और जिन लोगों ने हमारी आयतों को और आख़िरत की हुज़ूरी को झूठलाया उनका सब किया कराया अकारत हो गया, उनको बस उन्हीं आमाल की जज़ा या सज़ा दी जाएगी जो वह करते थे
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
كَذَّبُوا: झुठलाया, असत्य कहा
آيَاتِنَا: हमारी निशानियाँ, हमारे प्रमाण
لِقَاءِ الْآخِرَةِ: आख़िरत (परलोक) की मुलाक़ात, यानी मृत्यु के बाद जी उठना और अल्लाह के सामने हाज़िर होना
حَبِطَتْ: बेकार हो गईं, नष्ट हो गईं, व्यर्थ चली गईं
أَعْمَالُهُمْ: उनके कर्म, उनके अमल
هَلْ يُجْزَوْنَ: क्या उन्हें बदला दिया जाएगा? (यहाँ अर्थ है: उन्हें कोई बदला नहीं दिया जाएगा सिवाय...)
إِلَّا مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ: सिवाय उसके जो वे (दुनिया में) करते रहे थे
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन लोगों के हाल का वर्णन करती है जिन्होंने अल्लाह की आयतों और निशानियों को झुठलाया और आख़िरत के दिन अल्लाह के सामने पेश होने को भी नहीं माना। ऐसे लोगों के सारे अच्छे कर्म — चाहे वे दिखने में कितने ही भले क्यों न हों — अल्लाह की दृष्टि में बेकार और नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि उन कर्मों की बुनियाद ही ईमान पर नहीं टिकी थी। ईमान और आख़िरत पर यक़ीन ही वह शर्त है जिसके बिना कोई भी अच्छा काम अल्लाह के यहाँ क़बूल नहीं होता। जब यह शर्त ही गायब हो, तो सारे अमल बेकार हो जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे बिना नींव की दीवार कभी खड़ी नहीं रह सकती।
फिर अल्लाह तआला सवालिया अंदाज़ में फ़रमाता है: "क्या उन्हें बदला दिया जाएगा सिवाय उसके जो वे करते थे?" यानी उन्हें वही बदला मिलेगा जो उनके कर्मों के लायक़ है। उन्होंने दुनिया में कुफ़्र और शिर्क किया, अल्लाह की आयतों को झुठलाया और आख़िरत का इनकार किया — तो उनका बदला भी उन्हीं के कर्मों के अनुरूप होगा, यानी जहन्नम की आग में हमेशा रहना। यह अल्लाह का पूरा न्याय है कि वह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता; हर इंसान को उसकी कमाई का पूरा-पूरा बदला दिया जाता है।
फ़ायदे (सीख):
ईमान ही नेकियों की बुनियाद है — यह आयत हमें सिखाती है कि अच्छे कर्म तभी क़बूल होते हैं जब उनकी जड़ ईमान में हो। बिना ईमान के नेकियाँ बेकार हैं। इसलिए हमें सबसे पहले अपने ईमान की हिफ़ाज़त करनी चाहिए और उसे मज़बूत करना चाहिए।
आख़िरत पर यक़ीन ही इंसान को सही रास्ते पर चलाता है — जो व्यक्ति मृत्यु के बाद के जीवन, हिसाब और जज़ा-सज़ा पर पक्का यक़ीन रखता है, वह कभी गुनाहों में नहीं डूबता और नेकियों को अपना असली निवेश समझता है।
अल्लाह का न्याय बिल्कुल सटीक है — इस आयत से पता चलता है कि अल्लाह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता। हर इंसान को उसके कर्मों का पूरा बदला मिलेगा। यह बात हमें अपने अमल की ज़िम्मेदारी का एहसास कराती है।
कर्मों का अंजाम उन्हीं के अनुरूप होता है — जैसे कुफ़्र और इनकार का अंजाम जहन्नम है, वैसे ही ईमान और नेकी का अंजाम जन्नत है। यह आयत हमें नेक कर्मों की तरफ़ राग़िब करती है और बुरे कर्मों से डराती है।
दुनिया की नेकियाँ आख़िरत में काम आएँगी — यह आयत मुसलमान को यह उम्मीद देती है कि उसकी छोटी-छोटी नेकियाँ भी अल्लाह के यहाँ ज़ाया नहीं होंगी, बशर्ते वह ईमान की हालत में हो। यह बात दिल को सुकून और अमल की तरफ़ रग़बत देती है।
और हमने (तौरैत की) तख्तियों में मूसा के लिए हर तरह की नसीहत और हर चीज़ का तफसीलदार बयान लिख दिया था तो (ऐ मूसा) तुम उसे मज़बूती से तो (अमल करो) और अपनी क़ौम को हुक्म दे दो कि उसमें की अच्छी बातों पर अमल करें और बहुत जल्द तुम्हें बदकिरदारों का घर दिखा दूँगा (कि कैसे उजड़ते हैं)
जो लोग (ख़ुदा की) ज़मीन पर नाहक़ अकड़ते फिरते हैं उनको अपनी आयतों से बहुत जल्द फेर दूंगा और मै क्या फेरूंगा ख़ुदा (उसका दिल ऐसा सख्त है कि) अगर दुनिया जहॉन के सारे मौजिज़े भी देखते तो भी ये उन पर ईमान न लाएगें और (अगर) सीधा रास्ता भी देख पाएं तो भी अपनी राह न जाएगें और अगर गुमराही की राह देख लेगें तो झटपट उसको अपना तरीक़ा बना लेगें ये कजरवी इस सबब से हुई कि उन लोगों ने हमारी आयतों को झुठला दिया और उनसे ग़फलत करते रहे
और मूसा की क़ौम ने (कोहेतूर पर) उनके जाने के बाद अपने जेवरों को (गलाकर) एक बछड़े की मूरत बनाई (यानि) एक जिस्म जिसमें गाए की सी आवाज़ थी (अफसोस) क्या उन लोगों ने इतना भी न देखा कि वह न तो उनसे बात ही कर सकता और न किसी तरह की हिदायत ही कर सकता है (खुलासा) उन लोगों ने उसे (अपनी माबूद बना लिया)
और आप अपने ऊपर ज़ुल्म करते थे और जब वह पछताए और उन्होने अपने को यक़ीनी गुमराह देख लिया तब कहने लगे कि अगर हमारा परदिगार हम पर रहम नहीं करेगा और हमारा कुसूर न माफ़ करेगा तो हम यक़ीनी घाटा उठाने वालों में हो जाएगें
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