अल-अनफाल · 31/75
अनुवाद उच्चारण — अल-अनफाल
وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ آيَاتُنَا قَالُوا قَدْ سَمِعْنَا لَوْ نَشَاءُ لَقُلْنَا مِثْلَ هَٰذَا ۙ إِنْ هَٰذَا إِلَّا أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ ۝٣١
Wa izaa tutlaa `alaihim Aayaatunaa qaaloo qad sami`naa law nashaaa`u laqulnaa misla haazaaa in haazaaa illaaa asaateerul awwaleen
📖 हिंदी अर्थ
और ख़ुदा तो सब तदबीरकरने वालों से बेहतर है और जब उनके सामने हमारी आयते पढ़ी जाती हैं तो बोल उठते हैं कि हमने सुना तो लेकिन अगर हम चाहें तो यक़ीनन ऐसा ही (क़रार) हम भी कह सकते हैं-तो बस अगलों के क़िस्से है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آيَاتُنَا (हमारी आयतें): अर्थात हमारे पैग़म्बर पर उतारी गई क़ुरआन की आयतें।
  • أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ (पहले लोगों की कहानियाँ): "أساطير" "أسطورة" का बहुवचन है, जिसका अर्थ है लिखी हुई कहानियाँ या किस्से। यहाँ आशय पुरानी उम्मतों के उन क़िस्सों से है जो उन्होंने अपनी किताबों में लिखे थे।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब इन काफ़िरों के सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती थीं, तो वे अहंकार और सत्य से मुँह मोड़ने की वजह से कहते थे: "हमने यह सब सुन लिया है। अगर हम चाहें तो इस जैसा (कलाम) हम भी कह सकते हैं।" उनका यह कथन पूर्णतः झूठ और दिखावा था, क्योंकि यह उनके अहंकार और हठधर्मिता से निकला था। वे वास्तव में ऐसा करने पर कभी क़ादिर नहीं थे, बल्कि यह उनकी ओर से सत्य को झुठलाने की एक कोशिश थी।

इसके बाद वे कहते थे: "यह (क़ुरआन) तो बस पहले लोगों की कहानियाँ हैं, जिन्हें (मुहम्मद ﷺ) ने लिख लिया है और हमें सुना रहे हैं।" यह बात विशेष रूप से नज़्र बिन हारिस के बारे में कही गई, जो व्यापार के सिलसिले में हीरा, फ़ारस और रूम जाता था, वहाँ के लोगों की कहानियाँ सुनता था और लौटकर कहता था कि मुहम्मद (ﷺ) भी ऐसी ही कहानियाँ सुनाते हैं। वे इन आयतों को बस पुरानी उम्मतों के क़िस्से और लिखी हुई रिवायतें कहकर खारिज कर देते थे, ताकि लोग उन पर ईमान न लाएँ।


फ़ायदे (सीख):

  1. इस आयत से पता चलता है कि काफ़िरों का यह दावा कि "हम भी ऐसा कह सकते हैं" महज़ झूठ और घमंड था। अल्लाह ने क़ुरआन को इस तरह अजीज़ (चमत्कार) बनाया है कि पूरी दुनिया मिलकर भी उस जैसी एक सूरत नहीं ला सकती। यह क़ुरआन की सच्चाई और अल्लाह की ओर से होने की सबसे बड़ी निशानी है।
  2. आयत से यह भी सीख मिलती है कि सत्य को झुठलाने के लिए लोग कई तरह के बहाने बनाते हैं, लेकिन अल्लाह के दीन की हक़ीक़त कभी नहीं बदलती। क़ुरआन की आयतें चाहे कितनी भी पढ़ी जाएँ, वे दिलों को रौशनी देती हैं और सच्चे लोगों को हिदायत देती हैं।
  3. इस आयत में उन लोगों की भी निशानदेही है जो क़ुरआन को महज़ कहानियाँ या इतिहास की किताब समझते हैं। हक़ीक़त यह है कि क़ुरआन सिर्फ़ क़िस्सों का संग्रह नहीं, बल्कि ज़िंदगी के हर पहलू के लिए हिदायत और रहनुमाई है। इसमें अक़ीदे, इबादत, अख़लाक़, मुआमलात और आख़िरत की तैयारी — सब कुछ मौजूद है।
  4. आख़िर में यह सीख मिलती है कि जब लोग सच्चाई सुनकर भी उसे न मानें और बहाने बनाएँ, तो हमें अपना फ़र्ज़ निभाते रहना चाहिए। हिदायत देना अल्लाह के हाथ में है, हमारा काम सिर्फ़ पैग़ाम पहुँचाना है।
🎧 सुनें

📜 आयत 29-33 — अल-अनफाल

29يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِن تَتَّقُوا اللَّهَ يَجْعَل لَّكُمْ فُرْقَانًا وَيُكَفِّرْ عَنكُمْ سَيِّئَاتِكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ۗ وَاللَّهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ
और यक़ीनन ख़ुदा के हॉ बड़ी मज़दूरी है ऐ ईमानदारों अगर तुम ख़ुदा से डरते रहोगे तो वह तुम्हारे वास्ते इम्तियाज़ पैदा करे देगा और तुम्हारी तरफ से तुम्हारे गुनाह का कफ्फ़ारा क़रार देगा और तुम्हें बख्श देगा और ख़ुदा बड़ा साहब फज़ल (व करम) है
30وَإِذْ يَمْكُرُ بِكَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِيُثْبِتُوكَ أَوْ يَقْتُلُوكَ أَوْ يُخْرِجُوكَ ۚ وَيَمْكُرُونَ وَيَمْكُرُ اللَّهُ ۖ وَاللَّهُ خَيْرُ الْمَاكِرِينَ
और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब कुफ्फ़ार तुम से फरेब कर रहे थे ताकि तुमको क़ैद कर लें या तुमको मार डाले तुम्हें (घर से) निकाल बाहर करे वह तो ये तदबीर (चालाकी) कर रहे थे और ख़ुदा भी (उनके ख़िलाफ) तदबीरकर रहा था
31وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ آيَاتُنَا قَالُوا قَدْ سَمِعْنَا لَوْ نَشَاءُ لَقُلْنَا مِثْلَ هَٰذَا ۙ إِنْ هَٰذَا إِلَّا أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ
और ख़ुदा तो सब तदबीरकरने वालों से बेहतर है और जब उनके सामने हमारी आयते पढ़ी जाती हैं तो बोल उठते हैं कि हमने सुना तो लेकिन अगर हम चाहें तो यक़ीनन ऐसा ही (क़रार) हम भी कह सकते हैं-तो बस अगलों के क़िस्से है
32وَإِذْ قَالُوا اللَّهُمَّ إِن كَانَ هَٰذَا هُوَ الْحَقَّ مِنْ عِندِكَ فَأَمْطِرْ عَلَيْنَا حِجَارَةً مِّنَ السَّمَاءِ أَوِ ائْتِنَا بِعَذَابٍ أَلِيمٍ
और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब उन काफिरों ने दुआएँ माँगीं थी कि ख़ुदा (वन्द) अगर ये (दीन इस्लाम) हक़ है और तेरे पास से (आया है) तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा या हम पर कोई और दर्दनाक अज़ाब ही नाज़िल फरमा
33وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَأَنتَ فِيهِمْ ۚ وَمَا كَانَ اللَّهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ
हालॉकि जब तक तुम उनके दरमियान मौजूद हो ख़ुदा उन पर अज़ाब नहीं करेगा और अल्लाह ऐसा भी नही कि लोग तो उससे अपने गुनाहो की माफी माँग रहे हैं और ख़ुदा उन पर नाज़िल फरमाए
अल-अनफालकुरान सूची
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अनुवाद — अल-अनफाल 31

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Tuesday, August 18, 2026

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