अल-अनआम · 107/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا أَشْرَكُوا ۗ وَمَا جَعَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا ۖ وَمَا أَنتَ عَلَيْهِم بِوَكِيلٍ ۝١٠٧
Wa law shaaa`al laahu maaa ashrakoo; wa maa ja`alnaaka `alaihim hafeezanw wa maaa anta `alaihim biwakeel
📖 हिंदी अर्थ
और अगर ख़ुदा चाहता तो ये लोग शिर्क ही न करते और हमने तुमको उन लोगों का निगेहबान तो बनाया नहीं है और न तुम उनके ज़िम्मेदार हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • حَفِيظًا: निगरानी रखने वाला, देखभाल करने वाला, जो हर काम को गिनता और संभालता हो।
  • وَكِيل: कार्यभार सौंपा हुआ, अधिकार रखने वाला, जो लोगों के मामलों का प्रबंधन करे और उन्हें बाध्य कर सके।

तफसीर (व्याख्या):

यदि अल्लाह तआला चाहता कि ये मुशरिकीन (बहुदेववादी) शिर्क न करें, तो वे कभी शिर्क न करते। लेकिन अल्लाह ने उन्हें स्वतंत्र इच्छा और चुनाव का अधिकार दिया है, और वह जानता है कि वे अपनी बुरी पसंद और टेढ़ी इच्छाओं के कारण शिर्क का रास्ता चुनेंगे। अल्लाह की मशीयत (इच्छा) उनके शिर्क को जबरन रोकने पर नहीं टिकी, बल्कि उसने उन्हें आज़माइश के लिए छोड़ दिया है।

ऐ नबी! हमने आपको इन लोगों पर निगरानी रखने वाला नहीं बनाया है, जो उनके हर अच्छे-बुरे काम को गिनता रहे, और न ही आप उन पर अधिकार रखने वाले हो कि उन्हें ज़बरदस्ती इस्लाम पर ला खड़ा करें। आपका काम केवल संदेश (रिसालत) पहुँचाना है। हिदायत देना और दिलों को बदलना अल्लाह के हाथ में है। आप पर उनके कर्मों की ज़िम्मेदारी नहीं है, और न ही आपको उन्हें मजबूर करने का अधिकार दिया गया है।

फ़ायदे (सीख):

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं है। हर व्यक्ति को अपनी मर्जी से ईमान लाने और अच्छे कर्म करने की आज़ादी दी गई है। इस्लाम तर्क, दलील और नेकी के ज़रिए लोगों के दिल जीतता है, ज़बरदस्ती से नहीं।
  2. नबी करीम ﷺ की उम्मत के अनुयायियों को भी यही सिखाया गया है कि वे दूसरों को केवल अच्छे तरीके से समझाएँ, उनके गलत कामों पर अफ़सोस करें, लेकिन उन्हें बदलने की कोशिश में अपनी हद से आगे न बढ़ें। हिदायत देना अल्लाह का काम है।
  3. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह की मशीयत (इच्छा) उसकी हिकमत (बुद्धिमत्ता) के अनुसार होती है। वह चाहता तो सबको मोमिन बना देता, लेकिन उसने इंसान को आज़माइश के लिए छोड़ा है, ताकि सच्चे और झूठे लोग सामने आ जाएँ।
  4. इस आयत से मुसलमानों को यह तसल्ली मिलती है कि उनकी ज़िम्मेदारी सिर्फ अच्छा संदेश पहुँचाना है, नतीजा अल्लाह पर छोड़ देना चाहिए। इससे दिल को सुकून मिलता है और इंसान अपने फर्ज़ पर डटा रहता है।


📜 आयत 105-109 — अल-अनआम

105وَكَذَٰلِكَ نُصَرِّفُ الْآيَاتِ وَلِيَقُولُوا دَرَسْتَ وَلِنُبَيِّنَهُ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ
और हम (अपनी) आयतें यूं उलट फेरकर बयान करते है (ताकि हुज्जत तमाम हो) और ताकि वह लोग ज़बानी भी इक़रार कर लें कि तुमने (क़ुरान उनके सामने) पढ़ दिया और ताकि जो लोग जानते है उनके लिए (क़ुरान का) खूब वाजेए करके बयान कर दें
106اتَّبِعْ مَا أُوحِيَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ وَأَعْرِضْ عَنِ الْمُشْرِكِينَ
जो कुछ तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से 'वही' की जाए बस उसी पर चलो अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुशरिको से किनारा कश रहो
107وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا أَشْرَكُوا ۗ وَمَا جَعَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا ۖ وَمَا أَنتَ عَلَيْهِم بِوَكِيلٍ
और अगर ख़ुदा चाहता तो ये लोग शिर्क ही न करते और हमने तुमको उन लोगों का निगेहबान तो बनाया नहीं है और न तुम उनके ज़िम्मेदार हो
108وَلَا تَسُبُّوا الَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ فَيَسُبُّوا اللَّهَ عَدْوًا بِغَيْرِ عِلْمٍ ۗ كَذَٰلِكَ زَيَّنَّا لِكُلِّ أُمَّةٍ عَمَلَهُمْ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّهِم مَّرْجِعُهُمْ فَيُنَبِّئُهُم بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
और ये (मुशरेकीन) जिन की अल्लाह के सिवा (ख़ुदा समझ कर) इबादत करते हैं उन्हें तुम बुरा न कहा करो वरना ये लोग भी ख़ुदा को बिना समझें अदावत से बुरा (भला) कह बैठें (और लोग उनकी ख्वाहिश नफसानी के) इस तरह पाबन्द हुए कि गोया हमने ख़ुद हर गिरोह के आमाल उनको सॅवाकर अच्छे कर दिखाए फिर उन्हें तो (आख़िरकार) अपने परवरदिगार की तरफ लौट कर जाना है तब जो कुछ दुनिया में कर रहे थे ख़ुदा उन्हें बता देगा
109وَأَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ لَئِن جَاءَتْهُمْ آيَةٌ لَّيُؤْمِنُنَّ بِهَا ۚ قُلْ إِنَّمَا الْآيَاتُ عِندَ اللَّهِ ۖ وَمَا يُشْعِرُكُمْ أَنَّهَا إِذَا جَاءَتْ لَا يُؤْمِنُونَ
और उन लोगों ने ख़ुदा की सख्त सख्त क़समें खायीं कि अगर उनके पास कोई मौजिजा आए तो वह ज़रूर उस पर ईमान लाएँगे (ऐ रसूल) तुम कहो कि मौजिज़े तो बस ख़ुदा ही के पास हैं और तुम्हें क्या मालूम ये यक़ीनी बात है कि जब मौजिज़ा भी आएगा तो भी ये ईमान न लाएँगे
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अनुवाद — अल-अनआम 107

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सूरा आयत 107/165 — अल-अनआम الأنعام (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-अनआम सुनें, अल-अनआम अनुवाद, अल-अनआम mp3, अल-अनआम pdf. आयत 105–109. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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