अत-तौबा · 26/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
ثُمَّ أَنزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ وَعَلَى الْمُؤْمِنِينَ وَأَنزَلَ جُنُودًا لَّمْ تَرَوْهَا وَعَذَّبَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الْكَافِرِينَ ۝٢٦
Summa anzalal laahu sakeenatahoo `alaa Rasoolihee wa `alalmu `mineena wa anzala junoodal lam tarawhaa wa azzabal lazeena kafaroo; wa zaalika jazaaa`ul kaafireen
📖 हिंदी अर्थ
तब ख़ुदा ने अपने रसूल पर और मोमिनीन पर अपनी (तरफ से) तसकीन नाज़िल फरमाई और (रसूल की ख़ातिर से) फ़रिश्तों के लश्कर भेजे जिन्हें तुम देखते भी नहीं थे और कुफ्फ़ार पर अज़ाब नाज़िल फरमाया और काफिरों की यही सज़ा है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سَكِينَتَهُ: अपनी ओर से सुकून, शांति और मन की तसल्ली।
  • جُنُودًا لَّمْ تَرَوْهَا: ऐसे लश्कर (फ़रिश्ते) जिन्हें तुमने देखा नहीं।
  • عَذَّبَ الَّذِينَ كَفَرُوا: काफ़िरों को अज़ाब में डाला (क़त्ल, क़ैद, माल की लूट और स्त्री-बच्चों की ग़ुलामी के रूप में)।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला ने मुसलमानों को उस मुश्किल घड़ी का हाल बताया है जब हुनैन के मैदान में शुरुआती पलटन के बाद कुछ लोग पीछे हट गए थे। उस वक़्त अल्लाह ने अपने रसूल ﷺ और सच्चे ईमानवालों पर अपनी ख़ास सुकून और इत्मिनान नाज़िल फ़रमाया, जिससे उनके दिल मज़बूत हो गए और वे दुश्मन के मुक़ाबले में जमे रहे। फिर अल्लाह ने ऐसे लश्कर भेजे जिन्हें लोगों ने नहीं देखा—यानी फ़रिश्तों के जत्थे—जिन्होंने काफ़िरों के दिलों में रौब डाला और मोमिनीन की हिम्मत बढ़ाई। इसके बाद अल्लाह ने काफ़िरों को अज़ाब में डाला: उनमें से कुछ क़त्ल हुए, कुछ क़ैद हुए, उनका माल लूटा गया और उनके बाल-बच्चे क़ैद कर लिए गए। यह सब उनका दुनिया में बदला था, और आख़िरत में उनके लिए जहन्नुम की आग है। यही काफ़िरों का हक़ीक़ी जज़ा है जिन्होंने अल्लाह के रसूल को झुठलाया और उसके दीन से रोका।


फ़ायदे (सबक़):

  1. अल्लाह अपने नबी और मोमिनीन को मुसीबत की घड़ी में सुकून अता करता है, और यह सुकून दिलों का ऐसा सहारा है जो हर मुश्किल में काम आता है।
  2. अल्लाह की मदद ग़ैब से आती है—कभी फ़रिश्तों के ज़रिए, कभी दिलों में रौब डालकर—इसलिए मोमिन को कभी अकेला और बेसहारा नहीं समझना चाहिए।
  3. जब अल्लाह किसी क़ौम को अज़ाब देता है, तो वह उसके जुर्म का सटीक बदला होता है; यह अल्लाह की सुन्नत है जो अतीत में भी रही और आइंदा भी रहेगी।
  4. इस आयत से मुसलमानों को सबक़ मिलता है कि कमज़ोरी के बाद भी अल्लाह पर भरोसा रखें, क्योंकि अल्लाह की मदद सब्र और यक़ीन के साथ आती है।
  5. यह बात दिल को तसल्ली देती है कि अल्लाह अपने बंदों को उनकी नीयत और सच्चाई के बदले दुनिया में भी इज़्ज़त देता है और आख़िरत में भी कामयाबी अता करेगा।
🎧 सुनें

📜 आयत 24-28 — अत-तौबा

24قُلْ إِن كَانَ آبَاؤُكُمْ وَأَبْنَاؤُكُمْ وَإِخْوَانُكُمْ وَأَزْوَاجُكُمْ وَعَشِيرَتُكُمْ وَأَمْوَالٌ اقْتَرَفْتُمُوهَا وَتِجَارَةٌ تَخْشَوْنَ كَسَادَهَا وَمَسَاكِنُ تَرْضَوْنَهَا أَحَبَّ إِلَيْكُم مِّنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ وَجِهَادٍ فِي سَبِيلِهِ فَتَرَبَّصُوا حَتَّىٰ يَأْتِيَ اللَّهُ بِأَمْرِهِ ۗ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो तुम्हारे बाप दादा और तुम्हारे बेटे और तुम्हारे भाई बन्द और तुम्हारी बीबियाँ और तुम्हारे कुनबे वाले और वह माल जो तुमने कमा के रख छोड़ा हैं और वह तिजारत जिसके मन्द पड़ जाने का तुम्हें अन्देशा है और वह मकानात जिन्हें तुम पसन्द करते हो अगर तुम्हें ख़ुदा से और उसके रसूल से और उसकी राह में जिहाद करने से ज्यादा अज़ीज़ है तो तुम ज़रा ठहरो यहाँ तक कि ख़ुदा अपना हुक्म (अज़ाब) मौजूद करे और ख़ुदा नाफरमान लोगों की हिदायत नहीं करता
25لَقَدْ نَصَرَكُمُ اللَّهُ فِي مَوَاطِنَ كَثِيرَةٍ ۙ وَيَوْمَ حُنَيْنٍ ۙ إِذْ أَعْجَبَتْكُمْ كَثْرَتُكُمْ فَلَمْ تُغْنِ عَنكُمْ شَيْئًا وَضَاقَتْ عَلَيْكُمُ الْأَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ ثُمَّ وَلَّيْتُم مُّدْبِرِينَ
(मुसलमानों) ख़ुदा ने तुम्हारी बहुतेरे मक़ामात पर (ग़ैबी) इमदाद की और (ख़ासकर) जंग हुनैन के दिन जब तुम्हें अपनी क़सरत (तादाद) ने मग़रूर कर दिया था फिर वह क़सरत तुम्हें कुछ भी काम न आयी और (तुम ऐसे घबराए कि) ज़मीन बावजूद उस वसअत (फैलाव) के तुम पर तंग हो गई तुम पीठ कर भाग निकले
26ثُمَّ أَنزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ وَعَلَى الْمُؤْمِنِينَ وَأَنزَلَ جُنُودًا لَّمْ تَرَوْهَا وَعَذَّبَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الْكَافِرِينَ
तब ख़ुदा ने अपने रसूल पर और मोमिनीन पर अपनी (तरफ से) तसकीन नाज़िल फरमाई और (रसूल की ख़ातिर से) फ़रिश्तों के लश्कर भेजे जिन्हें तुम देखते भी नहीं थे और कुफ्फ़ार पर अज़ाब नाज़िल फरमाया और काफिरों की यही सज़ा है
27ثُمَّ يَتُوبُ اللَّهُ مِن بَعْدِ ذَٰلِكَ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
उसके बाद ख़ुदा जिसकी चाहे तौबा क़ुबूल करे और ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
28يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّمَا الْمُشْرِكُونَ نَجَسٌ فَلَا يَقْرَبُوا الْمَسْجِدَ الْحَرَامَ بَعْدَ عَامِهِمْ هَٰذَا ۚ وَإِنْ خِفْتُمْ عَيْلَةً فَسَوْفَ يُغْنِيكُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ إِن شَاءَ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
ऐ ईमानदारों मुशरेकीन तो निरे नजिस हैं तो अब वह उस साल के बाद मस्जिदुल हराम (ख़ाना ए काबा) के पास फिर न फटकने पाएँ और अगर तुम (उनसे जुदा होने में) फक़रों फाक़ा से डरते हो तो अनकरीब ही ख़ुदा तुमको अगर चाहेगा तो अपने फज़ल (करम) से ग़नीकर देगा बेशक ख़ुदा बड़ा वाक़िफकार हिकमत वाला है
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अनुवाद — अत-तौबा 26

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Tuesday, August 18, 2026

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