Mishary Rashid Alafasy
✓
Mahmoud Khalil Al-Husary
✓
Abdurrahman As-Sudais
✓
Mohamed Siddiq Al-Minshawi
✓
Abdul Basit Abdul Samad
✓
Ali Al-Hudhaify
✓
Ahmed ibn Ali al-Ajamy
✓
Abu Bakr Ash-Shaatree
✓
Muhammad Ayyoub
✓
Abdullah Basfar
✓
Abdullah Al-Juhani
✓
Maher Al Muaiqly
✓
अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- ظَلَمْنَا أَنفُسَنَا: हमने अपनी आत्माओं पर अत्याचार किया, अर्थात अपने लिए हानि का कारण बने।
- تَغْفِرْ لَنَا: तू हमें क्षमा कर दे।
- تَرْحَمْنَا: तू हम पर दया करे।
- الْخَاسِرِينَ: घाटे में रहने वाले, जिन्होंने अपना भाग्य खो दिया।
तफसीर (व्याख्या):
जब आदम (अलैहिस्सलाम) और हव्वा (रदिअल्लाहु अन्हा) ने उस पेड़ का फल खा लिया, जिससे उन्हें रोका गया था, तो उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और वे अत्यधिक पश्चाताप के साथ अपने रब की ओर मुड़े। उन्होंने यह स्वीकार करते हुए कहा: "ऐ हमारे रब! हमने स्वयं अपनी आत्माओं पर अत्याचार किया, क्योंकि हमने वह किया जिससे तूने हमें रोका था। हम अपने इस कुकर्म का दोष किसी और पर नहीं डालते, बल्कि अपनी गलती स्वीकार करते हैं। अब यदि तू हमें क्षमा नहीं करेगा और हम पर दया नहीं करेगा, तो हम निश्चित रूप से उन लोगों में से होंगे जिन्होंने दुनिया और आखिरत दोनों में अपना भाग्य खो दिया है, और वे घाटे में रहने वालों में शामिल होंगे।"
यह दुआ वही कलिमात (शब्द) हैं जो अल्लाह ने आदम (अलैहिस्सलाम) को सिखाए थे, और इन्हीं शब्दों के माध्यम से उन्होंने तौबा की, तो अल्लाह ने उनकी तौबा क़बूल की और उन्हें माफ़ कर दिया।
फ़ायदे (सबक):
- गलती स्वीकारना ईमान की निशानी है: आदम (अलैहिस्सलाम) और हव्वा ने अपनी गलती को बहाने बनाकर छिपाने की कोशिश नहीं की, बल्कि खुले दिल से उसे स्वीकार किया। यह हमें सिखाता है कि जब हमसे कोई गलती हो जाए, तो उसे स्वीकार करना चाहिए और अल्लाह से माफ़ी माँगनी चाहिए।
- तौबा का दरवाज़ा हमेशा खुला है: यह आयत हमें बताती है कि चाहे गलती कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अल्लाह की रहमत उससे कहीं बड़ी है। अल्लाह अपने बंदों की तौबा क़बूल करता है और उन पर दया करता है।
- अल्लाह से उम्मीद और डर का संतुलन: आदम (अलैहिस्सलाम) की दुआ में दोनों चीज़ें हैं — अल्लाह की रहमत से उम्मीद और उसके अज़ाब का डर। यह हमें सिखाता है कि हमें अल्लाह से डरते हुए भी उसकी रहमत से निराश नहीं होना चाहिए।
- दुआ में अल्लाह के नाम और सिफ़ात का सहारा: इस दुआ में "मग़फिरत" (क्षमा) और "रहमत" (दया) का ज़िक्र है, जो अल्लाह की दो सबसे बड़ी सिफ़ात हैं। यह हमें सिखाता है कि दुआ करते समय अल्लाह की सिफ़ात का वासीला बनाना बहुत पसंदीदा है।
- इंसान की फ़ितरत: यह आयत बताती है कि इंसान से गलती होना स्वाभाविक है, लेकिन असली बुराई गलती करना नहीं, बल्कि उस पर अड़े रहना और तौबा न करना है। इसलिए हमें हर हाल में अल्लाह की ओर लौटते रहना चाहिए।
📜 आयत 21-25 — सूरा अल-आराफ
अनुवाद — अल-आराफ 23
सूरा अल-आराफ आयत 23 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : ये दोनों अर्ज क़रने लगे ऐ हमारे पालने वाले हमने…सूरा आयत 23/206 — सूरा अल-आराफ الأعراف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-आराफ सुनें, सूरा अल-आराफ अनुवाद, सूरा अल-आराफ mp3, सूरा अल-आराफ pdf. आयत 21–25. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Wednesday, September 30, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए


