अत-तौबा · 27/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
ثُمَّ يَتُوبُ اللَّهُ مِن بَعْدِ ذَٰلِكَ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ۝٢٧
Summa yatoobul laahu mim ba`di zaalika `alaa mai yashaaa`; wallaahu Ghafoorur Raheem
📖 हिंदी अर्थ
उसके बाद ख़ुदा जिसकी चाहे तौबा क़ुबूल करे और ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَتُوبُ: तौबा करना, क्षमा करना, रहमत की नज़र से देखना।
  • مِن بَعْدِ ذَٰلِكَ: उसके बाद (अर्थात् उस सज़ा और अपमान के बाद)।
  • عَلَىٰ مَن يَشَاءُ: जिस पर वह चाहे (अर्थात् जिसे वह तौबा की तौफ़ीक़ दे)।
  • غَفُورٌ رَّحِيمٌ: बहुत क्षमा करने वाला, अत्यंत दयावान।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला ने बताया कि उन लोगों के साथ जो कुछ हुआ—चाहे वह युद्ध में हार हो, क़त्ल हो या अपमान—उसके बाद भी अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा बंद नहीं हुआ। जो लोग कुफ़्र और गुमराही से बाज़ आकर इस्लाम में दाख़िल होना चाहें, अल्लाह उनकी तौबा क़बूल करता है। यह अल्लाह की बड़ी मेहरबानी है कि वह बंदों के गुनाहों के बावजूद उन्हें माफ़ कर देता है, बशर्ते वे सच्चे दिल से तौबा करें।

अल्लाह ने फ़रमाया कि यह तौबा उसकी मर्ज़ी और हिकमत से होती है—वह जिसे चाहता है तौबा की तौफ़ीक़ देता है और उसे इस्लाम की राह दिखाता है। यह अल्लाह का फ़ज़ल है जो वह जिस पर चाहता है करता है। आयत के अंत में अल्लाह ने अपने दो खूबसूरत नामों का ज़िक्र किया—"ग़फ़ूर" (बहुत क्षमा करने वाला) और "रहीम" (अत्यंत दयावान)—जो इस बात की तसल्ली देते हैं कि अल्लाह की क्षमा और रहमत असीम है। वह उन लोगों को भी माफ़ कर सकता है जिन्होंने उसके दुश्मनों का साथ दिया था, जब वे सच्चे दिल से उसकी ओर लौट आएं।


फ़ायदे (सबक़):

  1. रहमत का दरवाज़ा हमेशा खुला है: चाहे इंसान कितना ही बड़ा गुनाहगार क्यों न हो, अल्लाह की तौबा क़बूल करने की रहमत उसके लिए मौजूद है। यह मायूसी से बचाती है और उम्मीद देती है।
  2. तौबा अल्लाह की तरफ़ से तौफ़ीक़ है: जब कोई बंदा तौबा करता है, तो यह दरअसल अल्लाह की मेहरबानी होती है कि उसने उसे यह तौफ़ीक़ दी। इसलिए तौबा करने वाले को अल्लाह का शुक्रगुज़ार होना चाहिए।
  3. इस्लाम की ताक़त: यह आयत बताती है कि इस्लाम दुश्मनी और बदले की भावना नहीं सिखाता, बल्कि दुश्मनों के लिए भी रहमत और क्षमा का रास्ता खुला रखता है। यह इस्लाम की पाकीज़गी और कमाल की दलील है।
  4. अल्लाह के नामों पर भरोसा: "ग़फ़ूर" और "रहीम" के नाम हमें सिखाते हैं कि अल्लाह से कभी मायूस न हों। उसकी क्षमा और दया हर गुनाह से बड़ी है, बशर्ते बंदा सच्चे दिल से लौट आए।
  5. इंसान को कभी खुद को माफ़ी के काबिल न समझना चाहिए: अल्लाह की रहमत उसके गुस्से से पहले है। यह आयत हमें सिखाती है कि हमेशा अल्लाह की रहमत की उम्मीद रखें और उसकी तरफ़ लौटते रहें।
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📜 आयत 25-29 — अत-तौबा

25لَقَدْ نَصَرَكُمُ اللَّهُ فِي مَوَاطِنَ كَثِيرَةٍ ۙ وَيَوْمَ حُنَيْنٍ ۙ إِذْ أَعْجَبَتْكُمْ كَثْرَتُكُمْ فَلَمْ تُغْنِ عَنكُمْ شَيْئًا وَضَاقَتْ عَلَيْكُمُ الْأَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ ثُمَّ وَلَّيْتُم مُّدْبِرِينَ
(मुसलमानों) ख़ुदा ने तुम्हारी बहुतेरे मक़ामात पर (ग़ैबी) इमदाद की और (ख़ासकर) जंग हुनैन के दिन जब तुम्हें अपनी क़सरत (तादाद) ने मग़रूर कर दिया था फिर वह क़सरत तुम्हें कुछ भी काम न आयी और (तुम ऐसे घबराए कि) ज़मीन बावजूद उस वसअत (फैलाव) के तुम पर तंग हो गई तुम पीठ कर भाग निकले
26ثُمَّ أَنزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ وَعَلَى الْمُؤْمِنِينَ وَأَنزَلَ جُنُودًا لَّمْ تَرَوْهَا وَعَذَّبَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الْكَافِرِينَ
तब ख़ुदा ने अपने रसूल पर और मोमिनीन पर अपनी (तरफ से) तसकीन नाज़िल फरमाई और (रसूल की ख़ातिर से) फ़रिश्तों के लश्कर भेजे जिन्हें तुम देखते भी नहीं थे और कुफ्फ़ार पर अज़ाब नाज़िल फरमाया और काफिरों की यही सज़ा है
27ثُمَّ يَتُوبُ اللَّهُ مِن بَعْدِ ذَٰلِكَ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
उसके बाद ख़ुदा जिसकी चाहे तौबा क़ुबूल करे और ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
28يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّمَا الْمُشْرِكُونَ نَجَسٌ فَلَا يَقْرَبُوا الْمَسْجِدَ الْحَرَامَ بَعْدَ عَامِهِمْ هَٰذَا ۚ وَإِنْ خِفْتُمْ عَيْلَةً فَسَوْفَ يُغْنِيكُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ إِن شَاءَ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
ऐ ईमानदारों मुशरेकीन तो निरे नजिस हैं तो अब वह उस साल के बाद मस्जिदुल हराम (ख़ाना ए काबा) के पास फिर न फटकने पाएँ और अगर तुम (उनसे जुदा होने में) फक़रों फाक़ा से डरते हो तो अनकरीब ही ख़ुदा तुमको अगर चाहेगा तो अपने फज़ल (करम) से ग़नीकर देगा बेशक ख़ुदा बड़ा वाक़िफकार हिकमत वाला है
29قَاتِلُوا الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَلَا بِالْيَوْمِ الْآخِرِ وَلَا يُحَرِّمُونَ مَا حَرَّمَ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَلَا يَدِينُونَ دِينَ الْحَقِّ مِنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ حَتَّىٰ يُعْطُوا الْجِزْيَةَ عَن يَدٍ وَهُمْ صَاغِرُونَ
अहले किताब में से जो लोग न तो (दिल से) ख़ुदा ही पर ईमान रखते हैं और न रोज़े आख़िरत पर और न ख़ुदा और उसके रसूल की हराम की हुई चीज़ों को हराम समझते हैं और न सच्चे दीन ही को एख्तियार करते हैं उन लोगों से लड़े जाओ यहाँ तक कि वह लोग ज़लील होकर (अपने) हाथ से जज़िया दे
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अनुवाद — अत-तौबा 27

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Tuesday, August 18, 2026

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