जो कुछ तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से 'वही' की जाए बस उसी पर चलो अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुशरिको से किनारा कश रहो
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
اتَّبِعْ: अनुसरण करो, पालन करो।
أُوحِيَ إِلَيْكَ: जो आपकी ओर वह्य (प्रकाशना) की गई।
وَأَعْرِضْ عَنِ الْمُشْرِكِينَ: मुशरिकों (बहुदेववादियों) से उपेक्षा करो, उनकी ओर ध्यान मत दो।
तफसीर (व्याख्या):
ऐ नबी! आप उस हिदायत और निर्देश का पूर्ण रूप से अनुसरण करें जो आपके रब की ओर से आप पर उतारी गई है। यह वह्य ही आपके लिए मार्गदर्शन का एकमात्र स्रोत है, जिसमें आदेश और निषेध दोनों शामिल हैं। इस वह्य की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा यह है कि सच्ची इबादत के योग्य केवल अल्लाह ही है, उसके अलावा कोई पूज्य नहीं। यही तौहीद (एकेश्वरवाद) का मूल सिद्धांत है।
फिर अल्लाह आपको निर्देश देता है कि मुशरिकों के साथ उनके बहुदेववाद और हठधर्मिता के कारण व्यर्थ के विवादों में न पड़ें, न उनकी बातों से विचलित हों और न उनके दबाव में आकर सत्य से समझौता करें। उनकी जिद और विरोध आपके मिशन में रुकावट न बने। आपका काम केवल संदेश पहुंचाना है, जबकि उनका हिसाब अल्लाह के सुपुर्द है। उनकी ओर से आने वाली तकलीफों को सहन करें और उनसे किनारा कर लें।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
एक मुसलमान का कर्तव्य है कि वह केवल अल्लाह की ओर से आई हुई शिक्षा (कुरआन और सुन्नत) का अनुसरण करे, न कि अपनी इच्छाओं या समाज के दबाव का।
तौहीद (अल्लाह की एकता) इस्लाम की सबसे बड़ी नींव है, और इसी पर सारी इबादतें टिकी हैं।
बुराई और बहुदेववाद से दूर रहना चाहिए, लेकिन उनसे निपटने का तरीका सब्र और उपेक्षा है, न कि घबराहट या समझौता।
यह आयत हमें सिखाती है कि सत्य के मार्ग पर चलते हुए مخالفों की बातों से विचलित न हों, क्योंकि अल्लाह ही सब कुछ देखने वाला और न्याय करने वाला है।
इस आयत में मुसलमानों के लिए धैर्य और दृढ़ता का पाठ है, जो हर युग में उन्हें अपने ईमान पर क़ायम रहने की ताक़त देता है।
तुम्हारे पास तो सुझाने वाली चीज़े आ ही चुकीं फिर जो देखे (समझे) तो अपने दम के लिए और जो अन्धा बने तो (उसका ज़रर (नुकसान) भी) ख़ुद उस पर है और (ऐ रसूल उन से कह दो) कि मै तुम लोगों का कुछ निगेहबान तो हूँ नहीं
और हम (अपनी) आयतें यूं उलट फेरकर बयान करते है (ताकि हुज्जत तमाम हो) और ताकि वह लोग ज़बानी भी इक़रार कर लें कि तुमने (क़ुरान उनके सामने) पढ़ दिया और ताकि जो लोग जानते है उनके लिए (क़ुरान का) खूब वाजेए करके बयान कर दें
और ये (मुशरेकीन) जिन की अल्लाह के सिवा (ख़ुदा समझ कर) इबादत करते हैं उन्हें तुम बुरा न कहा करो वरना ये लोग भी ख़ुदा को बिना समझें अदावत से बुरा (भला) कह बैठें (और लोग उनकी ख्वाहिश नफसानी के) इस तरह पाबन्द हुए कि गोया हमने ख़ुद हर गिरोह के आमाल उनको सॅवाकर अच्छे कर दिखाए फिर उन्हें तो (आख़िरकार) अपने परवरदिगार की तरफ लौट कर जाना है तब जो कुछ दुनिया में कर रहे थे ख़ुदा उन्हें बता देगा
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