फातिर · 35/45
अनुवाद उच्चारण — फातिर
الَّذِي أَحَلَّنَا دَارَ الْمُقَامَةِ مِن فَضْلِهِ لَا يَمَسُّنَا فِيهَا نَصَبٌ وَلَا يَمَسُّنَا فِيهَا لُغُوبٌ ۝٣٥
Allazeee ahallanaa daaral muqaamati min fadlihee laa yamassunaa feehaa nasabunw wa laa yamassunaa feehaa lughoob
📖 हिंदी अर्थ
जिसने हमको अपने फज़ल (व करम) से हमेशगी के घर (बेहिश्त) में उतारा (मेहमान किया) जहाँ हमें कोई तकलीफ छुयेगी भी तो नहीं और न कोई थकान ही पहुँचेगी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • दारुल-मुक़ामा: वह स्थान जहाँ हमेशा रहना हो, कभी वहाँ से जाना न हो।
  • नसब: थकान, मेहनत और परिश्रम।
  • लुग़ूब: थकावट और कमज़ोरी, जो अत्यधिक परिश्रम के बाद आती है।

तफ़सीर:

यह आयत उन मोमिनों की ज़बानी है जिन्हें अल्लाह तआला ने अपने किताब (क़ुरआन) का वारिस बनाया और उन्हें जन्नत में दाख़िल किया। वे जन्नत में दाख़िल होकर अल्लाह की तारीफ़ करते हुए कहते हैं: "वही अल्लाह जिसने हमें अपने फज़ल और करम से हमेशा रहने की जगह (जन्नत) में उतारा।" यह जगह ऐसी है जहाँ से कभी निकलना नहीं, न मौत है, न बुढ़ापा, न दर्द, न ग़म। यह सब कुछ अल्लाह का ख़ालिस फज़ल है, न कि हमारी किसी क़ाबिलियत या अमल का बदला। अगर अल्लाह की रहमत और मेहरबानी न होती, तो हमारे आमाल इस क़ाबिलियत ही नहीं रखते थे कि हमें इस मुक़ाम तक पहुँचाया जाए।

फिर वे कहते हैं: "इस जन्नत में न हमें कोई थकान छूएगी और न ही कोई मशक़्क़त।" यानी जन्नत की हर नेमत में सुकून और आराम है। वहाँ न दिन की गर्मी है, न रात की सर्दी, न भूख-प्यास का तकलीफ़देह एहसास, न कोई काम करने की थकान, न कोई बीमारी और न ही कमज़ोरी। हर तरफ़ ख़ुशी, सुकून और आराम ही आराम है। यह अल्लाह का वो इनाम है जो उसने अपने नेक बंदों के लिए तैयार किया है।

यह आयत हमें बताती है कि दुनिया की मेहनत-मशक़्क़त और तकलीफ़ें कुछ दिनों की हैं। जो इंसान अल्लाह की राह में सब्र करता है, उसका अंजाम यही है कि उसे ऐसी जगह मिलेगी जहाँ हर तरह की तकलीफ़ से छुटकारा मिलेगा। यही असली कामयाबी है। अल्लाह तआला अपने बंदों से बेपनाह मुहब्बत करता है और चाहता है कि वे उसकी इबादत करें और उसकी राह पर चलें, ताकि उन्हें यह अज़ीमुश्शान इनाम मिले। जन्नत की याद दिलाकर अल्लाह हमें बताता है कि दुनिया की मुश्किलें और परेशानियाँ कुछ दिनों की हैं, और उनके बदले में मिलने वाली नेमतें हमेशा रहने वाली हैं। इसलिए हमें चाहिए कि हम अल्लाह की राह में मेहनत करें, उसकी इबादत में कोई कसर न छोड़ें, और उसकी रहमत से उम्मीद रखें। अल्लाह बड़ा रहम करने वाला और बड़ा एहसान करने वाला है।



📜 आयत 33-37 — फातिर

33جَنَّاتُ عَدْنٍ يَدْخُلُونَهَا يُحَلَّوْنَ فِيهَا مِنْ أَسَاوِرَ مِن ذَهَبٍ وَلُؤْلُؤًا ۖ وَلِبَاسُهُمْ فِيهَا حَرِيرٌ
(और उसका सिला बेहिश्त के) सदा बहार बाग़ात हैं जिनमें ये लोग दाख़िल होंगे और उन्हें वहाँ सोने के कंगन और मोती पहनाए जाएँगे और वहाँ उनकी (मामूली) पोशाक ख़ालिस रेशमी होगी
34وَقَالُوا الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَذْهَبَ عَنَّا الْحَزَنَ ۖ إِنَّ رَبَّنَا لَغَفُورٌ شَكُورٌ
और ये लोग (खुशी के लहजे में) कहेंगे खुदा का शुक्र जिसने हम से (हर क़िस्म का) रंज व ग़म दूर कर दिया बेशक हमारा परवरदिगार बड़ा बख्शने वाला (और) क़दरदान है
35الَّذِي أَحَلَّنَا دَارَ الْمُقَامَةِ مِن فَضْلِهِ لَا يَمَسُّنَا فِيهَا نَصَبٌ وَلَا يَمَسُّنَا فِيهَا لُغُوبٌ
जिसने हमको अपने फज़ल (व करम) से हमेशगी के घर (बेहिश्त) में उतारा (मेहमान किया) जहाँ हमें कोई तकलीफ छुयेगी भी तो नहीं और न कोई थकान ही पहुँचेगी
36وَالَّذِينَ كَفَرُوا لَهُمْ نَارُ جَهَنَّمَ لَا يُقْضَىٰ عَلَيْهِمْ فَيَمُوتُوا وَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُم مِّنْ عَذَابِهَا ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِي كُلَّ كَفُورٍ
और जो लोग काफिर हो बैठे उनके लिए जहन्नुम की आग है न उनकी कज़ा ही आएगी कि वह मर जाए और तकलीफ से नजात मिले और न उनसे उनके अज़ाब ही में तख़फीफ की जाएगी हम हर नाशुक्रे की सज़ा यूँ ही किया करते हैं
37وَهُمْ يَصْطَرِخُونَ فِيهَا رَبَّنَا أَخْرِجْنَا نَعْمَلْ صَالِحًا غَيْرَ الَّذِي كُنَّا نَعْمَلُ ۚ أَوَلَمْ نُعَمِّرْكُم مَّا يَتَذَكَّرُ فِيهِ مَن تَذَكَّرَ وَجَاءَكُمُ النَّذِيرُ ۖ فَذُوقُوا فَمَا لِلظَّالِمِينَ مِن نَّصِيرٍ
और ये लोग दोजख़ में (पड़े) चिल्लाया करेगें कि परवरदिगार अब हमको (यहाँ से) निकाल दे तो जो कुछ हम करते थे उसे छोड़कर नेक काम करेंगे (तो ख़ुदा जवाब देगा कि) क्या हमने तुम्हें इतनी उम्रें न दी थी कि जिनमें जिसको जो कुछ सोंचना समझना (मंज़ूर) हो खूब सोच समझ ले और (उसके अलावा) तुम्हारे पास (हमारा) डराने वाला (पैग़म्बर) भी पहुँच गया था तो (अपने किए का मज़ा) चखो क्योंकि सरकश लोगों का कोई मद्दगार नहीं
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अनुवाद — फातिर 35

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Tuesday, August 18, 2026

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