अज़-ज़ुखरुफ · 88/89
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुखरुफ
وَقِيلِهِ يَا رَبِّ إِنَّ هَٰؤُلَاءِ قَوْمٌ لَّا يُؤْمِنُونَ ۝٨٨
Wa qeelihee yaa Rabbi inna haa`ulaaa`i qawmul laa yu`minoon
📖 हिंदी अर्थ
और (उसी को) रसूल के उस क़ौल का भी इल्म है कि परवरदिगार ये लोग हरगिज़ ईमान न लाएँगे
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • وَقِيلِهِ – और उस (नबी) का कहना
  • يَا رَبِّ – ऐ मेरे पालनहार
  • لَا يُؤْمِنُونَ – ईमान नहीं लाते

व्याख्या:

इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी मुहम्मद ﷺ की उस शिकायत का ज़िक्र कर रहे हैं जो उन्होंने अपने रब की दरगाह में अपनी क़ौम के बारे में की थी। नबी ﷺ ने अपने रब से कहा: "ऐ मेरे रब! ये लोग ईमान नहीं लाते।" यह नबी ﷺ की ओर से अपनी क़ौम के हाल पर दुख और अफ़सोस का इज़हार था, क्योंकि उन्होंने उन्हें सच्चा दीन पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, लेकिन उनकी क़ौम ने उन्हें झुठलाया और ईमान लाने से इनकार कर दिया।

अल्लाह तआला को इस बात का पूरा इल्म है कि नबी ﷺ ने क्या कहा और किस हाल में कहा। यह आयत बताती है कि अल्लाह अपने नबी की हर बात, हर दुआ और हर शिकायत को सुनता और जानता है। यह नबी ﷺ के लिए तसल्ली का ज़रिया है कि उनकी बात रब की दरगाह में सुनी गई और उनका दर्द रब को मालूम है।

इस आयत से हमें सीख मिलती है कि जब हमें अपने समाज या अपने लोगों की हालत पर अफ़सोस हो और वे सच्चाई क़बूल न करें, तो हमें अल्लाह से शिकायत करनी चाहिए और उसी पर भरोसा रखना चाहिए। अल्लाह अपने बंदों की हर पुकार सुनता है और उसकी दरगाह में कोई दुआ बेकार नहीं जाती।

यह आयत हमें नबी ﷺ की महानता और उनके दर्द-ए-उम्मत का एहसास कराती है। उन्हें अपनी क़ौम की हिदायत की कितनी फ़िक्र थी कि उन्होंने अपने रब से उनके ईमान न लाने की शिकायत की। यह हमारे लिए सबक़ है कि हमें भी अपने समाज की इस्लाही फ़िक्र करनी चाहिए और उनकी हिदायत के लिए दुआ करनी चाहिए।

अल्लाह तआला ने इस आयत में यह भी बताया कि उसके पास हर चीज़ का इल्म है — चाहे वह क़ियामत का वक़्त हो या नबी ﷺ का कहना। यह हमें यक़ीन दिलाता है कि अल्लाह की दरगाह में हमारी हर बात, हर दुआ और हर हालत दर्ज है। इसलिए हमें अपनी हर ज़रूरत और हर दर्द अल्लाह के सामने रखना चाहिए, क्योंकि वही सब कुछ सुनने और जानने वाला है।

🎧 सुनें

📜 आयत 86-89 — अज़-ज़ुखरुफ

86وَلَا يَمْلِكُ الَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِهِ الشَّفَاعَةَ إِلَّا مَن شَهِدَ بِالْحَقِّ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
और ख़ुदा के सिवा जिनकी ये लोग इबादत करतें हैं वह तो सिफारिश का भी एख्तेयार नहीं रख़ते मगर (हॉ) जो लोग समझ बूझ कर हक़ बात (तौहीद) की गवाही दें (तो खैर)
87وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَهُمْ لَيَقُولُنَّ اللَّهُ ۖ فَأَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ
और अगर तुम उनसे पूछोगे कि उनको किसने पैदा किया तो ज़रूर कह देगें कि अल्लाह ने फिर (बावजूद इसके) ये कहाँ बहके जा रहे हैं
88وَقِيلِهِ يَا رَبِّ إِنَّ هَٰؤُلَاءِ قَوْمٌ لَّا يُؤْمِنُونَ
और (उसी को) रसूल के उस क़ौल का भी इल्म है कि परवरदिगार ये लोग हरगिज़ ईमान न लाएँगे
89فَاصْفَحْ عَنْهُمْ وَقُلْ سَلَامٌ ۚ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
तो तुम उनसे मुँह फेर लो और कह दो कि तुम को सलाम तो उन्हें अनक़रीब ही (शरारत का नतीजा) मालूम हो जाएगा
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अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 88

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Tuesday, August 18, 2026

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