बेशक जिन लोगों ने आपने दीन में तफरक़ा डाला और कई फरीक़ बन गए थे उनसे कुछ सरोकार नहीं उनका मामला तो सिर्फ ख़ुदा के हवाले है फिर जो कुछ वह दुनिया में नेक या बद किया करते थे वह उन्हें बता देगा (उसकी रहमत तो देखो)
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جن لوگوں نے اپنے دین میں (بہت سے) رستے نکالے اور کئی کئی فرقے ہو گئے ان سے تم کو کچھ کام نہیں ان کا کام خدا کے حوالے پھر جو کچھ وہ کرتے رہے ہیں وہ ان کو (سب) بتائے گا
बेशक जिन लोगों ने आपने दीन में तफरक़ा डाला और कई फरीक़ बन गए थे उनसे कुछ सरोकार नहीं उनका मामला तो सिर्फ ख़ुदा के हवाले है फिर जो कुछ वह दुनिया में नेक या बद किया करते थे वह उन्हें बता देगा (उसकी रहमत तो देखो)
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
فَرَّقُوا دِينَهُمْ: अपने धर्म को टुकड़ों में बाँट लिया, यानी कुछ माना और कुछ छोड़ दिया।
شِيَعًا: अलग-अलग फ़िरक़े और गुट बन गए।
لَّسْتَ مِنْهُمْ فِي شَيْءٍ: आपका उनसे कोई संबंध नहीं, आप उनसे बरी (मुक्त) हैं।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन लोगों के बारे में है जिन्होंने अपने धर्म को तोड़-मरोड़कर अलग-अलग फ़िरक़ों में बाँट लिया—जैसे यहूदी और ईसाई, जिन्होंने अल्लाह के हुक्मों में से कुछ को माना और कुछ को छोड़ दिया, और आपस में ही विभिन्न गुटों और संप्रदायों में बँट गए। अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को संबोधित करते हुए फ़रमाता है कि ऐ रसूल! आपका इन लोगों से कोई वास्ता नहीं है, न आप उनके हैं और न वे आपके। आपका काम केवल उन्हें सत्य का संदेश पहुँचाना और डराना है। उनका मामला अल्लाह के हवाले है, वही उनका हिसाब लेगा। फिर क़ियामत के दिन वह उन्हें बता देगा कि उन्होंने दुनिया में क्या-क्या किया था—कौन सा अच्छा काम किया और कौन सा बुरा—और उसी के अनुसार उन्हें बदला देगा। जिसने तौबा कर ली और अच्छे कर्म किए, उसे अच्छा बदला मिलेगा, और जो बुराई पर अड़ा रहा, उसे उसकी सज़ा मिलेगी।
फ़ायदे (सीख):
इस आयत से हमें सीख मिलती है कि धर्म में फूट डालना और अलग-अलग गुटों में बँट जाना बहुत बड़ी गलती है। हमें एक होकर अल्लाह के आदेशों पर चलना चाहिए, न कि अपनी मनमर्ज़ी से धर्म को तोड़ना चाहिए।
यह आयत हमें सिखाती है कि किसी व्यक्ति का हिसाब लेना अल्लाह का काम है, हमारा काम नहीं। हमें दूसरों को अच्छी बात समझानी चाहिए, लेकिन उनके दिल के हालात और उनके अंजाम का फ़ैसला अल्लाह पर छोड़ देना चाहिए।
इस आयत से यह भी पता चलता है कि नबी ﷺ की बरी होने की घोषणा उन लोगों से है जो जानबूझकर सत्य को छोड़कर झूठ पर चलते हैं। यह हमें सिखाता है कि सत्य पर अडिग रहना चाहिए, चाहे लोग कितने भी हों।
यह आयत हमें याद दिलाती है कि क़ियामत का दिन सच है, और हर इंसान को अपने कर्मों का हिसाब देना होगा। इसलिए हमें अपने जीवन को अल्लाह की रज़ा के अनुसार ढालना चाहिए, ताकि उस दिन हमें शर्मिंदा न होना पड़े।
या ये कहने लगो कि अगर हम पर किताबे (ख़ुदा नाज़िल होती तो हम उन लोगों से कहीं बढ़कर राहे रास्त पर होते तो (देखो) अब तो यक़ीनन तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम्हारे पास एक रौशन दलील है (किताबे ख़ुदा) और हिदायत और रहमत आ चुकी तो जो शख्स ख़ुदा के आयात को झुठलाए और उससे मुँह फेरे उनसे बढ़ कर ज़ालिम कौन है जो लोग हमारी आयतों से मुँह फेरते हैं हम उनके मुँह फेरने के बदले में अनक़रीब ही बुरे अज़ाब की सज़ा देगें (ऐ रसूल) क्या ये लोग सिर्फ उसके मुन्तिज़र है कि उनके पास फरिश्ते आएं
या तुम्हारा परवरदिगार खुद (तुम्हारे पास) आये या तुम्हारे परवरदिगार की कुछ निशानियाँ आ जाएं (आख़िरकार क्योकर समझाया जाए) हालांकि जिस दिन तुम्हारे परवरदिगार की बाज़ निशानियाँ आ जाएंगी तो जो शख्स पहले से ईमान नहीं लाया होगा या अपने मोमिन होने की हालत में कोई नेक काम नहीं किया होगा तो अब उसका ईमान लाना उसको कुछ भी मुफ़ीद न होगा - (ऐ रसूल) तुम (उनसे) कह दो कि (अच्छा यही सही) तुम (भी) इन्तिज़ार करो हम भी इन्तिज़ार करते हैं
बेशक जिन लोगों ने आपने दीन में तफरक़ा डाला और कई फरीक़ बन गए थे उनसे कुछ सरोकार नहीं उनका मामला तो सिर्फ ख़ुदा के हवाले है फिर जो कुछ वह दुनिया में नेक या बद किया करते थे वह उन्हें बता देगा (उसकी रहमत तो देखो)
(ऐ रसूल) तुम उनसे कहो कि मुझे तो मेरे परवरदिगार ने सीधी राह यानि एक मज़बूत दीन इबराहीम के मज़हब की हिदायत फरमाई है बातिल से कतरा के चलते थे और मुशरेकीन से न थे
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