Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- بَسَطَ: फैलाना, विस्तार करना, खोल देना
- لَبَغَوْا: सरकशी करना, ज़ुल्म ढाना, हद से बढ़ जाना
- بِقَدَرٍ: एक अंदाज़े के साथ, जितनी ज़रूरत हो उतना
- خَبِيرٌ: हर चीज़ की पूरी खबर रखने वाला
- بَصِيرٌ: सब कुछ देखने वाला, हर हाल से वाक़िफ़
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में अपनी रहमत और हिकमत का एक बेहद प्यारा पहलू बयान कर रहा है। वह फ़रमाता है कि अगर वह अपने बंदों को बिना किसी रोक-टोक के ढेर सारा रिज़्क़ (साधन) दे देता, यानी हर किसी को उसकी मर्ज़ी के मुताबिक़ खूब माल-दौलत, ताक़त और आराम अता कर देता, तो लोग ज़मीन में सरकशी और ज़ुल्म करने लगते। वे अपनी हद से बढ़ जाते, एक-दूसरे पर ज़ुल्म ढाते, और अहंकार में आकर अल्लाह की नाफ़रमानी करते। यह इंसान की फ़ितरत है कि जब उसे बहुत ज़्यादा सुख-सुविधाएँ मिल जाएँ, तो वह अक्सर अपने रब को भूल जाता है और दूसरों के हक़ को भी भूल जाता है।
इसलिए अल्लाह तआला अपनी बेपनाह हिकमत से अपने बंदों को उतना ही रिज़्क़ देता है जितना उसकी मशीयत (इच्छा) होती है — किसी को कम, किसी को ज़्यादा, किसी को तंगी में रखता है, किसी को फराग़त देता है। यह सब कुछ उसकी मर्ज़ी और उसकी मस्लिहत (भलाई) के मुताबिक़ होता है। वह जानता है कि किस बंदे के लिए कितना रिज़्क़ बेहतर है — अगर किसी को ज़्यादा मिल जाए तो वह बग़ावत कर बैठे, और अगर किसी को कम मिले तो वह सब्र और शुक्र का रास्ता अपनाए।
अल्लाह तआला अपने बंदों के हाल से पूरी तरह वाक़िफ़ है — वह जानता है कि उनके दिलों में क्या है, उनकी नीयतें क्या हैं, और उनके हालात कैसे हैं। वह हर चीज़ को देखता और जानता है। इसलिए वह जिसे जितना देना चाहता है, अपनी हिकमत से देता है — कभी देकर आज़माता है, कभी रोककर आज़माता है। दोनों में उसकी मर्ज़ी और मस्लिहत छिपी होती है।
दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):
प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपने रिज़्क़ में जो भी कमी या ज़्यादती नज़र आए, उस पर शिकायत नहीं करनी चाहिए। अल्लाह तआला हमसे ज़्यादा हमारी भलाई जानता है। कई बार जो चीज़ हमें बुरी लगती है, वही हमारे लिए अच्छी होती है, और जो अच्छी लगती है, वही हमारे लिए बुरी हो सकती है। यह अल्लाह की रहमत है कि उसने हमें हर चीज़ अंदाज़े से दी है। हमें चाहिए कि अपने रिज़्क़ में जो मिले उस पर शुक्र करें, और जो न मिले उस पर सब्र करें। याद रखें, अल्लाह की हर तदबीर में हमारे लिए भलाई ही भलाई है। वह हमारा ख़बर लेने वाला और हमारी हर हालत को देखने वाला है — उस पर भरोसा रखें, और उसी से माँगते रहें।
📜 आयत 25-29 — सूरा अश-शूरा
अनुवाद — अश-शूरा 27
सूरा अश-शूरा आयत 27 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और अगर ख़ुदा ने अपने बन्दों की रोज़ी में फराख़ी…सूरा आयत 27/53 — सूरा अश-शूरा الشورى (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अश-शूरा सुनें, सूरा अश-शूरा अनुवाद, सूरा अश-शूरा mp3, सूरा अश-शूरा pdf. आयत 25–29. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Sunday, October 4, 2026
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