अज़-ज़ुमर · 5/75
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुमर
خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِالْحَقِّ ۖ يُكَوِّرُ اللَّيْلَ عَلَى النَّهَارِ وَيُكَوِّرُ النَّهَارَ عَلَى اللَّيْلِ ۖ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ ۖ كُلٌّ يَجْرِي لِأَجَلٍ مُّسَمًّى ۗ أَلَا هُوَ الْعَزِيزُ الْغَفَّارُ ۝٥
Khalaqas samaawaati wal arda bilhaqq; yukawwirul laila `alan nahaari wa yukawwirun nahaara `alaal laili wa sakhkharash shamsa walqamara kulluny yajree li ajalim musammaa; alaa Huwal `Azeezul Ghaffaar
📖 हिंदी अर्थ
उसी ने सारे आसमान और ज़मीन को बजा (दुरूस्त) पैदा किया वही रात को दिन पर ऊपर तले लपेटता है और वही दिन को रात पर तह ब तह लपेटता है और उसी ने आफताब और महताब को अपने बस में कर लिया है कि ये सबके सब अपने (अपने) मुक़रर्र वक्त चलते रहेगें आगाह रहो कि वही ग़ालिब बड़ा बख्शने वाला है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يُكَوِّرُ: लपेटना, उलटना-पलटना। अर्थात् रात को दिन पर लपेट देना और दिन को रात पर लपेट देना, जिससे एक दूसरे की जगह ले लेता है।
  • سَخَّرَ: वश में करना, अधीन करना, नियमित रूप से चलाना।
  • أَجَلٍ مُسَمًّى: एक निश्चित समय, जो इस दुनिया की अवधि है (क़ियामत तक)।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला ने आसमानों और ज़मीन को हक़ (सत्य) के साथ पैदा किया—यानी किसी बेहूदा खेल या मज़ाक के लिए नहीं, बल्कि एक गहरी हिकमत (बुद्धिमत्ता) और बड़े मक़सद के तहत। यह क़ुरआन उन लोगों का जवाब देता है जो यह समझते हैं कि यह कायनात बिना किसी उद्देश्य के बन गई। अल्लाह ने रात और दिन का सिलसिला इस तरह बनाया है कि वह रात को दिन पर लपेट देता है और दिन को रात पर—यानी जब एक आता है, तो दूसरा चला जाता है। यह बदलाव इतना नियमित और सटीक है कि कोई ताक़त इसे रोक नहीं सकती।

फिर अल्लाह ने सूरज और चाँद को वश में कर रखा है—दोनों अपने-अपने नियत मार्ग पर चल रहे हैं, और यह सब कुछ एक निश्चित समय (क़ियामत) तक जारी रहेगा। यह नियमितता और यह व्यवस्था इस बात का सबूत है कि इस कायनात का एक ही निर्माता और संचालक है, जो सब कुछ जानता है और सब पर क़ुदरत रखता है।

इन आयतों पर ग़ौर करने वाले के दिल में अल्लाह की अज़मत (महानता) का एहसास पैदा होता है। जब हम सूरज की रोशनी, चाँद की चांदनी, रात-दिन के इस सुंदर बदलाव को देखते हैं, तो हमें याद आता है कि यह सब उस ज़ात का करिश्मा है जो अल-अज़ीज़ (सब पर ग़ालिब, जिसे कोई हरा नहीं सकता) और अल-ग़फ़्फ़ार (बहुत क्षमा करने वाला) है।

यहाँ एक बहुत ही प्यारी बात है—अल्लाह ने अपनी क़ुदरत के साथ अपनी मग़फ़िरत (क्षमा) का ज़िक्र किया है। यानी जो ज़ात इतनी बड़ी कायनात को चला रही है, वही अपने बंदों की ग़लतियों को माफ़ करने के लिए तैयार है। वह चाहता है कि हम उसकी तरफ़ रुजू करें, उससे तौबा करें, और वह हमारी सारी ग़लतियों को माफ़ कर देगा। यह कितनी बड़ी ख़ुशख़बरी है! जो बंदा इस अज़ीम क़ुदरत को पहचान ले और अपने रब की तरफ़ लौट आए, उसके लिए अल्लाह की रहमत के दरवाज़े हमेशा खुले हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि हम अपने आस-पास की निशानियों पर ग़ौर करें, अल्लाह की क़ुदरत को पहचानें, और अपनी ज़िंदगी को उसी हक़ (सत्य) पर क़ायम करें जिस पर यह कायनात क़ायम है। जब हम अल्लाह के साथ अपना रिश्ता सुधार लेंगे, तो हमारी ज़िंदगी में भी वही निज़ाम और सुकून आएगा जो इस कायनात में है।

🎧 सुनें

📜 आयत 3-7 — अज़-ज़ुमर

3أَلَا لِلَّهِ الدِّينُ الْخَالِصُ ۚ وَالَّذِينَ اتَّخَذُوا مِن دُونِهِ أَوْلِيَاءَ مَا نَعْبُدُهُمْ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَا إِلَى اللَّهِ زُلْفَىٰ إِنَّ اللَّهَ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ فِي مَا هُمْ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي مَنْ هُوَ كَاذِبٌ كَفَّارٌ
आगाह रहो कि इबादत तो ख़ास खुदा ही के लिए है और जिन लोगों ने खुदा के सिवा (औरों को अपना) सरपरस्त बना रखा है और कहते हैं कि हम तो उनकी परसतिश सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि ये लोग खुदा की बारगाह में हमारा तक़र्रब बढ़ा देगें इसमें शक नहीं कि जिस बात में ये लोग झगड़ते हैं (क़यामत के दिन) खुदा उनके दरमियान इसमें फैसला कर देगा बेशक खुदा झूठे नाशुक्रे को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचाया करता
4لَّوْ أَرَادَ اللَّهُ أَن يَتَّخِذَ وَلَدًا لَّاصْطَفَىٰ مِمَّا يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ ۚ سُبْحَانَهُ ۖ هُوَ اللَّهُ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ
अगर खुदा किसी को (अपना) बेटा बनाना चाहता तो अपने मख़लूक़ात में से जिसे चाहता मुन्तखिब कर लेता (मगर) वह तो उससे पाक व पाकीज़ा है वह तो यकता बड़ा ज़बरदस्त अल्लाह है
5خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِالْحَقِّ ۖ يُكَوِّرُ اللَّيْلَ عَلَى النَّهَارِ وَيُكَوِّرُ النَّهَارَ عَلَى اللَّيْلِ ۖ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ ۖ كُلٌّ يَجْرِي لِأَجَلٍ مُّسَمًّى ۗ أَلَا هُوَ الْعَزِيزُ الْغَفَّارُ
उसी ने सारे आसमान और ज़मीन को बजा (दुरूस्त) पैदा किया वही रात को दिन पर ऊपर तले लपेटता है और वही दिन को रात पर तह ब तह लपेटता है और उसी ने आफताब और महताब को अपने बस में कर लिया है कि ये सबके सब अपने (अपने) मुक़रर्र वक्त चलते रहेगें आगाह रहो कि वही ग़ालिब बड़ा बख्शने वाला है
6خَلَقَكُم مِّن نَّفْسٍ وَاحِدَةٍ ثُمَّ جَعَلَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَأَنزَلَ لَكُم مِّنَ الْأَنْعَامِ ثَمَانِيَةَ أَزْوَاجٍ ۚ يَخْلُقُكُمْ فِي بُطُونِ أُمَّهَاتِكُمْ خَلْقًا مِّن بَعْدِ خَلْقٍ فِي ظُلُمَاتٍ ثَلَاثٍ ۚ ذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمْ لَهُ الْمُلْكُ ۖ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَأَنَّىٰ تُصْرَفُونَ
उसी ने तुम सबको एक ही शख्स से पैदा किया फिर उस (की बाक़ी मिट्टी) से उसकी बीबी (हौव्वा) को पैदा किया और उसी ने तुम्हारे लिए आठ क़िस्म के चारपाए पैदा किए वही तुमको तुम्हारी माँओं के पेट में एक क़िस्म की पैदाइश के बाद दूसरी क़िस्म (नुत्फे जमा हुआ खून लोथड़ा) की पैदाइश से तेहरे तेहरे अंधेरों (पेट) रहम और झिल्ली में पैदा करता है वही अल्लाह तुम्हारा परवरदिगार है उसी की बादशाही है उसके सिवा माबूद नहीं तो तुम लोग कहाँ फिरे जाते हो
7إِن تَكْفُرُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنكُمْ ۖ وَلَا يَرْضَىٰ لِعِبَادِهِ الْكُفْرَ ۖ وَإِن تَشْكُرُوا يَرْضَهُ لَكُمْ ۗ وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَىٰ ۗ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُم مَّرْجِعُكُمْ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ۚ إِنَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ
अगर तुमने उसकी नाशुक्री की तो (याद रखो कि) खुदा तुमसे बिल्कुल बेपरवाह है और अपने बन्दों से कुफ्र और नाशुक्री को पसन्द नहीं करता और अगर तुम शुक्र करोगे तो वह उसको तुम्हारे वास्ते पसन्द करता है और (क़यामत में) कोई किसी (के गुनाह) का बोझ (अपनी गर्दन पर) नहीं उठाएगा फिर तुमको अपने परवरदिगार की तरफ लौटना है तो (दुनिया में) जो कुछ (भला बुरा) करते थे वह तुम्हें बता देगा वह यक़ीनन दिलों के राज़ (तक) से खूब वाक़िफ है
अज़-ज़ुमरकुरान सूची
75आयत
मक्कीRevelation
5आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुमर 5

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Tuesday, August 18, 2026

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