यासीन · 30/83
अनुवाद उच्चारण — सूरा यासीन
يَا حَسْرَةً عَلَى الْعِبَادِ ۚ مَا يَأْتِيهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ ۝٣٠
Yaa hasratan `alal `ibaad; maa yaateehim mir Rasoolin illaa kaanoo bihee yastahzi `oon
📖 हिंदी अर्थ
हाए अफसोस बन्दों के हाल पर कि कभी उनके पास कोई रसूल नहीं आया मगर उन लोगों ने उसके साथ मसख़रापन ज़रूर किया

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَا حَسْرَةً: अफसोस और पछतावे का उद्गार, जो दिल के दर्द और नदामत को दर्शाता है।
  • عَلَى الْعِبَادِ: बंदों पर, यानी उन लोगों पर जिन्होंने रसूलों को झुठलाया।
  • يَسْتَهْزِئُونَ: मज़ाक उड़ाना, उपहास करना, ठट्ठा करना।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में उन बंदों के उस हाल का ज़िक्र कर रहे हैं जिन्होंने अपने रसूलों को झुठलाया और उनका मज़ाक उड़ाया। यह एक ऐसा दृश्य है जो क़यामत के दिन सामने आएगा, जब ये लोग अपनी आँखों से वह अज़ाब देखेंगे जो उनके इंतज़ार में है। उस वक़्त वे अपने ऊपर अफसोस और पछतावे के मारे चीख़ उठेंगे: "हाय अफसोस! हमने अपने रसूलों की बात क्यों न मानी? हमने उनका मज़ाक क्यों उड़ाया?"

यह अफसोस और नदामत उस दिन उनके किसी काम न आएगी, क्योंकि दुनिया में जब भी अल्लाह का कोई रसूल उनके पास आया, तो उन्होंने उसे झुठलाया और उसका उपहास किया। यह उनकी पुरानी आदत थी—हर नबी के साथ उन्होंने यही सलूक किया। चाहे वह हज़रत नूह हों, हज़रत हूद हों, हज़रत सालेह हों या हज़रत मुहम्मद ﷺ—सबके साथ उन्होंने तकज़ीब और इस्तेहज़ा का रवैया अपनाया।

यह आयत उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो आज भी अल्लाह के दीन का मज़ाक उड़ाते हैं, रसूल ﷺ की सुन्नत पर हँसते हैं, या क़ुरआन की आयतों को ख़ुशी-ख़ुशी ठुकरा देते हैं। अल्लाह तआला फ़रमा रहे हैं कि यह रवैया कोई नई बात नहीं है—यह तो उन लोगों का तरीक़ा रहा है जो हमेशा हिदायत के दुश्मन रहे। लेकिन अंजाम बहुत बुरा है: वह दिन आएगा जब यही लोग अपने हाथ कुतरते हुए कहेंगे, "काश! हमने रसूल का साथ दिया होता।"

इस आयत में हमारे लिए एक सबक़ है कि हम रसूल ﷺ की मुहब्बत को अपने दिलों में बसाएँ, उनकी सुन्नत को अपनाएँ, और कभी भी दीन के मामले में मज़ाक या उपहास का रवैया न अपनाएँ। याद रखें, जो लोग आज हक़ का मज़ाक उड़ाते हैं, वही कल क़यामत के मैदान में सबसे ज़्यादा पछताएँगे। अल्लाह हमें उन लोगों में न बनाए जो रसूलों का मज़ाक उड़ाते हैं, बल्कि हमें उन लोगों में बनाए जो उनकी पैरवी करते हैं और उन पर ईमान लाते हैं। आमीन।



📜 आयत 28-32 — सूरा यासीन

28۞ وَمَا أَنزَلْنَا عَلَىٰ قَوْمِهِ مِن بَعْدِهِ مِن جُندٍ مِّنَ السَّمَاءِ وَمَا كُنَّا مُنزِلِينَ
और हमने उसके मरने के बाद उसकी क़ौम पर उनकी तबाही के लिए न तो आसमान से कोई लशकर उतारा और न हम कभी इतनी सी बात के वास्ते लशकर उतारने वाले थे
29إِن كَانَتْ إِلَّا صَيْحَةً وَاحِدَةً فَإِذَا هُمْ خَامِدُونَ
वह तो सिर्फ एक चिंघाड थी (जो कर दी गयी बस) फिर तो वह फौरन चिराग़े सहरी की तरह बुझ के रह गए
30يَا حَسْرَةً عَلَى الْعِبَادِ ۚ مَا يَأْتِيهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
हाए अफसोस बन्दों के हाल पर कि कभी उनके पास कोई रसूल नहीं आया मगर उन लोगों ने उसके साथ मसख़रापन ज़रूर किया
31أَلَمْ يَرَوْا كَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُم مِّنَ الْقُرُونِ أَنَّهُمْ إِلَيْهِمْ لَا يَرْجِعُونَ
क्या उन लोगों ने इतना भी ग़ौर नहीं किया कि हमने उनसे पहले कितनी उम्मतों को हलाक कर डाला और वह लोग उनके पास हरगिज़ पलट कर नहीं आ सकते
32وَإِن كُلٌّ لَّمَّا جَمِيعٌ لَّدَيْنَا مُحْضَرُونَ
(हाँ) अलबत्ता सब के सब इकट्ठा हो कर हमारी बारगाह में हाज़िर किए जाएँगे
यासीनकुरान सूची
83आयत
मक्कीअवतरण स्थान
30आयत

अनुवाद — यासीन 30

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Thursday, October 1, 2026

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