अज़-ज़ुखरुफ · 89/89
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुखरुफ
فَاصْفَحْ عَنْهُمْ وَقُلْ سَلَامٌ ۚ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ ۝٨٩
Fasfah `anhum wa qul salaam; fasawfa ya`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
तो तुम उनसे मुँह फेर लो और कह दो कि तुम को सलाम तो उन्हें अनक़रीब ही (शरारत का नतीजा) मालूम हो जाएगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • فَاصْفَحْ: अर्थात उपेक्षा करो, क्षमा करो, दरगुज़र करो।
  • سَلَامٌ: यहाँ इसका अर्थ है सुरक्षित रहने की बात या विदाई का शब्द, जो झगड़े और बुराई से बचने के लिए कहा जाए।
  • فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ: अर्थात वे शीघ्र ही जान लेंगे (धमकी और चेतावनी)।

तफसीर:

ऐ नबी! आप इन मुशरिकों की सांत्वना और उनकी बुराइयों से दरगुज़र करें और उन्हें जवाब में केवल "सलाम" कहें। यानी उनसे अलग हो जाएं और उनके साथ नर्मी और भलाई का व्यवहार करें, ताकि उनकी शरारतों से बचा जा सके। यह हुक्म मक्का के ज़माने में दिया गया था, जब मुसलमान कमज़ोर थे और उन्हें सब्र और सहनशीलता का आदेश दिया गया।

यह "सलाम" सिर्फ़ बोलने का शब्द नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा तरीका है जो अक्लमंद और समझदार लोग अपनाते हैं, जब वे जाहिलों की बातों का सामना करते हैं। वे उनसे बुराई का जवाब बुराई से नहीं देते, न ही उनके साथ झगड़ते हैं, बल्कि उन्हें छोड़ देते हैं और अलग हो जाते हैं।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है: "فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ" यानी ये लोग जल्द ही जान लेंगे कि उन्होंने क्या किया और उनका अंजाम क्या होगा। यह उनके लिए एक सख्त चेतावनी और धमकी है, और नबी ﷺ के लिए तसल्ली है कि आप चिंता न करें, अल्लाह उनसे बदला लेगा।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि बुराई का जवाब भलाई से देना चाहिए और जब सामने वाला झगड़ा करे तो उसे छोड़ देना चाहिए। इस्लाम सिखाता है कि नरमी और सब्र से दुश्मन भी दोस्त बन सकते हैं। हमें भी चाहिए कि लोगों की बुराइयों पर सब्र करें, उन्हें अल्लाह के हवाले कर दें, क्योंकि अल्लाह ही सबसे अच्छा फैसला करने वाला है। यह आयत हमें यह भी बताती है कि अल्लाह अपने नेक बंदों को कभी अकेला नहीं छोड़ता और उनके दुश्मनों से खुद बदला लेता है। इसलिए हमें अपना काम करते रहना चाहिए और अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए।



📜 आयत 87-89 — अज़-ज़ुखरुफ

87وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَهُمْ لَيَقُولُنَّ اللَّهُ ۖ فَأَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ
और अगर तुम उनसे पूछोगे कि उनको किसने पैदा किया तो ज़रूर कह देगें कि अल्लाह ने फिर (बावजूद इसके) ये कहाँ बहके जा रहे हैं
88وَقِيلِهِ يَا رَبِّ إِنَّ هَٰؤُلَاءِ قَوْمٌ لَّا يُؤْمِنُونَ
और (उसी को) रसूल के उस क़ौल का भी इल्म है कि परवरदिगार ये लोग हरगिज़ ईमान न लाएँगे
89فَاصْفَحْ عَنْهُمْ وَقُلْ سَلَامٌ ۚ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
तो तुम उनसे मुँह फेर लो और कह दो कि तुम को सलाम तो उन्हें अनक़रीब ही (शरारत का नतीजा) मालूम हो जाएगा
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अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 89

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Tuesday, August 18, 2026

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