अल-जिन्न · 26/28
अनुवाद उच्चारण — अल-जिन्न
عَالِمُ الْغَيْبِ فَلَا يُظْهِرُ عَلَىٰ غَيْبِهِ أَحَدًا ۝٢٦
Aalimul ghaibi falaa yuzhiru alaa ghaibiheee ahadaa
📖 हिंदी अर्थ
(वही) ग़ैबवॉ है और अपनी ग़ैब की बाते किसी पर ज़ाहिर नहीं करता
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • عَالِمُ الْغَيْبِ (आलिमुल-ग़ैब): छिपी हुई चीज़ों का ज्ञान रखने वाला।
  • فَلَا يُظْهِرُ (फ़ला युज़्हिरु): प्रकट नहीं करता, किसी को सूचित नहीं करता।
  • عَلَىٰ غَيْبِهِ (अला ग़ैबिही): अपने छिपे हुए ज्ञान पर।
  • أَحَدًا (अहदन): किसी को भी।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने बंदों को यह बताता है कि वही अकेला छिपी हुई चीज़ों का ज्ञान रखने वाला है। उसके ज्ञान से कुछ भी छिपा नहीं है — न आसमानों में, न ज़मीन में, न दिलों के राज़, न भविष्य के हालात। वह अपने इस छिपे हुए ज्ञान (ग़ैब) को किसी भी मख़लूक़ (प्राणी) पर प्रकट नहीं करता, क्योंकि यह विशेष रूप से उसी की ज़ात का ख़ासा है।

हालाँकि, अल्लाह तआला ने अपने चुने हुए पैग़म्बरों (अलैहिमुस्सलाम) पर कुछ ऐसी छिपी बातें प्रकट कीं जो उनकी रिसालत (पैग़म्बरी) की सच्चाई का सबूत थीं। यह उनकी रहमत और कृपा थी, न कि इसलिए कि कोई उनके ज्ञान में साझीदार हो जाए। अल्लाह ने अपने रसूलों की हिफ़ाज़त के लिए फ़रिश्तों को भेजा, जो उन्हें जिन्नात के चोरी-छिपे कानाफूसी करने वालों से बचाते थे, ताकि वे वही बातें पहुँचाएँ जो अल्लाह ने चाहीं, और कोई शैतान उनमें मिलावट न कर सके।

यह आयत हमें सिखाती है कि हमें केवल अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए और उसी से ज्ञान की दुआ माँगनी चाहिए। हमारे लिए यही बेहतर है कि हम उन छिपी बातों के पीछे न भागें जो हमारे काम की नहीं, बल्कि अपने ईमान और अच्छे कर्मों पर ध्यान दें। अल्लाह ने हमें जो कुछ बताया है — क़ुरआन और सुन्नत के ज़रिए — वही हमारे लिए काफ़ी है। यही हमारी भलाई और सफलता का रास्ता है।

इस आयत से हमें यह भी पता चलता है कि अल्लाह का ज्ञान असीमित है और वह हर चीज़ को गिनती और हद के साथ जानता है। कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है — न छोटी, न बड़ी। यह हमारे दिलों को सुकून देता है कि हमारा रब सब कुछ जानता है, और हम उसी की रहमत और इनायत पर भरोसा कर सकते हैं।

🎧 सुनें

📜 आयत 24-28 — अल-जिन्न

24حَتَّىٰ إِذَا رَأَوْا مَا يُوعَدُونَ فَسَيَعْلَمُونَ مَنْ أَضْعَفُ نَاصِرًا وَأَقَلُّ عَدَدًا
यहाँ तक कि जब ये लोग उन चीज़ों को देख लेंगे जिनका उनसे वायदा किया जाता है तो उनको मालूम हो जाएगा कि किसके मददगार कमज़ोर और किसका शुमार कम है
25قُلْ إِنْ أَدْرِي أَقَرِيبٌ مَّا تُوعَدُونَ أَمْ يَجْعَلُ لَهُ رَبِّي أَمَدًا
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं नहीं जानता कि जिस दिन का तुमसे वायदा किया जाता है क़रीब है या मेरे परवरदिगार ने उसकी मुद्दत दराज़ कर दी है
26عَالِمُ الْغَيْبِ فَلَا يُظْهِرُ عَلَىٰ غَيْبِهِ أَحَدًا
(वही) ग़ैबवॉ है और अपनी ग़ैब की बाते किसी पर ज़ाहिर नहीं करता
27إِلَّا مَنِ ارْتَضَىٰ مِن رَّسُولٍ فَإِنَّهُ يَسْلُكُ مِن بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِهِ رَصَدًا
मगर जिस पैग़म्बर को पसन्द फरमाए तो उसके आगे और पीछे निगेहबान फरिश्ते मुक़र्रर कर देता है
28لِّيَعْلَمَ أَن قَدْ أَبْلَغُوا رِسَالَاتِ رَبِّهِمْ وَأَحَاطَ بِمَا لَدَيْهِمْ وَأَحْصَىٰ كُلَّ شَيْءٍ عَدَدًا
ताकि देख ले कि उन्होंने अपने परवरदिगार के पैग़ामात पहुँचा दिए और (यूँ तो) जो कुछ उनके पास है वह सब पर हावी है और उसने तो एक एक चीज़ गिन रखी हैं
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अनुवाद — अल-जिन्न 26

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Tuesday, August 18, 2026

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