जो हम पढ़ते हैं) ख़ुदा के यहॉ से (उतरा) है हालॉकि वह ख़ुदा के यहॉ से नहीं (उतरा) और जानबूझ कर ख़ुदा पर झूठ (तूफ़ान) जोड़ते हैं
79مَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُؤْتِيَهُ اللَّهُ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ ثُمَّ يَقُولَ لِلنَّاسِ كُونُوا عِبَادًا لِّي مِن دُونِ اللَّهِ وَلَٰكِن كُونُوا رَبَّانِيِّينَ بِمَا كُنتُمْ تُعَلِّمُونَ الْكِتَابَ وَبِمَا كُنتُمْ تَدْرُسُونَ
किसी आदमी को ये ज़ेबा न था कि ख़ुदा तो उसे (अपनी) किताब और हिकमत और नबूवत अता फ़रमाए और वह लोगों से कहता फिरे कि ख़ुदा को छोड़कर मेरे बन्दे बन जाओ बल्कि (वह तो यही कहेगा कि) तुम अल्लाह वाले बन जाओ क्योंकि तुम तो (हमेशा) किताबे ख़ुदा (दूसरो) को पढ़ाते रहते हो और तुम ख़ुद भी सदा पढ़ते रहे हो
80وَلَا يَأْمُرَكُمْ أَن تَتَّخِذُوا الْمَلَائِكَةَ وَالنَّبِيِّينَ أَرْبَابًا ۗ أَيَأْمُرُكُم بِالْكُفْرِ بَعْدَ إِذْ أَنتُم مُّسْلِمُونَ
और वह तुमसे ये तो (कभी) न कहेगा कि फ़रिश्तों और पैग़म्बरों को ख़ुदा बना लो भला (कहीं ऐसा हो सकता है कि) तुम्हारे मुसलमान हो जाने के बाद तुम्हें कुफ़्र का हुक्म करेगा
81وَإِذْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ النَّبِيِّينَ لَمَا آتَيْتُكُم مِّن كِتَابٍ وَحِكْمَةٍ ثُمَّ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مُّصَدِّقٌ لِّمَا مَعَكُمْ لَتُؤْمِنُنَّ بِهِ وَلَتَنصُرُنَّهُ ۚ قَالَ أَأَقْرَرْتُمْ وَأَخَذْتُمْ عَلَىٰ ذَٰلِكُمْ إِصْرِي ۖ قَالُوا أَقْرَرْنَا ۚ قَالَ فَاشْهَدُوا وَأَنَا مَعَكُم مِّنَ الشَّاهِدِينَ
(और ऐ रसूल वह वक्त भी याद दिलाओ) जब ख़ुदा ने पैग़म्बरों से इक़रार लिया कि हम तुमको जो कुछ किताब और हिकमत (वगैरह) दे उसके बाद तुम्हारे पास कोई रसूल आए और जो किताब तुम्हारे पास उसकी तसदीक़ करे तो (देखो) तुम ज़रूर उस पर ईमान लाना, और ज़रूर उसकी मदद करना (और) ख़ुदा ने फ़रमाया क्या तुमने इक़रार लिया तुमने मेरे (एहद का) बोझ उठा लिया सबने अर्ज़ की हमने इक़रार किया इरशाद हुआ (अच्छा) तो आज के क़ौल व (क़रार के) आपस में एक दूसरे के गवाह रहना
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अनुवाद — आल-इमरान 79

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Tuesday, August 18, 2026

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