अल-हश्र · 21/24
अनुवाद उच्चारण — अल-हश्र
لَوْ أَنزَلْنَا هَٰذَا الْقُرْآنَ عَلَىٰ جَبَلٍ لَّرَأَيْتَهُ خَاشِعًا مُّتَصَدِّعًا مِّنْ خَشْيَةِ اللَّهِ ۚ وَتِلْكَ الْأَمْثَالُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ ۝٢١
Law anzalnaa haazal quraana `alaa jabilil lara aytahoo khaashi`am muta saddi`am min khashiyatil laah; wa tilkal amsaalu nadribuhaa linnaasi la`allahum yatafakkaroon
📖 हिंदी अर्थ
अगर हम इस क़ुरान को किसी पहाड़ पर (भी) नाज़िल करते तो तुम उसको देखते कि ख़ुदा के डर से झुका और फटा जाता है ये मिसालें हम लोगों (के समझाने) के लिए बयान करते हैं ताकि वह ग़ौर करें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • ख़ाशि'अन (خاشِعًا): झुका हुआ, दबा हुआ, अल्लाह के भय से दबा हुआ।
  • मुतसद्दि'अन (مُتَصَدِّعًا): फटा हुआ, टुकड़े-टुकड़े हो जाने वाला।
  • ख़श्यतिल्लाह (خَشْيَةِ اللَّهِ): अल्लाह का भय, जो इल्म और समझ से पैदा होता है।
  • अम्साल (أَمْثَال): मिसालें, उदाहरण, नसीहत के लिए दी गई बातें।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में एक बहुत ही गहरी और असरदार मिसाल पेश कर रहे हैं। वह फ़रमाते हैं कि अगर हम यह क़ुरआन किसी पहाड़ पर नाज़िल करते — और वह पहाड़ अपनी सख़्ती, बुलंदी और अज़मत के बावजूद इस क़ुरआन के पैग़ाम को समझता — तो तुम देखते कि वह पहाड़ अल्लाह के ख़ौफ़ से झुक जाता, दब जाता और फट जाता। यानी इतना बड़ा, सख़्त और अटल पहाड़ भी अल्लाह के कलाम की अज़मत और उसके वा'ईद (डरावने अंजाम) के सामने नहीं टिक पाता, वह ख़श्नूद होकर टूट जाता।

यह एक तमसील (उदाहरण) है, जो अल्लाह ने इंसानों को उनके दिलों की सख़्ती पर शर्मिंदा करने के लिए बयान की है। जब एक बेजान पहाड़, जिसमें न समझ है न इल्म, अल्लाह के कलाम के सामने झुक जाता और फट जाता है, तो फिर इंसान — जिसे अल्लाह ने अक्ल, समझ और दिल दिया है — उसे क्यों नहीं झुकना चाहिए? जब वह क़ुरआन सुनता है, तो उसका दिल क्यों नहीं पिघलता? उसकी आँखों से आँसू क्यों नहीं बहते? उसका बदन क्यों नहीं काँपता?

यह आयत उन लोगों के लिए एक सख़्त तनबीह (चेतावनी) है जो क़ुरआन सुनते हैं, लेकिन उनके दिलों पर कोई असर नहीं होता। वे क़ुरआन की आयतें पढ़ते हैं, लेकिन उनकी ज़िंदगी में कोई तब्दीली नहीं आती। उनके दिल पत्थर से भी ज़्यादा सख़्त हो गए हैं।

अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और ये मिसालें हम लोगों के लिए बयान करते हैं, ताकि वे ग़ौर-ओ-फ़िक्र करें।" यानी इन उदाहरणों का मक़सद सिर्फ़ यह है कि इंसान अपनी अक्ल से काम ले, सोचे-समझे, अपने दिल की सख़्ती को दूर करे और अल्लाह की तरफ़ रुजू करे।

दावती पहलू:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें बताती है कि क़ुरआन सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं है, बल्कि उस पर ग़ौर करने, उससे सबक़ लेने और उस पर अमल करने के लिए है। अगर हमारा दिल क़ुरआन सुनकर नहीं पिघलता, तो हमें अपने दिल की सख़्ती पर रोना चाहिए। हमें चाहिए कि क़ुरआन को सीने से लगाएँ, उसकी आयतों पर दिन-रात ग़ौर करें, और उसके हुक्मों को अपनी ज़िंदगी में लागू करें। यही वह रास्ता है जो हमें अल्लाह की मुहब्बत, उसकी रहमत और जन्नत तक पहुँचाएगा। क़ुरआन हमारे लिए रहनुमा है, शिफ़ा है और रहमत है — बशर्ते हम इसे सच्चे दिल से पढ़ें और समझें।



📜 आयत 19-23 — अल-हश्र

19وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ نَسُوا اللَّهَ فَأَنسَاهُمْ أَنفُسَهُمْ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ
और उन लोगों के जैसे न हो जाओ जो ख़ुदा को भुला बैठे तो ख़ुदा ने उन्हें ऐसा कर दिया कि वह अपने आपको भूल गए यही लोग तो बद किरदार हैं
20لَا يَسْتَوِي أَصْحَابُ النَّارِ وَأَصْحَابُ الْجَنَّةِ ۚ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ هُمُ الْفَائِزُونَ
जहन्नुमी और जन्नती किसी तरह बराबर नहीं हो सकते जन्नती लोग ही तो कामयाबी हासिल करने वाले हैं
21لَوْ أَنزَلْنَا هَٰذَا الْقُرْآنَ عَلَىٰ جَبَلٍ لَّرَأَيْتَهُ خَاشِعًا مُّتَصَدِّعًا مِّنْ خَشْيَةِ اللَّهِ ۚ وَتِلْكَ الْأَمْثَالُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ
अगर हम इस क़ुरान को किसी पहाड़ पर (भी) नाज़िल करते तो तुम उसको देखते कि ख़ुदा के डर से झुका और फटा जाता है ये मिसालें हम लोगों (के समझाने) के लिए बयान करते हैं ताकि वह ग़ौर करें
22هُوَ اللَّهُ الَّذِي لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ عَالِمُ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ ۖ هُوَ الرَّحْمَٰنُ الرَّحِيمُ
वही ख़ुदा है जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, पोशीदा और ज़ाहिर का जानने वाला वही बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
23هُوَ اللَّهُ الَّذِي لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ الْمَلِكُ الْقُدُّوسُ السَّلَامُ الْمُؤْمِنُ الْمُهَيْمِنُ الْعَزِيزُ الْجَبَّارُ الْمُتَكَبِّرُ ۚ سُبْحَانَ اللَّهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ
वही वह ख़ुदा है जिसके सिवा कोई क़ाबिले इबादत नहीं (हक़ीक़ी) बादशाह, पाक ज़ात (हर ऐब से) बरी अमन देने वाला निगेहबान, ग़ालिब ज़बरदस्त बड़ाई वाला ये लोग जिसको (उसका) शरीक ठहराते हैं उससे पाक है
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अनुवाद — अल-हश्र 21

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Tuesday, August 18, 2026

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