अल-फज्र · 16/30
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-फज्र
وَأَمَّا إِذَا مَا ابْتَلَاهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَهَانَنِ ۝١٦
Wa ammaaa izaa mabtalaahu faqadara `alaihi rizqahoo fa yaqoolu Rabbeee ahaanan
📖 हिंदी अर्थ
मगर जब उसको (इस तरह) आज़माता है कि उस पर रोज़ी को तंग कर देता है बोल उठता है कि मेरे परवरदिगार ने मुझे ज़लील किया

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ابْتَلَاهُ: उसे आज़माया, परीक्षण किया।
  • فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُ: उसकी रोज़ी में तंगी कर दी, उसे सीमित कर दिया।
  • رَبِّي أَهَانَنِ: मेरे रब ने मुझे अपमानित किया।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब अल्लाह किसी इंसान को आज़माइश में डालता है और उसकी रोज़ी में तंगी कर देता है, यानी उसे ग़रीबी और मुश्किलों में डाल देता है, तो वह इंसान यह समझ बैठता है कि अल्लाह ने उसे अपमानित करने के लिए ऐसा किया है। वह कहता है: "मेरे रब ने मुझे ज़लील कर दिया।"

हालाँकि यह सोचना बिल्कुल ग़लत है। अल्लाह तआला जिसे चाहता है रोज़ी में कुशादगी (खुलापन) देता है और जिसे चाहता है तंगी देता है, लेकिन यह उसकी हिकमत (बुद्धिमत्ता) पर आधारित होता है। कभी-कभी अल्लाह किसी बंदे को ग़रीबी देकर उसका इम्तिहान लेता है कि वह सब्र करता है या नहीं, शुक्र करता है या नहीं। यह ज़रूरी नहीं कि तंगी हमेशा अपमान का कारण हो, और न ही कुशादगी हमेशा इज़्ज़त का सबब होती है।

अल्लाह तआला ने इस आयत में इंसान की इस ग़लतफ़हमी को बयान किया है कि वह दौलत को इज़्ज़त और ग़रीबी को ज़िल्लत समझ लेता है। हक़ीक़त यह है कि अल्लाह जिसे चाहता है आज़माता है — कभी नेमत से और कभी मुसीबत से — ताकि देखे कि बंदा कैसा अमल करता है।

प्यारे भाइयो और बहनो! हमें यह समझना चाहिए कि अल्लाह की तरफ़ से आने वाली हर चीज़ — चाहे वह खुशहाली हो या तंगी — हमारे लिए इम्तिहान है। जब हमें माल मिले तो हमें शुक्र करना चाहिए और अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ खर्च करना चाहिए, और जब तंगी हो तो सब्र करना चाहिए और यह यक़ीन रखना चाहिए कि अल्लाह की हर बात में भलाई है। यही वह रास्ता है जो हमें अल्लाह की रज़ा और उसकी जन्नत तक पहुँचाता है। अल्लाह हमें सच्ची समझ और सब्र अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 14-18 — सूरा अल-फज्र

14إِنَّ رَبَّكَ لَبِالْمِرْصَادِ
बेशक तुम्हारा परवरदिगार ताक में है
15فَأَمَّا الْإِنسَانُ إِذَا مَا ابْتَلَاهُ رَبُّهُ فَأَكْرَمَهُ وَنَعَّمَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَكْرَمَنِ
लेकिन इन्सान जब उसको उसका परवरदिगार (इस तरह) आज़माता है कि उसको इज्ज़त व नेअमत देता है, तो कहता है कि मेरे परवरदिगार ने मुझे इज्ज़त दी है
16وَأَمَّا إِذَا مَا ابْتَلَاهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَهَانَنِ
मगर जब उसको (इस तरह) आज़माता है कि उस पर रोज़ी को तंग कर देता है बोल उठता है कि मेरे परवरदिगार ने मुझे ज़लील किया
17كَلَّا ۖ بَل لَّا تُكْرِمُونَ الْيَتِيمَ
हरगिज़ नहीं बल्कि तुम लोग न यतीम की ख़ातिरदारी करते हो
18وَلَا تَحَاضُّونَ عَلَىٰ طَعَامِ الْمِسْكِينِ
और न मोहताज को खाना खिलाने की तरग़ीब देते हो
अल-फज्रकुरान सूची
30आयत
मक्कीअवतरण स्थान
16आयत

अनुवाद — अल-फज्र 16

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Monday, September 28, 2026

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