और तुम उसके लाने में (ख़ुदा को) आजिज़ नहीं कर सकते (ऐ रसूल तुम उनसे) कहो कि ऐ मेरी क़ौम तुम बजाए ख़ुद जो चाहो करो मैं (बजाए ख़ुद) अमल कर रहा हूँ फिर अनक़रीब तुम्हें मालूम हो जाएगा कि आख़ेरत (बेहश्त) किसके लिए है (तुम्हारे लिए या हमारे लिए) ज़ालिम लोग तो हरगिज़ कामयाब न होंगे
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کہہ دو کہ لوگو تم اپنی جگہ عمل کئے جاؤ میں (اپنی جگہ) عمل کئے جاتا ہوں عنقریب تم کو معلوم ہو جائے گا کہ آخرت میں (بہشت) کس کا گھر ہوگا کچھ شک نہیں کہ مشرک نجات نہیں پانے کے
مَكَانَتِكُمْ: अपनी जगह पर, अपनी हैसियत के अनुसार, अपने तरीके पर।
عَاقِبَةُ الدَّارِ: आख़िरत का अच्छा परिणाम, यानी जन्नत।
لَا يُفْلِحُ: कभी सफल नहीं होते।
तफ़सीर (व्याख्या):
ऐ नबी! आप अपनी क़ौम से कह दीजिए: "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम अपनी जगह पर, अपने तरीके और अपनी हालत पर काम करते रहो, मैं भी अपनी जगह पर वह काम करता रहूँगा जो मेरे रब ने मुझे आदेश दिया है। तुम जिस राह पर हो (कुफ्र और गुमराही पर) मैं उसी पर डटा रहूँगा, और मैं उस हक़ पर क़ायम रहूँगा जो मुझे मिला है। मैंने तुम्हें साफ़-साफ़ समझा दिया है और तुम पर हुज्जत क़ायम कर दी है। अब जल्द ही तुम्हें पता चल जाएगा कि आख़िरत का अच्छा अंजाम और कामयाबी किसके लिए है — क्या तुम्हारे लिए या मेरे लिए? जब अज़ाब आ जाएगा और सच्चाई सामने आ जाएगी, तो तुम ख़ुद देख लोगे। यक़ीनन ज़ालिम (जो अल्लाह के साथ शिर्क करते हैं और उसकी हदों से आगे बढ़ जाते हैं) कभी सफल नहीं होते — न दुनिया में उन्हें सच्ची कामयाबी मिलती है, न आख़िरत में। भले ही वे दुनिया में कुछ देर चैन से रह लें, लेकिन आख़िरी फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ ही होगा।
फ़ायदे (सबक़):
इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि हक़ पर डटे रहना चाहिए, चाहे दूसरे लोग कितनी भी मुख़ालिफ़त क्यों न करें। नबी ﷺ ने अपनी क़ौम को धमकी दी और उन्हें यक़ीन दिलाया कि अंजाम हक़ वालों के ही पक्ष में होगा।
एक इंसान को अपने अमल पर भरोसा होना चाहिए और उसे यह नहीं डरना चाहिए कि बातिल के पैरोकार क्या कहेंगे। सच्चाई पर चलने वाला आख़िर में कामयाब होता है।
यह आयत हमें बताती है कि ज़ुल्म (चाहे वह शिर्क हो या इंसानों पर ज़ुल्म) कभी पनपता नहीं। अल्लाह की राह पर चलने वालों के लिए आख़िरत में जन्नत है, और ज़ालिमों के लिए नुक़सान।
हमें यह भी सीख मिलती है कि दूसरों को नसीहत करने के बाद अगर वे न मानें, तो हमें अपने फ़र्ज़ पर क़ायम रहना चाहिए और अंजाम अल्लाह पर छोड़ देना चाहिए।
और तुम उसके लाने में (ख़ुदा को) आजिज़ नहीं कर सकते (ऐ रसूल तुम उनसे) कहो कि ऐ मेरी क़ौम तुम बजाए ख़ुद जो चाहो करो मैं (बजाए ख़ुद) अमल कर रहा हूँ फिर अनक़रीब तुम्हें मालूम हो जाएगा कि आख़ेरत (बेहश्त) किसके लिए है (तुम्हारे लिए या हमारे लिए) ज़ालिम लोग तो हरगिज़ कामयाब न होंगे
और जो कुछ वह लोग करते हैं तुम्हारा परवरदिगार उससे बेख़बर नहीं और तुम्हारा परवरदिगार बे परवाह रहम वाला है - अगर चाहे तो तुम सबके सबको (दुनिया से उड़ा) ले लाए और तुम्हारे बाद जिसको चाहे तुम्हार जानशीन बनाए जिस तरह आख़िर तुम्हें दूसरे लोगों की औलाद से पैदा किया है
और तुम उसके लाने में (ख़ुदा को) आजिज़ नहीं कर सकते (ऐ रसूल तुम उनसे) कहो कि ऐ मेरी क़ौम तुम बजाए ख़ुद जो चाहो करो मैं (बजाए ख़ुद) अमल कर रहा हूँ फिर अनक़रीब तुम्हें मालूम हो जाएगा कि आख़ेरत (बेहश्त) किसके लिए है (तुम्हारे लिए या हमारे लिए) ज़ालिम लोग तो हरगिज़ कामयाब न होंगे
और ये लोग ख़ुदा की पैदा की हुई खेती और चौपायों में से हिस्सा क़रार देते हैं और अपने ख्याल के मुवाफिक कहते हैं कि ये तो ख़ुदा का (हिस्सा) है और ये हमारे शरीकों का (यानि जिनको हमने ख़ुदा का शरीक बनाया) फिर जो ख़ास उनके शरीकों का है वह तो ख़ुदा तक नहीं पहुँचने का और जो हिस्सा ख़ुदा का है वो उसके शरीकों तक पहुँच जाएगा ये क्या ही बुरा हुक्म लगाते हैं और उसी तरह बहुतेरे मुशरकीन को उनके शरीकों ने अपने बच्चों को मार डालने को अच्छा कर दिखाया है
ताकि उन्हें (बदी) हलाकत में डाल दें और उनके सच्चे दीन को उन पर मिला जुला दें और अगर ख़ुदा चाहता तो लोग ऐसा काम न करते तो तुम (ऐ रसूल) और उनकी इफ़तेरा परदाज़ियों को (ख़ुदा पर) छोड़ दो और ये लोग अपने ख्याल के मुवाफिक कहने लगे कि ये चौपाए और ये खेती अछूती है
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