यासीन · 26/83
अनुवाद उच्चारण — यासीन
قِيلَ ادْخُلِ الْجَنَّةَ ۖ قَالَ يَا لَيْتَ قَوْمِي يَعْلَمُونَ ۝٢٦
Qeelad khulil Jannnah; qaala yaa laita qawmee ya`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
तब उसे खुदा का हुक्म हुआ कि बेहिश्त में जा (उस वक्त भी उसको क़ौम का ख्याल आया तो कहा)

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अनुवाद — Tafsir

قِيلَ ادْخُلِ الْجَنَّةَ ۖ قَالَ يَا لَيْتَ قَوْمِي يَعْلَمُونَ

शब्दों के अर्थ:

  • قِيلَ: कहा गया (यहाँ अर्थ है, अल्लाह की ओर से फ़रिश्तों या सम्मान के साथ कहा गया)
  • ادْخُلِ الْجَنَّةَ: जन्नत में प्रवेश करो
  • يَا لَيْتَ: काश! (पछतावे और इच्छा व्यक्त करने के लिए)
  • قَوْمِي: मेरी क़ौम (मेरे लोग)

तफ़सीर (व्याख्या):

जब उस नेक बंदे को उसकी क़ौम ने शहीद कर दिया, तो अल्लाह तआला ने उसे सम्मानित करते हुए कहा: "जन्नत में प्रवेश करो।" यह उसके लिए सबसे बड़ा सम्मान और इनाम था—शहादत के बाद सीधे जन्नत का दरवाज़ा।

जब वह जन्नत में दाख़िल हुआ और वहाँ की नेमतों, सुख-शांति और अल्लाह की करीमी को अपनी आँखों से देखा, तो उसके दिल में अपनी क़ौम के लिए गहरी हमदर्दी और मोहब्बत पैदा हुई। उसने कहा: "काश! मेरी क़ौम को यह पता होता!" उसकी यह आरज़ू इसलिए थी कि उसकी क़ौम यह जान लेती कि अल्लाह ने उसे कितनी बड़ी नेमत दी है, उसके गुनाह माफ़ कर दिए हैं और उसे जन्नत से नवाज़ा है। अगर उन्हें यह इल्म होता, तो शायद वे भी ईमान ले आते और उसी तरह की कामयाबी हासिल कर लेते।

यहाँ से हमें एक बहुत बड़ा सबक मिलता है: एक सच्चा मोमिन अपनी क़ौम की हिदायत के लिए हमेशा फ़िक्रमंद रहता है, चाहे उसे उनकी तरफ़ से कितना ही ज़ुल्म क्यों न सहना पड़े। वह अपनी निजी कामयाबी पर खुश नहीं होता, बल्कि दूसरों की भलाई की तमन्ना रखता है।

यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह तआला अपने नेक बंदों को किस तरह सम्मानित करता है और उनकी कुर्बानियों का अज्र देता है। साथ ही, यह हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने दिलों में दूसरों की हिदायत की तमन्ना रखनी चाहिए और अपने अच्छे अमल से दूसरों को राह दिखानी चाहिए। कितना खूबसूरत है वह इंसान जो जन्नत में पहुँचकर भी अपनी क़ौम को भूलता नहीं और उनकी भलाई की दुआ करता है!

यह क़िस्सा हमें यक़ीन दिलाता है कि अल्लाह की राह में कुर्बानी देने वालों का अंजाम कभी बुरा नहीं होता। चाहे दुनिया में उन्हें तकलीफ़ दी जाए, लेकिन आख़िरत में उनका मुक़ाम बुलंद होता है। हमें भी चाहिए कि हम अपने ईमान पर मज़बूती से क़ायम रहें और अल्लाह की राह में किसी भी कुर्बानी से पीछे न हटें।



📜 आयत 24-28 — यासीन

24إِنِّي إِذًا لَّفِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
(अगर ऐसा करूँ) तो उस वक्त मैं यक़ीनी सरीही गुमराही में हूँ
25إِنِّي آمَنتُ بِرَبِّكُمْ فَاسْمَعُونِ
मैं तो तुम्हारे परवरदिगार पर ईमान ला चुका हूँ मेरी बात सुनो और मानो; मगर उन लोगों ने उसे संगसार कर डाला
26قِيلَ ادْخُلِ الْجَنَّةَ ۖ قَالَ يَا لَيْتَ قَوْمِي يَعْلَمُونَ
तब उसे खुदा का हुक्म हुआ कि बेहिश्त में जा (उस वक्त भी उसको क़ौम का ख्याल आया तो कहा)
27بِمَا غَفَرَ لِي رَبِّي وَجَعَلَنِي مِنَ الْمُكْرَمِينَ
मेरे परवरदिगार ने जो मुझे बख्श दिया और मुझे बुर्ज़ुग लोगों में शामिल कर दिया काश इसको मेरी क़ौम के लोग जान लेते और ईमान लाते
28۞ وَمَا أَنزَلْنَا عَلَىٰ قَوْمِهِ مِن بَعْدِهِ مِن جُندٍ مِّنَ السَّمَاءِ وَمَا كُنَّا مُنزِلِينَ
और हमने उसके मरने के बाद उसकी क़ौम पर उनकी तबाही के लिए न तो आसमान से कोई लशकर उतारा और न हम कभी इतनी सी बात के वास्ते लशकर उतारने वाले थे
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अनुवाद — यासीन 26

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Tuesday, August 18, 2026

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