अल-माइदा · 111/120
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-माइदा
وَإِذْ أَوْحَيْتُ إِلَى الْحَوَارِيِّينَ أَنْ آمِنُوا بِي وَبِرَسُولِي قَالُوا آمَنَّا وَاشْهَدْ بِأَنَّنَا مُسْلِمُونَ ۝١١١
Wa iz awhaitu ilal hawaariyyeena an aaminoo bee wa bi Rasoolee qaalooo aamannaa washhad bi annanaa muslimoon
📖 हिंदी अर्थ
और जब मैने हवारियों से इलहाम किया कि मुझ पर और मेरे रसूल पर ईमान लाओ तो अर्ज़ करने लगे हम ईमान लाए और तू गवाह रहना कि हम तेरे फरमाबरदार बन्दे हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَوْحَيْتُ: मैंने प्रेरणा दी, दिल में डाल दिया।
  • الْحَوَارِيِّينَ: हवारी (बहुवचन: हवारिय्यून) — हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के विशेष सहायक और सच्चे साथी।
  • آمِنُوا: ईमान लाओ, विश्वास करो।
  • وَاشْهَدْ: और गवाह बनो।
  • مُسْلِمُونَ: आज्ञाकारी, अल्लाह के हुक्म के सामने सिर झुकाने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने नबी हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को वह बड़ी नेमत याद दिला रहा है जो उन्होंने हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के साथियों पर की थी। अल्लाह ने हवारियों (हज़रत ईसा के विशेष सहायकों) के दिलों में यह बात डाल दी और उन्हें प्रेरणा दी कि वे अल्लाह पर और उसके रसूल हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) पर ईमान लाएँ। यह कोई ज़बरदस्ती की बात नहीं थी, बल्कि अल्लाह ने उनके दिलों को हिदायत के लिए खोल दिया और उन्हें सत्य को स्वीकार करने की तौफ़ीक़ दी। उन्होंने तुरंत इस प्रेरणा का जवाब दिया और कहा: "हम ईमान लाए, हे हमारे रब! तू गवाह रह कि हम तेरे हुक्म के सामने सिर झुकाने वाले (मुसलमान) हैं।" इस तरह उन्होंने बाहरी इस्लाम (आज्ञाकारिता) और भीतरी ईमान (सच्चे विश्वास) दोनों को एक साथ जोड़ लिया। यह उनकी सच्चाई और अल्लाह की ओर से उन्हें मिली तौफ़ीक़ का सबूत था।


फ़ायदे (लाभ):

  1. अल्लाह की मदद का ज़रिया: जब अल्लाह किसी काम को करना चाहता है, तो वह लोगों के दिलों में सच्चाई की प्रेरणा डाल देता है। यह दिखाता है कि हिदायत अल्लाह के हाथ में है, और वह जिसे चाहता है सच्चाई समझने की तौफ़ीक़ देता है।
  2. ईमान और इस्लाम का ताल्लुक़: हवारियों ने सिर्फ़ ज़बान से ईमान नहीं कहा, बल्कि अपने अमल और आज्ञाकारिता से उसे साबित किया। यह सिखाता है कि सच्चा ईमान वही है जो दिल में हो और अमल से ज़ाहिर हो।
  3. अल्लाह को गवाह बनाना: हवारियों ने अल्लाह को अपने ईमान का गवाह बनाया। यह हमें सिखाता है कि हर अच्छे काम में हमें अल्लाह की रज़ा का ख़याल रखना चाहिए और उसी को गवाह बनाना चाहिए।
  4. सच्चे साथियों की अहमियत: हवारी हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के सच्चे साथी थे, जिन्होंने उनका साथ दिया और दीन की मदद की। यह हमें सिखाता है कि नेक काम में सच्चे और भरोसेमंद साथियों का होना कितना बड़ा वरदान है।
  5. इस्लाम की आसानी: इस आयत से पता चलता है कि इस्लाम कोई मुश्किल दीन नहीं है, बल्कि यह अल्लाह के सामने सिर झुकाने और उसके हुक्म को मानने का नाम है। जो भी ऐसा करता है, वह मुसलमान कहलाता है और अल्लाह की रहमत का हक़दार बनता है।


📜 आयत 109-113 — सूरा अल-माइदा

109۞ يَوْمَ يَجْمَعُ اللَّهُ الرُّسُلَ فَيَقُولُ مَاذَا أُجِبْتُمْ ۖ قَالُوا لَا عِلْمَ لَنَا ۖ إِنَّكَ أَنتَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ
(उस वक्त क़ो याद करो) जिस दिन ख़ुदा अपने पैग़म्बरों को जमा करके पूछेगा कि (तुम्हारी उममत की तरफ से तबलीग़े एहकाम का) क्या जवाब दिया गया तो अर्ज क़रेगें कि हम तो (चन्द ज़ाहिरी बातों के सिवा) कुछ नहीं जानते तू तो खुद बड़ा ग़ैब वॉ है
110إِذْ قَالَ اللَّهُ يَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ اذْكُرْ نِعْمَتِي عَلَيْكَ وَعَلَىٰ وَالِدَتِكَ إِذْ أَيَّدتُّكَ بِرُوحِ الْقُدُسِ تُكَلِّمُ النَّاسَ فِي الْمَهْدِ وَكَهْلًا ۖ وَإِذْ عَلَّمْتُكَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَالتَّوْرَاةَ وَالْإِنجِيلَ ۖ وَإِذْ تَخْلُقُ مِنَ الطِّينِ كَهَيْئَةِ الطَّيْرِ بِإِذْنِي فَتَنفُخُ فِيهَا فَتَكُونُ طَيْرًا بِإِذْنِي ۖ وَتُبْرِئُ الْأَكْمَهَ وَالْأَبْرَصَ بِإِذْنِي ۖ وَإِذْ تُخْرِجُ الْمَوْتَىٰ بِإِذْنِي ۖ وَإِذْ كَفَفْتُ بَنِي إِسْرَائِيلَ عَنكَ إِذْ جِئْتَهُم بِالْبَيِّنَاتِ فَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ إِنْ هَٰذَا إِلَّا سِحْرٌ مُّبِينٌ
(वह वक्त याद करो) जब ख़ुदा फरमाएगा कि ये मरियम के बेटे ईसा हमने जो एहसानात तुम पर और तुम्हारी माँ पर किये उन्हे याद करो जब हमने रूहुलक़ुदूस (जिबरील) से तुम्हारी ताईद की कि तुम झूले में (पड़े पड़े) और अधेड़ होकर (शक़ सा बातें) करने लगे और जब हमने तुम्हें लिखना और अक़ल व दानाई की बातें और (तौरेत व इन्जील (ये सब चीजे) सिखायी और जब तुम मेरे हुक्म से मिट्टी से चिड़िया की मूरत बनाते फिर उस पर कुछ दम कर देते तो वह मेरे हुक्म से (सचमुच) चिड़िया बन जाती थी और मेरे हुक्म से मादरज़ाद (पैदायशी) अंधे और कोढ़ी को अच्छा कर देते थे और जब तुम मेरे हुक्म से मुर्दों को ज़िन्दा (करके क़ब्रों से) निकाल खड़ा करते थे और जिस वक्त तुम बनी इसराईल के पास मौजिज़े लेकर आए और उस वक्त मैने उनको तुम (पर दस्त दराज़ी करने) से रोका तो उनमें से बाज़ कुफ्फ़ार कहने लगे ये तो बस खुला हुआ जादू है
111وَإِذْ أَوْحَيْتُ إِلَى الْحَوَارِيِّينَ أَنْ آمِنُوا بِي وَبِرَسُولِي قَالُوا آمَنَّا وَاشْهَدْ بِأَنَّنَا مُسْلِمُونَ
और जब मैने हवारियों से इलहाम किया कि मुझ पर और मेरे रसूल पर ईमान लाओ तो अर्ज़ करने लगे हम ईमान लाए और तू गवाह रहना कि हम तेरे फरमाबरदार बन्दे हैं
112إِذْ قَالَ الْحَوَارِيُّونَ يَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ هَلْ يَسْتَطِيعُ رَبُّكَ أَن يُنَزِّلَ عَلَيْنَا مَائِدَةً مِّنَ السَّمَاءِ ۖ قَالَ اتَّقُوا اللَّهَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
(वह वक्त याद करो) जब हवारियों ने ईसा से अर्ज़ की कि ऐ मरियम के बेटे ईसा क्या आप का ख़ुदा उस पर क़ादिर है कि हम पर आसमान से (नेअमत की) एक ख्वान नाज़िल फरमाए ईसा ने कहा अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो ख़ुदा से डरो (ऐसी फरमाइश जिसमें इम्तेहान मालूम हो न करो)
113قَالُوا نُرِيدُ أَن نَّأْكُلَ مِنْهَا وَتَطْمَئِنَّ قُلُوبُنَا وَنَعْلَمَ أَن قَدْ صَدَقْتَنَا وَنَكُونَ عَلَيْهَا مِنَ الشَّاهِدِينَ
वह अर्ज़ करने लगे हम तो फक़त ये चाहते है कि इसमें से (बरतकन) कुछ खाएँ और हमारे दिल को (आपकी रिसालत का पूरा पूरा) इत्मेनान हो जाए और यक़ीन कर लें कि आपने हमसे (जो कुछ कहा था) सच फरमाया था और हम लोग इस पर गवाह रहें
अल-माइदाकुरान सूची
120आयत
मदनीअवतरण स्थान
111आयत

अनुवाद — अल-माइदा 111

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Thursday, October 1, 2026

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