अर-रूम · 34/60
अनुवाद उच्चारण — अर-रूम
لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ ۚ فَتَمَتَّعُوا فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ ۝٣٤
Li yakfuroo bimaaa aatainaahum; fatamatta`oo fasawfa ta`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
ताकि जो (नेअमत) हमने उन्हें दी है उसकी नाशुक्री करें ख़ैर (दुनिया में चन्दरोज़ चैन कर लो) फिर तो बहुत जल्द (अपने किए का मज़ा) तुम्हे मालूम ही होगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لِيَكْفُرُوا: ताकि वे कुफ़्रान (नाशुक्री) करें
  • بِمَا آتَيْنَاهُمْ: उस चीज़ के साथ जो हमने उन्हें दी
  • فَتَمَتَّعُوا: तो तुम मज़े कर लो (धमकी के रूप में)
  • فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ: तो अनक़रीब तुम्हें पता चल जाएगा

तफ़सीर (व्याख्या):

जब अल्लाह तआला अपने बंदों पर किसी मुसीबत या तकलीफ़ को दूर करता है और उन्हें राहत व आराम देता है, तो कुछ लोग इस एहसान को भूल जाते हैं और उसकी नाशुक्री करते हैं। वे उन नेमतों का इन्कार करते हैं जो अल्लाह ने उन्हें दीं, और अपनी ज़िंदगी में ऐसे मस्त हो जाते हैं जैसे उन्होंने ये नेमतें अपनी ताक़त से हासिल की हों। यह आयत उन लोगों के बारे में है जो मुसीबत के वक़्त अल्लाह को पुकारते हैं, लेकिन जब अल्लाह उनकी मुसीबत दूर कर देता है, तो वे उसके एहसानों से मुँह मोड़ लेते हैं और शिर्क में पड़ जाते हैं।

अल्लाह तआला उन्हें धमकी और चेतावनी के अंदाज़ में कहता है: "तो तुम मज़े कर लो, जल्द ही तुम्हें अपने इस किए का अंजाम पता चल जाएगा।" यानी यह दुनिया की चंद रोज़ की ख़ुशी है, लेकिन आख़िरत में उन्हें ऐसा अज़ाब मिलेगा जिसका अंदाज़ा वे नहीं लगा सकते। क़यामत के दिन वे अपनी आँखों से देख लेंगे कि वे कितनी बड़ी गुमराही में थे और उनका यह कुफ़्रान उनके लिए कितना घातक साबित हुआ।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की हर नेमत का शुक्र अदा करना चाहिए। जब हम पर कोई मुसीबत आती है और अल्लाह उसे दूर करता है, तो हमें उसका शुक्रिया अदा करना चाहिए और उसकी इबादत में और बढ़ जाना चाहिए। नेमतें पाकर नाशुक्री करना और अल्लाह से बेरुख़ी अपनाना बहुत बड़ी भूल है। अल्लाह तआला बहुत रहम करने वाला है, वह अपने बंदों को मौक़ा देता है, लेकिन उसकी पकड़ बहुत सख्त है। इसलिए हमें चाहिए कि हर हाल में अल्लाह का शुक्रगुज़ार बनें और उसकी नेमतों को पहचानें, ताकि दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी हासिल कर सकें।



📜 आयत 32-36 — अर-रूम

32مِنَ الَّذِينَ فَرَّقُوا دِينَهُمْ وَكَانُوا شِيَعًا ۖ كُلُّ حِزْبٍ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ
जिन्होंने अपने (असली) दीन में तफरेक़ा परवाज़ी की और मुख्तलिफ़ फिरके क़े बन गए जो (दीन) जिस फिरके क़े पास है उसी में निहाल है
33وَإِذَا مَسَّ النَّاسَ ضُرٌّ دَعَوْا رَبَّهُم مُّنِيبِينَ إِلَيْهِ ثُمَّ إِذَا أَذَاقَهُم مِّنْهُ رَحْمَةً إِذَا فَرِيقٌ مِّنْهُم بِرَبِّهِمْ يُشْرِكُونَ
और जब लोगों को कोई मुसीबत छू भी गयी तो उसी की तरफ रुजू होकर अपने परवरदिगार को पुकारने लगते हैं फिर जब वह अपनी रहमत की लज्ज़त चखा देता है तो उन्हीं में से कुछ लोग अपने परवरदिगार के साथ शिर्क करने लगते हैं
34لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ ۚ فَتَمَتَّعُوا فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ
ताकि जो (नेअमत) हमने उन्हें दी है उसकी नाशुक्री करें ख़ैर (दुनिया में चन्दरोज़ चैन कर लो) फिर तो बहुत जल्द (अपने किए का मज़ा) तुम्हे मालूम ही होगा
35أَمْ أَنزَلْنَا عَلَيْهِمْ سُلْطَانًا فَهُوَ يَتَكَلَّمُ بِمَا كَانُوا بِهِ يُشْرِكُونَ
क्या हमने उन लोगों पर कोई दलील नाज़िल की है जो उस (के हक़ होने) को बयान करती है जिसे ये लोग ख़ुदा का शरीक ठहराते हैं (हरग़िज नहीं)
36وَإِذَا أَذَقْنَا النَّاسَ رَحْمَةً فَرِحُوا بِهَا ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ إِذَا هُمْ يَقْنَطُونَ
और जब हमने लोगों को (अपनी रहमत की लज्ज़त) चखा दी तो वह उससे खुश हो गए और जब उन्हें अपने हाथों की अगली कारसतानियो की बदौलत कोई मुसीबत पहुँची तो यकबारगी मायूस होकर बैठे रहते हैं
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अनुवाद — अर-रूम 34

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Tuesday, August 18, 2026

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