Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- فَتَنَّا: हमने परीक्षा में डाला / आज़माया
- بَعْضَهُم بِبَعْضٍ: उनमें से एक को दूसरे के द्वारा
- مَنَّ اللَّهُ عَلَيْهِمْ: अल्लाह ने उन पर उपकार किया (अर्थात् हिदायत का अनुग्रह किया)
- بِالشَّاكِرِينَ: कृतज्ञता जताने वालों को (अर्थात् जो नेमतों का शुक्र अदा करते हैं)
तफ़सीर:
यह आयत एक बहुत ही गहरी और महत्वपूर्ण हक़ीक़त को बयान करती है। अल्लाह तआला ने अपनी बेपनाह हिकमत से लोगों को एक-दूसरे के ज़रिए आज़माया है। यानी उसने किसी को दौलत दी तो किसी को फ़क़ीरी, किसी को ताक़त दी तो किसी को कमज़ोरी, किसी को ऊँचा मुक़ाम दिया तो किसी को पस्त हालत। यह सब कुछ अल्लाह की मर्ज़ी से है, ताकि लोग एक-दूसरे के ज़रिए परखे जाएँ — अमीर को फ़क़ीर के ज़रिए, ताक़तवर को कमज़ोर के ज़रिए, और बड़े लोगों को छोटे लोगों के ज़रिए।
इसी इम्तिहान की वजह से मक्का के कुफ़्फ़ार के सरदार, जो दौलत और रुतबे में बड़े थे, जब देखते थे कि ग़रीब और कमज़ोर लोग — जैसे बिलाल, अम्मार, सुहैब और ख़ब्बाब रज़ियल्लाहु अन्हुम — नबी करीम ﷺ पर ईमान ला चुके हैं, तो वे अहंकार और हैरत से कहते थे: "क्या यही लोग हैं जिन पर अल्लाह ने हम सबमें से चुनकर उपकार किया है? क्या हमारे बीच से इन्हीं को हिदायत का शरफ़ मिला?" उनकी यह बात दरअसल उनके घमंड और अंधेपन की निशानी थी। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि अल्लाह का फ़ज़ल और रहमत किसी की दौलत या नस्ल को नहीं देखता, बल्कि उसके दिल की सच्चाई और शुक्रगुज़ारी को देखता है।
अल्लाह तआला ने इसका जवाब ख़ुद दिया: "क्या अल्लाह उन लोगों को नहीं जानता जो शुक्र अदा करने वाले हैं?" यानी अल्लाह तो खूब जानता है कि कौन अपनी नेमतों का सही तरीक़े से शुक्र अदा करता है और उसे हिदायत का हक़दार बनाता है। जिन ग़रीब और कमज़ोर लोगों ने ईमान क़ुबूल किया, वही असल में शुक्रगुज़ार थे, क्योंकि उन्होंने हक़ को पहचाना और उसे क़ुबूल किया। रही बात अमीर और बड़े लोगों की, तो उनका घमंड और अकड़ ही उनके लिए फितना बन गई और वे हिदायत से महरूम रहे।
इस आयत में हमारे लिए बहुत बड़ी सीख है। यह हमें सिखाती है कि किसी इंसान की क़द्र उसकी दौलत, नस्ल, रंग या रुतबे से नहीं होती, बल्कि उसके दिल की पाकीज़गी, उसके ईमान और उसके अल्लाह के शुक्र से होती है। अल्लाह के नज़दीक सबसे प्यारा वही बंदा है जो उसका शुक्र अदा करे और उसकी नेमतों को पहचाने। यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हमें किसी को उसकी ज़ाहिरी हालत की वजह से हक़ीर नहीं समझना चाहिए, क्योंकि अल्लाह जानता है कि उसके बंदों में से कौन सच्चा शुक्रगुज़ार है और कौन नेमतों का इन्कारी। हमें चाहिए कि हम अपने दिल को अहंकार से पाक रखें, हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करें, और याद रखें कि हिदायत अल्लाह की तरफ़ से एक बड़ी नेमत है, जो वह जिसे चाहता है अपने फ़ज़ल से अता करता है।
📜 आयत 51-55 — सूरा अल-अनआम
अनुवाद — अल-अनआम 53
सूरा अल-अनआम आयत 53 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और इसी तरह हमने बाज़ आदमियों को बाज़ से आज़माया…सूरा आयत 53/165 — सूरा अल-अनआम الأنعام (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-अनआम सुनें, सूरा अल-अनआम अनुवाद, सूरा अल-अनआम mp3, सूरा अल-अनआम pdf. आयत 51–55. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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