अर-रूम · 38/60
अनुवाद उच्चारण — अर-रूम
فَآتِ ذَا الْقُرْبَىٰ حَقَّهُ وَالْمِسْكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ يُرِيدُونَ وَجْهَ اللَّهِ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ ۝٣٨
Fa aati zal qurbaa haqqahoo walmiskeena wabnassabeel; zaalika khairul lil lazeena yureedoona Wajhal laahi wa ulaaa`ika humul muflihoon
📖 हिंदी अर्थ
(तो ऐ रसूल अपनी) क़राबतदार (फातिमा ज़हरा) का हक़ फिदक दे दो और मोहताज व परदेसियों का (भी) जो लोग ख़ुदा की ख़ुशनूदी के ख्वाहॉ हैं उन के हक़ में सब से बेहतर यही है और ऐसे ही लोग आखेरत में दिली मुरादे पाएँगें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ذَا الْقُرْبَىٰ (ज़ल क़ुर्बा) – रिश्तेदार, नातेदार
  • حَقَّهُ (हक़्क़हू) – उसका हक़, उसका अधिकार
  • الْمِسْكِينَ (अल-मिस्कीन) – मोहताज, ज़रूरतमंद
  • ابْنَ السَّبِيلِ (इब्नस-सबील) – मुसाफ़िर, राहगीर जो रास्ते में फँस गया हो
  • وَجْهَ اللَّهِ (वज्हल्लाह) – अल्लाह की रज़ा, अल्लाह का चेहरा (यानी सिर्फ़ अल्लाह की ख़ुशी और उसका सवाब)
  • الْمُفْلِحُونَ (अल-मुफ़्लिहून) – कामयाब लोग, सफलता पाने वाले

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमान वाले! अल्लाह तआला तुम्हें हिदायत देता है कि अपने रिश्तेदारों को उनका हक़ दो – यानी उनके साथ अच्छा सलूक करो, उनकी मदद करो, उनसे नाता जोड़ो और जो कुछ उनका तुम पर हक़ है उसे अदा करो। यह सिर्फ़ ज़कात तक सीमित नहीं, बल्कि हर तरह की नेकी और भलाई शामिल है। इसी तरह मोहताज और ग़रीब लोगों को भी दो जो अपनी ज़रूरत पूरी करने से आजिज़ हैं, और उन मुसाफ़िरों को भी दो जो अपने वतन से दूर रास्ते में फँस गए हैं और उनके पास ख़र्च के लिए कुछ नहीं बचा।

यह देना और यह नेकियाँ उन लोगों के लिए बहुत बेहतर और फ़ायदेमंद हैं जो सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा और उसका सवाब चाहते हैं – न कि लोगों की तारीफ़ या दुनियावी मक़सद। जब इंसान का इरादा ख़ालिस अल्लाह के लिए होता है, तो उसका हर अमल नेकी बन जाता है और अल्लाह उसे बरकत देता है।

और यही लोग – जो रिश्तेदारों के हक़ अदा करते हैं, ग़रीबों की मदद करते हैं, मुसाफ़िरों की दाद-रसी करते हैं, और अपने सारे अमल सिर्फ़ अल्लाह के लिए करते हैं – यही सच्चे कामयाब लोग हैं। उन्हें अल्लाह की तरफ़ से जन्नत का सवाब मिलेगा और वे उसके अज़ाब से महफ़ूज़ रहेंगे। यही असली सफलता है – दुनिया में भी और आख़िरत में भी।

प्यारे भाइयो और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम सिर्फ़ इबादत का नाम नहीं, बल्कि दूसरों के हक़ अदा करने का भी नाम है। जब हम अपने रिश्तेदारों, ग़रीबों और मुसाफ़िरों की मदद करते हैं, तो हम अल्लाह की रज़ा के हक़दार बनते हैं। याद रखिए, जो हाथ देता है वह लेने वाले हाथ से बेहतर है, और अल्लाह उस इंसान की मदद करता है जो दूसरों की मदद करता है। आइए, हम अपनी ज़िंदगी में इन नेकियों को अपनाएँ और अल्लाह की रज़ा और कामयाबी हासिल करें।



📜 आयत 36-40 — अर-रूम

36وَإِذَا أَذَقْنَا النَّاسَ رَحْمَةً فَرِحُوا بِهَا ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ إِذَا هُمْ يَقْنَطُونَ
और जब हमने लोगों को (अपनी रहमत की लज्ज़त) चखा दी तो वह उससे खुश हो गए और जब उन्हें अपने हाथों की अगली कारसतानियो की बदौलत कोई मुसीबत पहुँची तो यकबारगी मायूस होकर बैठे रहते हैं
37أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّ اللَّهَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ
क्या उन लोगों ने (इतना भी) ग़ौर नहीं किया कि खुदा ही जिसकी रोज़ी चाहता है कुशादा कर देता है और (जिसकी चाहता है) तंग करता है-कुछ शक नहीं कि इसमें ईमानरदार लोगों के वास्ते (कुदरत ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं
38فَآتِ ذَا الْقُرْبَىٰ حَقَّهُ وَالْمِسْكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ يُرِيدُونَ وَجْهَ اللَّهِ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
(तो ऐ रसूल अपनी) क़राबतदार (फातिमा ज़हरा) का हक़ फिदक दे दो और मोहताज व परदेसियों का (भी) जो लोग ख़ुदा की ख़ुशनूदी के ख्वाहॉ हैं उन के हक़ में सब से बेहतर यही है और ऐसे ही लोग आखेरत में दिली मुरादे पाएँगें
39وَمَا آتَيْتُم مِّن رِّبًا لِّيَرْبُوَ فِي أَمْوَالِ النَّاسِ فَلَا يَرْبُو عِندَ اللَّهِ ۖ وَمَا آتَيْتُم مِّن زَكَاةٍ تُرِيدُونَ وَجْهَ اللَّهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُضْعِفُونَ
और तुम लोग जो सूद देते हो ताकि लोगों के माल (दौलत) में तरक्क़ी हो तो (याद रहे कि ऐसा माल) ख़ुदा के यहॉ फूलता फलता नही और तुम लोग जो ख़ुदा की ख़ुशनूदी के इरादे से ज़कात देते हो तो ऐसे ही लोग (ख़ुदा की बारगाह से) दूना दून लेने वाले हैं
40اللَّهُ الَّذِي خَلَقَكُمْ ثُمَّ رَزَقَكُمْ ثُمَّ يُمِيتُكُمْ ثُمَّ يُحْيِيكُمْ ۖ هَلْ مِن شُرَكَائِكُم مَّن يَفْعَلُ مِن ذَٰلِكُم مِّن شَيْءٍ ۚ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ
ख़ुदा वह (क़ादिर तवाना है) जिसने तुमको पैदा किया फिर उसी ने रोज़ी दी फिर वही तुमको मार डालेगा फिर वही तुमको (दोबारा) ज़िन्दा करेगा भला तुम्हारे (बनाए हुए ख़ुदा के) शरीकों में से कोई भी ऐसा है जो इन कामों में से कुछ भी कर सके जिसे ये लोग (उसका) शरीक बनाते हैं
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अनुवाद — अर-रूम 38

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Tuesday, August 18, 2026

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