यासीन · 29/83
अनुवाद उच्चारण — यासीन
إِن كَانَتْ إِلَّا صَيْحَةً وَاحِدَةً فَإِذَا هُمْ خَامِدُونَ ۝٢٩
In kaanat illaa saihatanw waahidatan fa-izaa hum khaamidoon
📖 हिंदी अर्थ
वह तो सिर्फ एक चिंघाड थी (जो कर दी गयी बस) फिर तो वह फौरन चिराग़े सहरी की तरह बुझ के रह गए
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • صَيْحَةً – एक भयानक चीख़ या आवाज़, जो अचानक आ जाए।
  • خَامِدُونَ – बुझ जाने वाले, मृत, जैसे आग बुझकर राख हो जाती है।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला ने उन क़ौमों के अज़ाब का वर्णन किया है जिन्होंने अपने नबियों को झुठलाया। जब उनकी सरकशी और ज़ुल्म हद से बढ़ गया, तो अल्लाह का अज़ाब आया। यह अज़ाब कोई लंबी मुहिम या भारी लड़ाई नहीं थी, बल्कि सिर्फ़ एक ही चीख़ (पुकार) थी — जिब्रील (अलैहिस्सलाम) की एक आवाज़ — और वही आवाज़ उनके लिए तबाही का सबब बन गई।

यानी उनका हाल ऐसा हुआ जैसे कोई आग भड़क रही हो और अचानक पानी डालने से वह बुझ जाए और सिर्फ़ राख रह जाए। उसी तरह वे लोग एक पल में मृत हो गए, उनमें से कोई बचा नहीं, न कोई आह निकली, न कोई हरकत हुई। वे चुपचाप, बेजान होकर गिर पड़े।

यह अल्लाह की क़ुदरत का नमूना है कि वह चाहे तो सबसे बड़ी ताक़त को एक इशारे से मिटा दे। उसे किसी लश्कर या हथियार की ज़रूरत नहीं। जब वह किसी क़ौम की हिदायत से मायूस हो जाता है, तो उसका अज़ाब बहुत जल्दी और बहुत आसान होता है।

इस आयत से हमें सबक़ लेना चाहिए कि अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है। जो लोग नबियों के पैग़ाम को झुठलाते हैं और ज़ुल्म पर अड़े रहते हैं, वे कभी भी अल्लाह के अज़ाब کی زد میں آ سکتے ہیں۔ मोमिन को चाहिए कि वह अल्लाह के हुक्मों पर चले, नबियों की सुनें, और अपनी ज़िंदगी को इस तरह गुज़ारे कि अल्लाह का अज़ाब उस पर न आए। अल्लाह रहम करने वाला है, लेकिन उसका अज़ाब भी बहुत करीब है — जब वह आता है, तो कोई उसे टाल नहीं सकता।

यह भी याद रखें कि अल्लाह की रहमत उसके अज़ाब से पहले है। वह हमें मौका देता है, तौबा का दरवाज़ा खुला रखता है। इसलिए जब तक मौका है, अपनी ज़िंदगी को सुधार लें, अल्लाह की तरफ़ लौट आएं, और उसके दीन को अपनाएं। यही सबसे बड़ी कामयाबी है।

🎧 सुनें

📜 आयत 27-31 — यासीन

27بِمَا غَفَرَ لِي رَبِّي وَجَعَلَنِي مِنَ الْمُكْرَمِينَ
मेरे परवरदिगार ने जो मुझे बख्श दिया और मुझे बुर्ज़ुग लोगों में शामिल कर दिया काश इसको मेरी क़ौम के लोग जान लेते और ईमान लाते
28۞ وَمَا أَنزَلْنَا عَلَىٰ قَوْمِهِ مِن بَعْدِهِ مِن جُندٍ مِّنَ السَّمَاءِ وَمَا كُنَّا مُنزِلِينَ
और हमने उसके मरने के बाद उसकी क़ौम पर उनकी तबाही के लिए न तो आसमान से कोई लशकर उतारा और न हम कभी इतनी सी बात के वास्ते लशकर उतारने वाले थे
29إِن كَانَتْ إِلَّا صَيْحَةً وَاحِدَةً فَإِذَا هُمْ خَامِدُونَ
वह तो सिर्फ एक चिंघाड थी (जो कर दी गयी बस) फिर तो वह फौरन चिराग़े सहरी की तरह बुझ के रह गए
30يَا حَسْرَةً عَلَى الْعِبَادِ ۚ مَا يَأْتِيهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
हाए अफसोस बन्दों के हाल पर कि कभी उनके पास कोई रसूल नहीं आया मगर उन लोगों ने उसके साथ मसख़रापन ज़रूर किया
31أَلَمْ يَرَوْا كَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُم مِّنَ الْقُرُونِ أَنَّهُمْ إِلَيْهِمْ لَا يَرْجِعُونَ
क्या उन लोगों ने इतना भी ग़ौर नहीं किया कि हमने उनसे पहले कितनी उम्मतों को हलाक कर डाला और वह लोग उनके पास हरगिज़ पलट कर नहीं आ सकते
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अनुवाद — यासीन 29

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Tuesday, August 18, 2026

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