अश-शूरा · 20/53
अनुवाद उच्चारण — सूरा अश-शूरा
مَن كَانَ يُرِيدُ حَرْثَ الْآخِرَةِ نَزِدْ لَهُ فِي حَرْثِهِ ۖ وَمَن كَانَ يُرِيدُ حَرْثَ الدُّنْيَا نُؤْتِهِ مِنْهَا وَمَا لَهُ فِي الْآخِرَةِ مِن نَّصِيبٍ ۝٢٠
Man kaana yureedu harsal Aakhirati nazid lahoo fee harsihee wa man kaana yureedu harsad dunyaa nu`tihee mnhaa wa maa lahoo fil Aakhirati min naseeb
📖 हिंदी अर्थ
जो शख़्श आखेरत की खेती का तालिब हो हम उसके लिए उसकी खेती में अफ़ज़ाइश करेंगे और दुनिया की खेती का ख़ास्तगार हो तो हम उसको उसी में से देंगे मगर आखेरत में फिर उसका कुछ हिस्सा न होगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • حَرْثَ الآخِرَةِ: आख़िरत की खेती, यानी वह अमल जो आख़िरत का फल पाने के लिए किया जाए।
  • حَرْثَ الدُّنْيَا: दुनिया की खेती, यानी वह काम जो सिर्फ़ दुनिया का माल-मता और फायदा हासिल करने के लिए किया जाए।
  • نَزِدْ لَهُ: हम उसके लिए बढ़ा देंगे (यानी उसके अमल में बरकत और अज्र में इज़ाफ़ा कर देंगे)।
  • نُؤْتِهِ مِنْهَا: हम उसे दुनिया में से (उसका मुक़द्दर किया हुआ हिस्सा) दे देंगे।
  • نَصِيبٍ: हिस्सा, भाग।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत मुक़द्दस क़ुरआन का वह नूरानी पैग़ाम है जो इंसान के दिल को जगाती है और उसे सही रास्ता दिखाती है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जो शख्स अपने अमल से सिर्फ़ आख़िरत का इरादा रखता है—यानी उसकी नीयत साफ़ हो, वह अल्लाह की रज़ा के लिए काम करे, अपने फ़र्ज़ अदा करे, दूसरों को भलाई की तरफ़ बुलाए, और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ ढाले—तो अल्लाह उसकी इस नेक खेती में बरकत डालता है। यानी उसके एक नेक अमल का सवाब दस गुना से शुरू होकर सात सौ गुना तक और फिर अल्लाह की मर्ज़ी से उससे भी कहीं ज़्यादा बढ़ा दिया जाता है। यह अल्लाह का फज़ल है कि वह अपने बंदे की छोटी सी कोशिश को भी बड़ा इनाम देता है।

और जो शख्स सिर्फ़ दुनिया की ख्वाहिश रखता है—यानी उसका सारा ध्यान सिर्फ़ माल, शोहरत, और दुनियावी सुख-सुविधाओं पर हो, और वह अल्लाह के हुक्म को भूलकर सिर्फ़ दुनिया के लिए जुट जाए—तो अल्लाह उसे दुनिया में से उतना ही देता है जितना उसके मुक़द्दर में लिखा है। लेकिन उसे आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं मिलेगा, क्योंकि उसने आख़िरत के लिए कुछ भी नहीं भेजा। यह बड़ी अफ़सोसनाक बात है कि इंसान अपनी सारी उम्र दुनिया की खेती में लगा दे, और आख़िरत की खेती को खाली छोड़ दे, फिर उस दिन उसे पछताने के सिवा कुछ हासिल न हो।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें सिखाती है कि हमारी नीयतें सही हों। हमें दुनिया में रहकर भी आख़िरत की तैयारी करनी है। दुनिया को हम अपनी मंज़िल न बनाएं, बल्कि उसे आख़िरत की खेती का ज़रिया बनाएं। जो शख्स अपने कामों में अल्लाह की रज़ा को सामने रखता है, अल्लाह उसके कामों में बरकत डालता है और उसे दुनिया में भी इत्मिनान और कामयाबी देता है और आख़िरत में भी बेहतरीन इनाम। लेकिन जो सिर्फ़ दुनिया के पीछे भागता है, वह न तो दुनिया में सुकून पाता है और न आख़िरत में उसका कोई हिस्सा होता है।

तो आओ, हम अपनी नीयतों को सुधारें, अपने अमल को अल्लाह की रज़ा के लिए खास करें, और उस दिन की तैयारी करें जब कोई माल और औलाद काम न आएगी, सिवाय उसके जो साफ़ दिल के साथ अल्लाह के पास आएगा। यही सबसे बड़ी कामयाबी है।



📜 आयत 18-22 — सूरा अश-शूरा

18يَسْتَعْجِلُ بِهَا الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِهَا ۖ وَالَّذِينَ آمَنُوا مُشْفِقُونَ مِنْهَا وَيَعْلَمُونَ أَنَّهَا الْحَقُّ ۗ أَلَا إِنَّ الَّذِينَ يُمَارُونَ فِي السَّاعَةِ لَفِي ضَلَالٍ بَعِيدٍ
(फिर ये ग़फ़लत कैसी) जो लोग इस पर ईमान नहीं रखते वह तो इसके लिए जल्दी कर रहे हैं और जो मोमिन हैं वह उससे डरते हैं और जानते हैं कि क़यामत यक़ीनी बरहक़ है आगाह रहो कि जो लोग क़यामत के बारे में शक़ किया करते हैं वह बड़े परले दर्जे की गुमराही में हैं
19اللَّهُ لَطِيفٌ بِعِبَادِهِ يَرْزُقُ مَن يَشَاءُ ۖ وَهُوَ الْقَوِيُّ الْعَزِيزُ
और ख़ुदा अपने बन्दों (के हाल) पर बड़ा मेहरबान है जिसको (जितनी) रोज़ी चाहता है देता है वह ज़ोर वाला ज़बरदस्त है
20مَن كَانَ يُرِيدُ حَرْثَ الْآخِرَةِ نَزِدْ لَهُ فِي حَرْثِهِ ۖ وَمَن كَانَ يُرِيدُ حَرْثَ الدُّنْيَا نُؤْتِهِ مِنْهَا وَمَا لَهُ فِي الْآخِرَةِ مِن نَّصِيبٍ
जो शख़्श आखेरत की खेती का तालिब हो हम उसके लिए उसकी खेती में अफ़ज़ाइश करेंगे और दुनिया की खेती का ख़ास्तगार हो तो हम उसको उसी में से देंगे मगर आखेरत में फिर उसका कुछ हिस्सा न होगा
21أَمْ لَهُمْ شُرَكَاءُ شَرَعُوا لَهُم مِّنَ الدِّينِ مَا لَمْ يَأْذَن بِهِ اللَّهُ ۚ وَلَوْلَا كَلِمَةُ الْفَصْلِ لَقُضِيَ بَيْنَهُمْ ۗ وَإِنَّ الظَّالِمِينَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
क्या उन लोगों के (बनाए हुए) ऐसे शरीक हैं जिन्होंने उनके लिए ऐसा दीन मुक़र्रर किया है जिसकी ख़ुदा ने इजाज़त नहीं दी और अगर फ़ैसले (के दिन) का वायदा न होता तो उनमें यक़ीनी अब तक फैसला हो चुका होता और ज़ालिमों के वास्ते ज़रूर दर्दनाक अज़ाब है
22تَرَى الظَّالِمِينَ مُشْفِقِينَ مِمَّا كَسَبُوا وَهُوَ وَاقِعٌ بِهِمْ ۗ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فِي رَوْضَاتِ الْجَنَّاتِ ۖ لَهُم مَّا يَشَاءُونَ عِندَ رَبِّهِمْ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الْفَضْلُ الْكَبِيرُ
(क़यामत के दिन) देखोगे कि ज़ालिम लोग अपने आमाल (के वबाल) से डर रहे होंगे और वह उन पर पड़ कर रहेगा और जिन्होने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे काम किए वह बेहिश्त के बाग़ों में होंगे वह जो कुछ चाहेंगे उनके लिए उनके परवरदिगार की बारगाह में (मौजूद) है यही तो (ख़ुदा का) बड़ा फज़ल है
अश-शूराकुरान सूची
53आयत
मक्कीअवतरण स्थान
20आयत

अनुवाद — अश-शूरा 20

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Saturday, October 3, 2026

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