अल-मुजादिला · 20/22
अनुवाद उच्चारण — अल-मुजादिला
إِنَّ الَّذِينَ يُحَادُّونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ أُولَٰئِكَ فِي الْأَذَلِّينَ ۝٢٠
Innal lazeena yuhaaaddoonal laaha wa Rasoolahooo ulaaa`ika fil azalleen
📖 हिंदी अर्थ
जो लोग ख़ुदा और उसके रसूल से मुख़ालेफ़त करते हैं वह सब ज़लील लोगों में हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يُحَادُّونَ – अर्थात अल्लाह और उसके रसूल की सीमा से बाहर निकलना, उनका विरोध करना, उनके खिलाफ़ मोर्चा खोलना, और उनके आदेशों को न मानना।
  • الأَذَلِّينَ – अत्यंत अपमानित, पराजित और ज़लील लोग।

तफ़सीर:

यह आयत उन लोगों के बारे में बताती है जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ का विरोध करते हैं, उनके खिलाफ़ खड़े होते हैं और उनके आदेशों को नहीं मानते। ऐसे लोगों के लिए अल्लाह तआला स्पष्ट कर देते हैं कि वे उन्हीं लोगों में से हैं जो सबसे ज़्यादा अपमानित और पराजित हैं।

यानी जो लोग अल्लाह की शरीअत की हदों से बाहर निकलते हैं, उसके दीन का मुक़ाबला करते हैं, और रसूल ﷺ की सुन्नत को छोड़कर अपनी मनमानी करते हैं, वे चाहे दुनिया में कितना भी बड़ा दिखावा करें, चाहे उनके पास ताकत और साधन कितने भी हों, अल्लाह की नज़र में वे ज़लील और बेइज़्ज़त हैं। दुनिया में भी उन्हें अपमान का सामना करना पड़ता है और आख़िरत में भी उनकी रुसवाई तय है।

अल्लाह तआला ने इतिहास में ऐसी कई मिसालें पेश की हैं — फ़िरऔन, नमरूद, क़ारून और अन्य ज़ालिम हुक्काम — जिन्होंने अल्लाह के दीन का मुक़ाबला किया, लेकिन अंजाम उनका ज़िल्लत और बर्बादी के सिवा कुछ नहीं था। यह सुन्नत (क़ानून) अल्लाह की ओर से हमेशा के लिए तय है — जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करेगा, वह हारेगा और अपमानित होगा।

इस आयत में मोमिनों के लिए एक बड़ी नसीहत है कि वे अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ ही रहें, उनकी बताई हुई हदों का पालन करें। जो इंसान इन हदों पर चलता है, वह इज़्ज़त पाता है, चाहे दुनिया उसे कमज़ोर समझे। और जो इन हदों से बाहर निकलता है, वह ज़िल्लत उठाता है, चाहे दुनिया उसे बड़ा और ताकतवर समझे।

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्ची इज़्ज़त अल्लाह की इताअत (आज्ञाकारिता) में है, और सच्ची ज़िल्लत उसकी नाफ़रमानी में। इसलिए हमें अपनी ज़िंदगी के हर मामले में अल्लाह और उसके रसूल ﷺ को ही सबसे ऊपर रखना चाहिए, और किसी भी इंसानी ताकत या दुनियावी साधन पर भरोसा नहीं करना चाहिए। अल्लाह हमें उन लोगों में से बनाए जो उसकी हदों पर चलते हैं और उसकी रहमत और इज़्ज़त के हक़दार बनते हैं। आमीन।



📜 आयत 18-22 — अल-मुजादिला

18يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ جَمِيعًا فَيَحْلِفُونَ لَهُ كَمَا يَحْلِفُونَ لَكُمْ ۖ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُمْ عَلَىٰ شَيْءٍ ۚ أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ الْكَاذِبُونَ
जिस दिन ख़ुदा उन सबको दोबार उठा खड़ा करेगा तो ये लोग जिस तरह तुम्हारे सामने क़समें खाते हैं उसी तरह उसके सामने भी क़समें खाएँगे और ख्याल करते हैं कि वह राहे सवाब पर हैं आगाह रहो ये लोग यक़ीनन झूठे हैं
19اسْتَحْوَذَ عَلَيْهِمُ الشَّيْطَانُ فَأَنسَاهُمْ ذِكْرَ اللَّهِ ۚ أُولَٰئِكَ حِزْبُ الشَّيْطَانِ ۚ أَلَا إِنَّ حِزْبَ الشَّيْطَانِ هُمُ الْخَاسِرُونَ
शैतान ने इन पर क़ाबू पा लिया है और ख़ुदा की याद उनसे भुला दी है ये लोग शैतान के गिरोह है सुन रखो कि शैतान का गिरोह घाटा उठाने वाला है
20إِنَّ الَّذِينَ يُحَادُّونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ أُولَٰئِكَ فِي الْأَذَلِّينَ
जो लोग ख़ुदा और उसके रसूल से मुख़ालेफ़त करते हैं वह सब ज़लील लोगों में हैं
21كَتَبَ اللَّهُ لَأَغْلِبَنَّ أَنَا وَرُسُلِي ۚ إِنَّ اللَّهَ قَوِيٌّ عَزِيزٌ
ख़ुदा ने हुक्म नातिक दे दिया है कि मैं और मेरे पैग़म्बर ज़रूर ग़ालिब रहेंगे बेशक ख़ुदा बड़ा ज़बरदस्त ग़ालिब है
22لَّا تَجِدُ قَوْمًا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ يُوَادُّونَ مَنْ حَادَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَوْ كَانُوا آبَاءَهُمْ أَوْ أَبْنَاءَهُمْ أَوْ إِخْوَانَهُمْ أَوْ عَشِيرَتَهُمْ ۚ أُولَٰئِكَ كَتَبَ فِي قُلُوبِهِمُ الْإِيمَانَ وَأَيَّدَهُم بِرُوحٍ مِّنْهُ ۖ وَيُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ ۚ أُولَٰئِكَ حِزْبُ اللَّهِ ۚ أَلَا إِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
जो लोग ख़ुदा और रोज़े आख़ेरत पर ईमान रखते हैं तुम उनको ख़ुदा और उसके रसूल के दुश्मनों से दोस्ती करते हुए न देखोगे अगरचे वह उनके बाप या बेटे या भाई या ख़ानदान ही के लोग (क्यों न हों) यही वह लोग हैं जिनके दिलों में ख़ुदा ने ईमान को साबित कर दिया है और ख़ास अपने नूर से उनकी ताईद की है और उनको (बेहिश्त में) उन (हरे भरे) बाग़ों में दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरे जारी है (और वह) हमेश उसमें रहेंगे ख़ुदा उनसे राज़ी और वह ख़ुदा से ख़ुश यही ख़ुदा का गिरोह है सुन रखो कि ख़ुदा के गिरोग के लोग दिली मुरादें पाएँगे
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अनुवाद — अल-मुजादिला 20

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Tuesday, August 18, 2026

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