अर-रूम · 28/60
अनुवाद उच्चारण — अर-रूम
ضَرَبَ لَكُم مَّثَلًا مِّنْ أَنفُسِكُمْ ۖ هَل لَّكُم مِّن مَّا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُم مِّن شُرَكَاءَ فِي مَا رَزَقْنَاكُمْ فَأَنتُمْ فِيهِ سَوَاءٌ تَخَافُونَهُمْ كَخِيفَتِكُمْ أَنفُسَكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ ۝٢٨
Daraba lakum masalam min anfusikum hal lakum mimmaa malakat aymaanukum min shurakaaa`a fee maa razaqnaakum fa antum feehi sawaaa`un takhaafoonahum kakheefa tikum anfusakum; kazaalika nufassilul Aayaati liqawminy ya`qiloon
📖 हिंदी अर्थ
और हमने (तुम्हारे समझाने के वास्ते) तुम्हारी ही एक मिसाल बयान की है हमने जो कुछ तुम्हे अता किया है क्या उसमें तुम्हारी लौन्डी गुलामों में से कोई (भी) तुम्हारा शरीक है कि (वह और) तुम उसमें बराबर हो जाओ (और क्या) तुम उनसे ऐसा ही ख़ौफ रखते हो जितना तुम्हें अपने लोगों का (हक़ हिस्सा न देने में) ख़ौफ होता है फिर बन्दों को खुदा का शरीक क्यों बनाते हो) अक्ल मन्दों के वास्ते हम यूँ अपनी आयतों को तफसीलदार बयान करते हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ضَرَبَ لَكُم مَّثَلًا – अल्लाह ने तुम्हारे लिए एक मिसाल बयान की।
  • مِنْ أَنفُسِكُمْ – तुम्हारी अपनी ही ज़िंदगी से।
  • مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُم – तुम्हारे ग़ुलाम और लौंडियाँ (जो तुम्हारी मिल्कियत में हों)।
  • شُرَكَاء – हिस्सेदार।
  • تَخَافُونَهُمْ – तुम उनसे डरते हो।
  • كَخِيفَتِكُمْ أَنفُسَكُمْ – जिस तरह तुम अपने बराबर के आज़ाद शरीकों से डरते हो।
  • نُفَصِّلُ الْآيَاتِ – हम निशानियाँ खोलकर बयान करते हैं।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में मुशरिकों को एक ऐसी मिसाल दे रहा है जो उनकी अपनी ज़िंदगी से ली गई है, ताकि वे अपनी ग़लतफ़हमी को ख़ुद महसूस कर सकें। अल्लाह फ़रमाता है: “ऐ मुशरिको! ज़रा अपने ग़ुलामों और लौंडियों को देखो — क्या तुम में से कोई यह पसंद करेगा कि उसका ग़ुलाम उसकी जायदाद में उसका हिस्सेदार बन जाए, और दोनों बराबर हों? क्या तुम अपने ग़ुलामों से उस तरह डरोगे जिस तरह अपने बराबर के आज़ाद शरीकों से डरते हो कि कहीं वे तुम्हारी जायदाद पर क़ब्ज़ा न कर लें?”

यक़ीनन कोई भी अक़्लमंद इंसान अपने ग़ुलाम को अपनी जायदाद में बराबर का हिस्सेदार बनाना पसंद नहीं करेगा। फिर जब तुम अपने ग़ुलाम को अपने बराबर का शरीक बनाना गवारा नहीं करते, तो अल्लाह के बारे में यह कैसे गवारा करते हो कि उसकी मख़लूक़ात में से कोई उसका शरीक हो? अल्लाह तो मालिक है, और सारी मख़लूक़ात उसकी ग़ुलाम हैं। उसकी मिल्कियत में कोई शरीक हो, यह उसकी शान के ख़िलाफ़ है।

अल्लाह तआला इस मिसाल के ज़रिए यह सिखाना चाहता है कि जिस तरह तुम अपने ग़ुलामों को अपने बराबर का दर्जा नहीं देते, उसी तरह अल्लाह की शान के लिए यह कतई मुनासिब नहीं कि उसकी मख़लूक़ात में से कोई उसका शरीक हो। यह एक ऐसी साफ़ और आसान मिसाल है जो हर इंसान की फ़ितरत में बसी हुई है।

फिर अल्लाह फ़रमाता है: “इसी तरह हम अपनी आयतों को खोलकर बयान करते हैं उन लोगों के लिए जो अक़्ल से काम लेते हैं।” यानी हम अपनी निशानियों को कई अंदाज़ में, कई मिसालों के साथ पेश करते हैं, ताकि जिन लोगों के दिलों में समझने की सलाहियत है, वे इनसे सबक़ हासिल करें और सीधे रास्ते पर आ जाएँ।


दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की मिल्कियत में शरीक ठहराना कितनी बड़ी नादानी है। जब हम ख़ुद अपने ग़ुलाम को अपने बराबर का दर्जा नहीं देते, तो हमें चाहिए कि हम अल्लाह के साथ किसी को शरीक न ठहराएँ। यह आयत हमारे दिलों में तौहीद की मुहब्बत पैदा करती है और हमें यह एहसास दिलाती है कि अल्लाह ही सब कुछ का मालिक है, और उसकी इबादत ही सच्ची इबादत है। जो लोग अक़्ल से काम लेते हैं, वे इन निशानियों से हिदायत पाते हैं और अपने रब की तरफ़ लौट आते हैं।

🎧 सुनें

📜 आयत 26-30 — अर-रूम

26وَلَهُ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ كُلٌّ لَّهُ قَانِتُونَ
और जो लोग आसमानों में है सब उसी के है और सब उसी के ताबेए फरमान हैं
27وَهُوَ الَّذِي يَبْدَأُ الْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُ وَهُوَ أَهْوَنُ عَلَيْهِ ۚ وَلَهُ الْمَثَلُ الْأَعْلَىٰ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
और वह ऐसा (क़ादिरे मुत्तालिक़ है जो मख़लूकात को पहली बार पैदा करता है फिर दोबारा (क़यामत के दिन) पैदा करेगा और ये उस पर बहुत आसान है और सारे आसमान व जमीन सबसे बालातर उसी की शान है और वही (सब पर) ग़ालिब हिकमत वाला है
28ضَرَبَ لَكُم مَّثَلًا مِّنْ أَنفُسِكُمْ ۖ هَل لَّكُم مِّن مَّا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُم مِّن شُرَكَاءَ فِي مَا رَزَقْنَاكُمْ فَأَنتُمْ فِيهِ سَوَاءٌ تَخَافُونَهُمْ كَخِيفَتِكُمْ أَنفُسَكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ
और हमने (तुम्हारे समझाने के वास्ते) तुम्हारी ही एक मिसाल बयान की है हमने जो कुछ तुम्हे अता किया है क्या उसमें तुम्हारी लौन्डी गुलामों में से कोई (भी) तुम्हारा शरीक है कि (वह और) तुम उसमें बराबर हो जाओ (और क्या) तुम उनसे ऐसा ही ख़ौफ रखते हो जितना तुम्हें अपने लोगों का (हक़ हिस्सा न देने में) ख़ौफ होता है फिर बन्दों को खुदा का शरीक क्यों बनाते हो) अक्ल मन्दों के वास्ते हम यूँ अपनी आयतों को तफसीलदार बयान करते हैं
29بَلِ اتَّبَعَ الَّذِينَ ظَلَمُوا أَهْوَاءَهُم بِغَيْرِ عِلْمٍ ۖ فَمَن يَهْدِي مَنْ أَضَلَّ اللَّهُ ۖ وَمَا لَهُم مِّن نَّاصِرِينَ
मगर सरकशों ने तो बगैर समझे बूझे अपनी नफसियानी ख्वाहिशों की पैरवी कर ली (और ख़ुदा का शरीक ठहरा दिया) ग़रज़ ख़ुदा जिसे गुमराही में छोड़ दे (फिर) उसे कौन राहे रास्त पर ला सकता है और उनका कोई मददगार (भी) नहीं
30فَأَقِمْ وَجْهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفًا ۚ فِطْرَتَ اللَّهِ الَّتِي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَا ۚ لَا تَبْدِيلَ لِخَلْقِ اللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
तो (ऐ रसूल) तुम बातिल से कतरा के अपना रुख़ दीन की तरफ किए रहो यही ख़ुदा की बनावट है जिस पर उसने लोगों को पैदा किया है ख़ुदा की (दुरुस्त की हुई) बनावट में तग़य्युर तबद्दुल (उलट फेर) नहीं हो सकता यही मज़बूत और (बिल्कुल सीधा) दीन है मगर बहुत से लोग नहीं जानते हैं
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अनुवाद — अर-रूम 28

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Tuesday, August 18, 2026

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