अज़-ज़ुखरुफ · 40/89
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुखरुफ
أَفَأَنتَ تُسْمِعُ الصُّمَّ أَوْ تَهْدِي الْعُمْيَ وَمَن كَانَ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ ۝٤٠
Afa anta tusmi`us summa aw tahdil `umya wa man kaana fee dalaalim mubeen
📖 हिंदी अर्थ
तो (ऐ रसूल) क्या तुम बहरों को सुना सकते हो या अन्धे को और उस शख़्श को जो सरीही गुमराही में पड़ा हो रास्ता दिखा सकते हो (हरगिज़ नहीं)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الصُّمّ (बहरे): वे लोग जो सत्य की आवाज़ सुनकर भी उसे स्वीकार नहीं करते।
  • الْعُمْيَ (अंधे): वे लोग जिनके दिल की आँखें बंद हो गई हैं और वे सत्य के प्रमाणों को देखकर भी उन्हें नहीं पहचानते।
  • ضَلَالٍ مُّبِينٍ (स्पष्ट पथभ्रष्टता): वह गुमराही जो बिल्कुल साफ़ और प्रत्यक्ष हो, जिसमें कोई संदेह न हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! क्या आप उन लोगों को सुना सकते हैं जो बहरे हैं? या क्या आप उन अंधों को रास्ता दिखा सकते हैं जिनकी आँखें काम नहीं करतीं? और क्या आप उन्हें हिदायत दे सकते हैं जो खुली हुई गुमराही में पड़े हुए हैं? यह आपके बस की बात नहीं है। ये लोग अपने कर्मों के कारण ऐसे हो गए हैं जैसे सुनने और देखने की शक्ति ही खो बैठे हों। सत्य की आवाज़ उनके कानों तक पहुँचती है, लेकिन वे उसे दिल से सुनने से इनकार करते हैं। चमत्कार और प्रमाण उनके सामने आते हैं, लेकिन वे उनसे सबक नहीं लेते।

यह आपका काम नहीं है कि आप उन्हें हिदायत दें, क्योंकि हिदायत देना केवल अल्लाह के हाथ में है। आपका काम केवल संदेश पहुँचाना है। अल्लाह ही चाहता है तो किसी को हिदायत देता है और चाहता है तो किसी को गुमराही में छोड़ देता है। यह उसकी इच्छा और उसके न्याय पर निर्भर है। जिस पर अज़ाब की बात साबित हो चुकी है, उसे कोई हिदायत नहीं दे सकता।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि हमारा काम केवल अल्लाह का संदेश पहुँचाना है, लोगों को हिदायत देना हमारे हाथ में नहीं। इसलिए हमें निराश नहीं होना चाहिए अगर लोग हमारी बात न मानें। हमें अपना कर्तव्य निभाते रहना चाहिए और अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। साथ ही, यह आयत हमें यह भी बताती है कि जब तक हमारा दिल खुला है, हमारी आँखें और कान सत्य के लिए काम कर रहे हैं, यह अल्लाह की बड़ी रहमत है। हमें इस नेमत का शुक्र अदा करना चाहिए और अल्लाह से दुआ करनी चाहिए कि वह हमें सत्य पर स्थिर रखे और हमारे दिलों को अपनी हिदायत से रोशन करे। क्योंकि जिसे अल्लाह हिदायत दे, उसे कोई गुमराह नहीं कर सकता, और जिसे वह गुमराह करे, उसे कोई हिदायत नहीं दे सकता।



📜 आयत 38-42 — अज़-ज़ुखरुफ

38حَتَّىٰ إِذَا جَاءَنَا قَالَ يَا لَيْتَ بَيْنِي وَبَيْنَكَ بُعْدَ الْمَشْرِقَيْنِ فَبِئْسَ الْقَرِينُ
यहाँ तक कि जब (क़यामत में) हमारे पास आएगा तो (अपने साथी शैतान से) कहेगा काश मुझमें और तुममें पूरब पश्चिम का फ़ासला होता ग़रज़ (शैतान भी) क्या ही बुरा रफीक़ है
39وَلَن يَنفَعَكُمُ الْيَوْمَ إِذ ظَّلَمْتُمْ أَنَّكُمْ فِي الْعَذَابِ مُشْتَرِكُونَ
और जब तुम नाफरमानियाँ कर चुके तो (शयातीन के साथ) तुम्हारा अज़ाब में शरीक होना भी आज तुमको (अज़ाब की कमी में) कोई फायदा नहीं पहुँचा सकता
40أَفَأَنتَ تُسْمِعُ الصُّمَّ أَوْ تَهْدِي الْعُمْيَ وَمَن كَانَ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
तो (ऐ रसूल) क्या तुम बहरों को सुना सकते हो या अन्धे को और उस शख़्श को जो सरीही गुमराही में पड़ा हो रास्ता दिखा सकते हो (हरगिज़ नहीं)
41فَإِمَّا نَذْهَبَنَّ بِكَ فَإِنَّا مِنْهُم مُّنتَقِمُونَ
तो अगर हम तुमको (दुनिया से) ले भी जाएँ तो भी हमको उनसे बदला लेना ज़रूरी है
42أَوْ نُرِيَنَّكَ الَّذِي وَعَدْنَاهُمْ فَإِنَّا عَلَيْهِم مُّقْتَدِرُونَ
या (तुम्हारी ज़िन्दगी ही में) जिस अज़ाब का हमने उनसे वायदा किया है तुमको दिखा दें तो उन पर हर तरह क़ाबू रखते हैं
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
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मक्कीRevelation
40आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 40

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Tuesday, August 18, 2026

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