अल-अनफाल · 33/75
अनुवाद उच्चारण — अल-अनफाल
وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَأَنتَ فِيهِمْ ۚ وَمَا كَانَ اللَّهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ ۝٣٣
Wa maa kanal laahu liyu`az zibahum wa anta feehim; wa maa kaanal laahu mu`az zibahum wa hum yastaghfiroon
📖 हिंदी अर्थ
हालॉकि जब तक तुम उनके दरमियान मौजूद हो ख़ुदा उन पर अज़ाब नहीं करेगा और अल्लाह ऐसा भी नही कि लोग तो उससे अपने गुनाहो की माफी माँग रहे हैं और ख़ुदा उन पर नाज़िल फरमाए
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अनुवाद — Tafsir

कठिन शब्दों के अर्थ:

  • لِيُعَذِّبَهُمْ: उन्हें यातना दे
  • وَأَنتَ فِيهِمْ: जबकि आप (ऐ नबी) उनके बीच में हों
  • يَسْتَغْفِرُونَ: क्षमा माँगते हों

व्याख्या:

अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को सांत्वना देते हुए बताता है कि उसने इन मक्का के मुशरिकों को उनके कुफ्र और ज़ुल्म के बावजूद उस विनाशकारी यातना से क्यों नहीं पकड़ा जो पिछली उम्मतों पर आई थी। इसका पहला कारण यह है कि आप ﷺ उनके बीच मौजूद हैं। जब तक आप उनके बीच हैं, अल्लाह उन्हें ऐसी सामूहिक यातना नहीं देगा जो सबको नष्ट कर दे, क्योंकि आपकी मौजूदगी उनके लिए रहमत और अमान (सुरक्षा) है। दूसरा कारण यह है कि उनमें से कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने गुनाहों से तौबा करके अल्लाह से माफ़ी माँगते हैं, और यह इस्तिग़फ़ार (क्षमा की प्रार्थना) उनसे अज़ाब को टालने का ज़रिया बन जाता है। यानी अल्लाह की रहमत उन्हें इसलिए भी ढक रही है कि उनके बीच इस्तिग़फ़ार करने वाले लोग मौजूद हैं।

फ़ायदे और सबक:

  1. नबी ﷺ की मौजूदगी उम्मत के लिए अल्लाह की ओर से सबसे बड़ी रहमत और अमान है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह के नेक बंदों की मौजूदगी किसी समाज पर अल्लाह की यातना को टाल सकती है।
  2. इस्तिग़फ़ार (क्षमा माँगना) एक ऐसा हथियार है जो अल्लाह की यातना को रोक देता है। जब तक लोग सच्चे दिल से अल्लाह से माफ़ी माँगते हैं, अल्लाह उन पर रहमत बरसाता है और उन्हें आफ़तों से बचाता है।
  3. यह आयत हमें तौबा और इस्तिग़फ़ार की आदत डालने की तरग़ीब देती है। हमें चाहिए कि अपने गुनाहों पर शर्मिंदा हों और बार-बार अल्लाह से माफ़ी माँगें, क्योंकि यही वह रस्सी है जो हमें अल्लाह की पकड़ से बचाती है।
  4. अल्लाह की रहमत उसके ग़ज़ब से पहले आती है। वह जल्दी सज़ा देने वाला नहीं, बल्कि मौका देने वाला और माफ़ करने वाला है। यह हमें अल्लाह की रहमत से निराश न होने की शिक्षा देता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 31-35 — अल-अनफाल

31وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ آيَاتُنَا قَالُوا قَدْ سَمِعْنَا لَوْ نَشَاءُ لَقُلْنَا مِثْلَ هَٰذَا ۙ إِنْ هَٰذَا إِلَّا أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ
और ख़ुदा तो सब तदबीरकरने वालों से बेहतर है और जब उनके सामने हमारी आयते पढ़ी जाती हैं तो बोल उठते हैं कि हमने सुना तो लेकिन अगर हम चाहें तो यक़ीनन ऐसा ही (क़रार) हम भी कह सकते हैं-तो बस अगलों के क़िस्से है
32وَإِذْ قَالُوا اللَّهُمَّ إِن كَانَ هَٰذَا هُوَ الْحَقَّ مِنْ عِندِكَ فَأَمْطِرْ عَلَيْنَا حِجَارَةً مِّنَ السَّمَاءِ أَوِ ائْتِنَا بِعَذَابٍ أَلِيمٍ
और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब उन काफिरों ने दुआएँ माँगीं थी कि ख़ुदा (वन्द) अगर ये (दीन इस्लाम) हक़ है और तेरे पास से (आया है) तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा या हम पर कोई और दर्दनाक अज़ाब ही नाज़िल फरमा
33وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَأَنتَ فِيهِمْ ۚ وَمَا كَانَ اللَّهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ
हालॉकि जब तक तुम उनके दरमियान मौजूद हो ख़ुदा उन पर अज़ाब नहीं करेगा और अल्लाह ऐसा भी नही कि लोग तो उससे अपने गुनाहो की माफी माँग रहे हैं और ख़ुदा उन पर नाज़िल फरमाए
34وَمَا لَهُمْ أَلَّا يُعَذِّبَهُمُ اللَّهُ وَهُمْ يَصُدُّونَ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَمَا كَانُوا أَوْلِيَاءَهُ ۚ إِنْ أَوْلِيَاؤُهُ إِلَّا الْمُتَّقُونَ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
और जब ये लोग लोगों को मस्जिदुल हराम (ख़ान ए काबा की इबादत) से रोकते है तो फिर उनके लिए कौन सी बात बाक़ी है कि उन पर अज़ाब न नाज़िल करे और ये लोग तो ख़ानाए काबा के मुतवल्ली भी नहीं (फिर क्यों रोकते है) इसके मुतवल्ली तो सिर्फ परहेज़गार लोग हैं मगर इन काफ़िरों में से बहुतेरे नहीं जानते
35وَمَا كَانَ صَلَاتُهُمْ عِندَ الْبَيْتِ إِلَّا مُكَاءً وَتَصْدِيَةً ۚ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ
और ख़ानाए काबे के पास सीटियॉ तालिया बजाने के सिवा उनकी नमाज ही क्या थी तो (ऐ काफिरों) जब तुम कुफ्र किया करते थे उसकी सज़ा में (पड़े) अज़ाब के मज़े चखो
अल-अनफालकुरान सूची
75आयत
मदनीRevelation
33आयत

अनुवाद — अल-अनफाल 33

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Tuesday, August 18, 2026

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