Wa iz qaalul laahumma in kaana haazaa huwal haqqa min `indika fa amtir `alainaa hijaaratam minas samaaa`i awi`tinaa bi `azaabin alaeem
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब उन काफिरों ने दुआएँ माँगीं थी कि ख़ुदा (वन्द) अगर ये (दीन इस्लाम) हक़ है और तेरे पास से (आया है) तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा या हम पर कोई और दर्दनाक अज़ाब ही नाज़िल फरमा
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اور جب انہوں نے کہا کہ اے خدا اگر یہ (قرآن) تیری طرف سے برحق ہے تو ہم پر آسمان سے پتھر برسا یا کوئی اور تکلیف دینے والا عذاب بھیج
فَأَمْطِرْ عَلَيْنَا حِجَارَةً – हम पर पत्थरों की बारिश कर दे।
عَذَابٍ أَلِيمٍ – दर्दनाक (कष्टदायी) यातना।
तफ़सीर (व्याख्या):
ऐ नबी! उस समय को याद करो जब आपके क़ौम के मुशरिकीन (बहुदेववादी) लोगों ने अल्लाह से यह कहा था: "ऐ अल्लाह! अगर यह (क़ुरआन) जो मुहम्मद लाए हैं, वास्तव में तेरी ओर से सच्चा (धर्म) है, तो हम पर आसमान से पत्थरों की बारिश कर दे, या हम पर कोई और दर्दनाक यातना भेज दे।"
यह बात उन्होंने अपनी ज़िद, हठधर्मिता और सत्य के इनकार की अत्यधिकता के कारण कही थी। वे इस्लाम और क़ुरआन का मज़ाक उड़ा रहे थे और अपने इस दावे में पूरी तरह से यक़ीन रखते थे कि यह सत्य नहीं है। इसलिए उन्होंने यह अजीबोग़रीब माँग की। इस आयत में उनके इसी उपहासपूर्ण और अभिमानपूर्ण रवैये का उल्लेख किया गया है।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
अल्लाह के नबी और उसके धर्म का मज़ाक उड़ाना और उसे झुठलाना अत्यंत गंभीर अपराध है, जिसके लिए अल्लाह की ओर से कठोर चेतावनी है।
यह आयत बताती है कि सत्य के सामने आने के बाद भी अगर इंसान हठधर्मी और अहंकार पर अड़ा रहे, तो वह अपने लिए विनाश का रास्ता चुनता है।
अल्लाह की रहमत और मेहरबानी यह है कि वह जल्दी से यातना भेजने में जल्दबाज़ी नहीं करता, बल्कि लोगों को तौबा (पश्चाताप) और सुधार का मौक़ा देता है।
इस आयत से मुसलमानों को यह सबक मिलता है कि वे अपने दुश्मनों की धमकियों और उपहास से विचलित न हों, क्योंकि अल्लाह अपने नबी और सच्चे धर्म की हिफ़ाज़त करने वाला है।
यह भी शिक्षा है कि इंसान को अपनी ज़ुबान से हर बात सोच-समझकर निकालनी चाहिए, क्योंकि अल्लाह हर बात को सुनता और जानता है, और वह उसका हिसाब लेगा।
और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब उन काफिरों ने दुआएँ माँगीं थी कि ख़ुदा (वन्द) अगर ये (दीन इस्लाम) हक़ है और तेरे पास से (आया है) तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा या हम पर कोई और दर्दनाक अज़ाब ही नाज़िल फरमा
और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब कुफ्फ़ार तुम से फरेब कर रहे थे ताकि तुमको क़ैद कर लें या तुमको मार डाले तुम्हें (घर से) निकाल बाहर करे वह तो ये तदबीर (चालाकी) कर रहे थे और ख़ुदा भी (उनके ख़िलाफ) तदबीरकर रहा था
और ख़ुदा तो सब तदबीरकरने वालों से बेहतर है और जब उनके सामने हमारी आयते पढ़ी जाती हैं तो बोल उठते हैं कि हमने सुना तो लेकिन अगर हम चाहें तो यक़ीनन ऐसा ही (क़रार) हम भी कह सकते हैं-तो बस अगलों के क़िस्से है
और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब उन काफिरों ने दुआएँ माँगीं थी कि ख़ुदा (वन्द) अगर ये (दीन इस्लाम) हक़ है और तेरे पास से (आया है) तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा या हम पर कोई और दर्दनाक अज़ाब ही नाज़िल फरमा
हालॉकि जब तक तुम उनके दरमियान मौजूद हो ख़ुदा उन पर अज़ाब नहीं करेगा और अल्लाह ऐसा भी नही कि लोग तो उससे अपने गुनाहो की माफी माँग रहे हैं और ख़ुदा उन पर नाज़िल फरमाए
और जब ये लोग लोगों को मस्जिदुल हराम (ख़ान ए काबा की इबादत) से रोकते है तो फिर उनके लिए कौन सी बात बाक़ी है कि उन पर अज़ाब न नाज़िल करे और ये लोग तो ख़ानाए काबा के मुतवल्ली भी नहीं (फिर क्यों रोकते है) इसके मुतवल्ली तो सिर्फ परहेज़गार लोग हैं मगर इन काफ़िरों में से बहुतेरे नहीं जानते
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