अल-फज्र · 15/30
अनुवाद उच्चारण — अल-फज्र
فَأَمَّا الْإِنسَانُ إِذَا مَا ابْتَلَاهُ رَبُّهُ فَأَكْرَمَهُ وَنَعَّمَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَكْرَمَنِ ۝١٥
Fa ammal insaanu izaa mab talaahu Rabbuhoo fa akramahoo wa na` `amahoo fa yaqoolu Rabbeee akraman
📖 हिंदी अर्थ
लेकिन इन्सान जब उसको उसका परवरदिगार (इस तरह) आज़माता है कि उसको इज्ज़त व नेअमत देता है, तो कहता है कि मेरे परवरदिगार ने मुझे इज्ज़त दी है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ابْتَلَاهُ: उसकी परीक्षा ली
  • فَأَكْرَمَهُ: उसे सम्मानित किया
  • وَنَعَّمَهُ: उसे सुख-समृद्धि प्रदान की
  • رَبِّي أَكْرَمَنِ: मेरे रब ने मुझे सम्मानित किया

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला फरमाता है कि इंसान की फितरत (प्रकृति) ही ऐसी है कि जब उसका रब उसे धन-दौलत, संतान, प्रतिष्ठा और आराम-आसाइश जैसी नेमतें देकर परीक्षा लेता है, और उस पर अपनी रहमतें बरसाता है, तो वह तुरंत यह समझ बैठता है कि यह सब उसकी अपनी खूबियों और अल्लाह के यहाँ उसकी विशेष इज़्ज़त की वजह से है। वह घमंड में आकर कहता है: "मेरे रब ने मुझे सम्मानित किया है।"

यानी वह यह भूल जाता है कि यह नेमतें अल्लाह की ओर से एक इम्तिहान (परीक्षा) हैं, न कि उसकी काबिलियत का इनाम। वह यह नहीं सोचता कि अल्लाह जिसे चाहता है रिज़्क़ देता है और जिससे चाहता है रोक लेता है। यह सब कुछ अल्लाह की मर्ज़ी और हिकमत से होता है, न कि उसकी ज़ाती खूबी की वजह से।

यह आयत हमें सिखाती है कि नेमतें अल्लाह की तरफ से एक अमानत और परीक्षा हैं। जब अल्लाह हमें नेमतें देता है, तो हमें उसका शुक्र अदा करना चाहिए और यह समझना चाहिए कि यह अल्लाह की फज़ल (कृपा) है, न कि हमारी अपनी काबिलियत। घमंड और अहंकार इंसान को अल्लाह की नेमतों की कद्र करने से महरूम कर देता है।

याद रखिए! अल्लाह की नेमतें किसी की इज़्ज़त का सबूत नहीं हैं और न ही मुसीबतें किसी की बेइज़्ज़ती का सबूत हैं। असली इज़्ज़त तो अल्लाह की इताअत (आज्ञाकारिता) और उसके दीन पर साबित क़दम रहने में है। जो इंसान नेमत पाकर शुक्र करता है और मुसीबत में सब्र करता है, वही अल्लाह के यहाँ सच्चा इज़्ज़त वाला है।

अल्लाह हमें नेमतों की कद्र करने और उसका शुक्र अदा करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 13-17 — अल-फज्र

13فَصَبَّ عَلَيْهِمْ رَبُّكَ سَوْطَ عَذَابٍ
तो तुम्हारे परवरदिगार ने उन पर अज़ाब का कोड़ा लगाया
14إِنَّ رَبَّكَ لَبِالْمِرْصَادِ
बेशक तुम्हारा परवरदिगार ताक में है
15فَأَمَّا الْإِنسَانُ إِذَا مَا ابْتَلَاهُ رَبُّهُ فَأَكْرَمَهُ وَنَعَّمَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَكْرَمَنِ
लेकिन इन्सान जब उसको उसका परवरदिगार (इस तरह) आज़माता है कि उसको इज्ज़त व नेअमत देता है, तो कहता है कि मेरे परवरदिगार ने मुझे इज्ज़त दी है
16وَأَمَّا إِذَا مَا ابْتَلَاهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَهَانَنِ
मगर जब उसको (इस तरह) आज़माता है कि उस पर रोज़ी को तंग कर देता है बोल उठता है कि मेरे परवरदिगार ने मुझे ज़लील किया
17كَلَّا ۖ بَل لَّا تُكْرِمُونَ الْيَتِيمَ
हरगिज़ नहीं बल्कि तुम लोग न यतीम की ख़ातिरदारी करते हो
अल-फज्रकुरान सूची
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अनुवाद — अल-फज्र 15

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Tuesday, August 18, 2026

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