यासीन · 68/83
अनुवाद उच्चारण — यासीन
وَمَن نُّعَمِّرْهُ نُنَكِّسْهُ فِي الْخَلْقِ ۖ أَفَلَا يَعْقِلُونَ ۝٦٨
Wa man nu `ammirhu nunakkishu fil-khalq; afalaa ya`qiloon
📖 हिंदी अर्थ
और हम जिस शख्स को (बहुत) ज्यादा उम्र देते हैं तो उसे ख़िलक़त में उलट (कर बच्चों की तरह मजबूर कर) देते हैं तो क्या वह लोग समझते नहीं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نُعَمِّرْهُ (हम उसे दीर्घायु करते हैं) — अर्थात उसकी आयु लंबी कर देते हैं।
  • نُنَكِّسْهُ (हम उसे उलट देते हैं) — अर्थात उसे उसकी प्रारंभिक अवस्था की ओर पलट देते हैं।
  • فِي الْخَلْقِ (सृष्टि/पैदाइश में) — अर्थात शारीरिक और मानसिक संरचना में।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत करीमा अल्लाह तआला की कुदरत और उसकी हिकमत की ओर इशारा करती है। अल्लाह तआला फरमाता है कि जिस व्यक्ति को हम लंबी उम्र देते हैं, उसे हम धीरे-धीरे उसकी प्रारंभिक अवस्था की ओर पलट देते हैं। यानी जैसे बचपन में इंसान कमज़ोर, नासमझ और दूसरों पर निर्भर होता है, उसी तरह बुढ़ापे में भी वह कमज़ोर हो जाता है, उसकी याददाश्त कमज़ोर पड़ जाती है, उसका शरीर निर्बल हो जाता है और वह फिर से दूसरों की मदद का मोहताज बन जाता है। यह अल्लाह की कुदरत का अजीबो-गरीब नमूना है कि इंसान ताकत और समझदारी की पूरी मंज़िल तय करने के बाद फिर से कमज़ोरी और नासमझी की ओर लौट जाता है।

क्या इंसान इस पर विचार नहीं करता? क्या उसकी अक्ल यह नहीं समझती कि जो अल्लाह इंसान को जवानी की ताकत से बुढ़ापे की कमज़ोरी की ओर पलटने की ताकत रखता है, वही अल्लाह उसे मौत के बाद दोबारा ज़िंदा करने पर भी पूरी तरह क़ादिर है? यही वह नुक्ता है जिस पर इस आयत में ज़ोर दिया गया है — कि जिस ख़ुदा ने इंसान को पैदा किया, उसे बड़ा किया, फिर उसे बूढ़ा किया, वह उसे मरने के बाद दोबारा उठाने पर भी ज़रूर क़ादिर है।

यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की ज़िंदगी कभी भी स्थायी नहीं है। यहाँ हर इंसान को एक दिन कमज़ोरी और बुढ़ापे का सामना करना पड़ता है, और आख़िरकार मौत आनी ही है। इसलिए अक्लमंद इंसान वही है जो इस दुनिया को आख़िरत की खेती समझे, और अपनी ज़िंदगी के हर लम्हे को अल्लाह की इबादत और उसकी रज़ा के अनुसार गुज़ारे।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें ग़ौर और फ़िक्र की दावत देती है। जब हम किसी बूढ़े इंसान को देखते हैं, तो यह अल्लाह की कुदरत का नज़ारा होता है। यह हमें याद दिलाता है कि हम भी एक दिन ऐसे ही होंगे। इसलिए अपनी जवानी और ताकत के दिनों में अल्लाह की इबादत और नेक कामों में जुट जाएँ, ताकि जब हम कमज़ोर हों तो हमारे पास अच्छे आमाल का खज़ाना हो। और यह भी याद रखें कि मौत के बाद हमें ज़िंदा होकर अल्लाह के सामने हाज़िर होना है, और वहाँ हर इंसान को उसके कर्मों का बदला मिलेगा। अल्लाह तआला हम सबको सही समझ और अच्छे आमाल की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 66-70 — यासीन

66وَلَوْ نَشَاءُ لَطَمَسْنَا عَلَىٰ أَعْيُنِهِمْ فَاسْتَبَقُوا الصِّرَاطَ فَأَنَّىٰ يُبْصِرُونَ
और अगर हम चाहें तो उनकी ऑंखों पर झाडू फेर दें तो ये लोग राह को पड़े चक्कर लगाते ढूँढते फिरें मगर कहाँ देख पाँएगे
67وَلَوْ نَشَاءُ لَمَسَخْنَاهُمْ عَلَىٰ مَكَانَتِهِمْ فَمَا اسْتَطَاعُوا مُضِيًّا وَلَا يَرْجِعُونَ
और अगर हम चाहे तो जहाँ ये हैं (वहीं) उनकी सूरतें बदल (करके) (पत्थर मिट्टी बना) दें फिर न तो उनमें आगे जाने का क़ाबू रहे और न (घर) लौट सकें
68وَمَن نُّعَمِّرْهُ نُنَكِّسْهُ فِي الْخَلْقِ ۖ أَفَلَا يَعْقِلُونَ
और हम जिस शख्स को (बहुत) ज्यादा उम्र देते हैं तो उसे ख़िलक़त में उलट (कर बच्चों की तरह मजबूर कर) देते हैं तो क्या वह लोग समझते नहीं
69وَمَا عَلَّمْنَاهُ الشِّعْرَ وَمَا يَنبَغِي لَهُ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌ وَقُرْآنٌ مُّبِينٌ
और हमने न उस (पैग़म्बर) को शेर की तालीम दी है और न शायरी उसकी शान के लायक़ है ये (किताब) तो बस (निरी) नसीहत और साफ-साफ कुरान है
70لِّيُنذِرَ مَن كَانَ حَيًّا وَيَحِقَّ الْقَوْلُ عَلَى الْكَافِرِينَ
ताकि जो ज़िन्दा (दिल आक़िल) हों उसे (अज़ाब से) डराए और काफ़िरों पर (अज़ाब का) क़ौल साबित हो जाए (और हुज्जत बाक़ी न रहे)
यासीनकुरान सूची
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अनुवाद — यासीन 68

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सूरा आयत 68/83 — यासीन يس (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: यासीन सुनें, यासीन अनुवाद, यासीन mp3, यासीन pdf. आयत 66–70. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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