Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- لَا يُؤْمِنُ: विश्वास नहीं करता था, ईमान नहीं रखता था।
- الْعَظِيمِ: महान, जिसकी महानता और प्रताप का कोई अंत नहीं।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उस भयानक दृश्य का हिस्सा है जो क़ियामत के दिन उन लोगों के साथ होगा जिन्होंने अल्लाह का इनकार किया और अपने जीवन में उसकी आज्ञाओं की परवाह नहीं की। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि उस दिन हुक्म दिया जाएगा: "पकड़ो इस अपराधी को, इसके हाथों को गर्दन से जोड़ दो, फिर इसे जहन्नम में डाल दो, और फिर सत्तर हाथ लंबी एक ज़ंजीर में इसे जकड़ दो।"
इसके बाद अल्लाह उस कठोर सज़ा का कारण बताता है: "क्योंकि वह अल्लाह महान पर ईमान नहीं रखता था।" यानी उसकी सारी मुसीबतों की जड़ यही थी कि उसने उस अल्लाह को नहीं पहचाना जो सारे जहान का मालिक है, जिसकी शान और अज़मत के आगे सब कुछ छोटा है। उसने न तो अल्लाह की वहदानियत (एकता) को दिल से स्वीकार किया, न उसके हुक्मों को अपने जीवन में लागू किया, और न ही उसकी राह में दूसरों को बुलाया।
यह आयत हमें एक बहुत बड़ी सीख देती है कि ईमान (विश्वास) सिर्फ ज़ुबान से कहने का नाम नहीं है, बल्कि यह दिल की गहराई से अल्लाह को मानना और उसकी हर बात को सच समझना है। जब यह ईमान दिल में जड़ पकड़ लेता है, तो इंसान अपने अंदर अल्लाह का डर पैदा करता है, अपने कर्मों को सुधारता है, और दूसरों के साथ भलाई करता है।
अल्लाह महान है — उसकी महानता का अंदाज़ा हम इसी से लगा सकते हैं कि उसकी एक ज़ंजीर सत्तर हाथ लंबी है, और उसका अज़ाब उन लोगों के लिए है जो उसके साथ कुफ़्र करते हैं। लेकिन साथ ही, वह बेहद रहम करने वाला भी है — जो कोई भी इस दुनिया में तौबा करके उसकी तरफ लौट आए, वह उसे माफ कर देता है और उसकी सारी गलतियों को धो डालता है।
इसलिए, हमें चाहिए कि हम अपने दिलों को अल्लाह के ईमान से रोशन करें, उसकी महानता को याद रखें, और अपनी ज़िंदगी के हर पल में उसकी रज़ा (प्रसन्नता) को तलाश करें। यही वह रास्ता है जो हमें उस भयानक अज़ाब से बचाकर उसकी रहमत और जन्नत तक पहुंचाएगा। अल्लाह हम सबको सच्चा ईमान अता करे और हमें उन लोगों में शामिल करे जो उसकी महानता को पहचानते हैं और उसकी इबादत में अपनी ज़िंदगी बिताते हैं। आमीन।
📜 आयत 31-35 — सूरा अल-हाक़्का
अनुवाद — अल-हाक़्का 33
सूरा अल-हाक़्का आयत 33 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (क्यों कि) ये न तो बुज़ुर्ग ख़ुदा ही पर ईमान…सूरा आयत 33/52 — सूरा अल-हाक़्का الحاقة (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-हाक़्का सुनें, सूरा अल-हाक़्का अनुवाद, सूरा अल-हाक़्का mp3, सूरा अल-हाक़्का pdf. आयत 31–35. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अल-हाक़्का
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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