अर-रूम · 53/60
अनुवाद उच्चारण — अर-रूम
وَمَا أَنتَ بِهَادِ الْعُمْيِ عَن ضَلَالَتِهِمْ ۖ إِن تُسْمِعُ إِلَّا مَن يُؤْمِنُ بِآيَاتِنَا فَهُم مُّسْلِمُونَ ۝٥٣
Wa maa anta bihaadil `umyi `an dalaalatihim in tusmi`u illaa mai yuminu bi aayaatinaa fahum muslimoon
📖 हिंदी अर्थ
और न तुम अंधों को उनकी गुमराही से (फेरकर) राह पर ला सकते हो तो तुम तो बस उन्हीं लोगों को सुना (समझा) सकते हो जो हमारी आयतों को दिल से मानें फिर यही लोग इस्लाम लाने वाले हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْعُمْيِ (अंधों): यहाँ से तात्पर्य उन लोगों से है जो हृदय के अंधे हैं, अर्थात सत्य को देखने और समझने की क्षमता से वंचित हैं।
  • ضَلَالَتِهِمْ (उनकी गुमराही): उनका पथभ्रष्ट होना, सत्य मार्ग से भटक जाना।
  • تُسْمِعُ (तुम सुनाते हो): सुनाना जिससे लाभ उठाया जा सके, केवल आवाज़ पहुँचाना नहीं।

विस्तृत व्याख्या:

ऐ न रसूल! आप उन लोगों को हिदायत नहीं दे सकते जिनके दिल अंधे हो गए हैं और जो अपनी गुमराही पर अड़े हुए हैं। जिस प्रकार आँखों से अंधा व्यक्ति रास्ता नहीं देख सकता, उसी प्रकार जिसका दिल अंधा हो गया है, वह सत्य को नहीं पहचान सकता। आपका काम केवल संदेश पहुँचाना है, लेकिन हृदय के अंधों को आप सीधा रास्ता नहीं दिखा सकते।

आपकी आवाज़ केवल उन्हीं लोगों तक प्रभावी होती है जो हमारी आयतों पर ईमान रखते हैं। ये वे लोग हैं जिनके दिल खुले हैं, जो सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। जब वे हमारी निशानियाँ सुनते हैं तो उनके दिल नरम हो जाते हैं और वे अल्लाह के आगे सिर झुका देते हैं। ये लोग पूरी तरह अल्लाह के आज्ञाकारी बन जाते हैं, अपने आपको उसके हवाले कर देते हैं।

याद रखें, हिदायत देना केवल अल्लाह के हाथ में है। आपका कर्तव्य केवल संदेश पहुँचाना है। जो लोग ईमान लाते हैं, वे ही आपकी बात से लाभ उठाते हैं और सीधे मार्ग पर चल पड़ते हैं। यह अल्लाह की कृपा है कि वह जिसे चाहता है समझने की तौफ़ीक़ देता है।

शिक्षाप्रद पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपना ध्यान उन लोगों पर केंद्रित करना चाहिए जो सत्य को सुनने और समझने के लिए तैयार हैं। हमें निराश नहीं होना चाहिए अगर कुछ लोग हमारी बात नहीं मानते। हमारा काम केवल अच्छी तरह से संदेश पहुँचाना है, और परिणाम अल्लाह के हाथ में है। साथ ही, यह हमें यह भी बताती है कि ईमान लाने वाले लोग ही असली कामयाब हैं, क्योंकि वे अल्लाह के आगे पूर्ण समर्पण करते हैं और उसकी राह पर चलते हैं। यही वे लोग हैं जो दुनिया और आख़िरत दोनों में सफल होंगे।

🎧 सुनें

📜 आयत 51-55 — अर-रूम

51وَلَئِنْ أَرْسَلْنَا رِيحًا فَرَأَوْهُ مُصْفَرًّا لَّظَلُّوا مِن بَعْدِهِ يَكْفُرُونَ
और अगर हम (खेती की नुकसान देह) हवा भेजें फिर लोग खेती को (उसी हवा की वजह से) ज़र्द (परस मुर्दा) देखें तो वह लोग इसके बाद (फौरन) नाशुक्री करने लगें
52فَإِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتَىٰ وَلَا تُسْمِعُ الصُّمَّ الدُّعَاءَ إِذَا وَلَّوْا مُدْبِرِينَ
(ऐ रसूल) तुम तो (अपनी) आवाज़ न मुर्दो ही को सुना सकते हो और न बहरों को सुना सकते हो (ख़ुसूसन) जब वह पीठ फेरकर चले जाएँ
53وَمَا أَنتَ بِهَادِ الْعُمْيِ عَن ضَلَالَتِهِمْ ۖ إِن تُسْمِعُ إِلَّا مَن يُؤْمِنُ بِآيَاتِنَا فَهُم مُّسْلِمُونَ
और न तुम अंधों को उनकी गुमराही से (फेरकर) राह पर ला सकते हो तो तुम तो बस उन्हीं लोगों को सुना (समझा) सकते हो जो हमारी आयतों को दिल से मानें फिर यही लोग इस्लाम लाने वाले हैं
54۞ اللَّهُ الَّذِي خَلَقَكُم مِّن ضَعْفٍ ثُمَّ جَعَلَ مِن بَعْدِ ضَعْفٍ قُوَّةً ثُمَّ جَعَلَ مِن بَعْدِ قُوَّةٍ ضَعْفًا وَشَيْبَةً ۚ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ ۖ وَهُوَ الْعَلِيمُ الْقَدِيرُ
खुदा ही तो है जिसने तुम्हें (एक निहायत) कमज़ोर चीज़ (नुत्फे) से पैदा किया फिर उसी ने (तुम में) बचपने की कमज़ोरी के बाद (शबाब की) क़ूवत अता की फिर उसी ने (तुममें जवानी की) क़ूवत के बाद कमज़ोरी और बुढ़ापा पैदा कर दिया वह जो चाहता पैदा करता है-और वही बड़ा वाकिफकार और (हर चीज़ पर) क़ाबू रखता है
55وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يُقْسِمُ الْمُجْرِمُونَ مَا لَبِثُوا غَيْرَ سَاعَةٍ ۚ كَذَٰلِكَ كَانُوا يُؤْفَكُونَ
और जिस दिन क़यामत बरपा होगी तो गुनाहगार लोग कसमें खाएँगें कि वह (दुनिया में) घड़ी भर से ज्यादा नहीं ठहरे यूँ ही लोग (दुनिया में भी) इफ़तेरा परदाज़ियाँ करते रहे
अर-रूमकुरान सूची
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मक्कीRevelation
53आयत

अनुवाद — अर-रूम 53

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Tuesday, August 18, 2026

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