अत-तौबा · 61/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
وَمِنْهُمُ الَّذِينَ يُؤْذُونَ النَّبِيَّ وَيَقُولُونَ هُوَ أُذُنٌ ۚ قُلْ أُذُنُ خَيْرٍ لَّكُمْ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَيُؤْمِنُ لِلْمُؤْمِنِينَ وَرَحْمَةٌ لِّلَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ ۚ وَالَّذِينَ يُؤْذُونَ رَسُولَ اللَّهِ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ۝٦١
Wa minhumul lazeena yu`zoonan nabiyya wa yaqooloona huwa uzun; qul uzunu khairil lakum yu`minu billaahi wa yu`minu lilmu mi neena wa rahmatul lillazeena aamanoo minkum; wallazeena yu`zoona Rasoolal laahi lahum `azaabun aleem
📖 हिंदी अर्थ
और उसमें से बाज़ ऐसे भी हैं जो (हमारे) रसूल को सताते हैं और कहते हैं कि बस ये कान ही (कान) हैं (ऐ रसूल) तुम कह दो कि (कान तो हैं मगर) तुम्हारी भलाई सुन्ने के कान हैं कि ख़ुदा पर ईमान रखते हैं और मोमिनीन की (बातों) का यक़ीन रखते हैं और तुममें से जो लोग ईमान ला चुके हैं उनके लिए रहमत और जो लोग रसूले ख़ुदा को सताते हैं उनके लिए दर्दनाक अज़ाब हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أُذُنٌ: वह व्यक्ति जो हर बात सुन लेता है और हर कहने वाले की बात पर विश्वास कर लेता है।
  • يُؤْذُونَ: दुःख पहुँचाना, तकलीफ़ देना।
  • أَلِيمٌ: बहुत दर्दनाक, पीड़ादायक।

विस्तृत व्याख्या:

इस आयत में अल्लाह तआला मुनाफ़िक़ीन (दिखावटी मुसलमानों) के एक और बुरे कृत्य का ज़िक्र कर रहा है। ये मुनाफ़िक़ नबी करीम ﷺ को अपनी बातों से तकलीफ़ पहुँचाते थे। जब नबी ﷺ किसी की बात सुन लेते थे और उस पर अमल करते थे, तो ये लोग कहते थे कि "यह तो बस कान हैं" यानी ये हर एक की सुन लेते हैं और हर बात को सच मान लेते हैं। उनका उद्देश्य यह था कि नबी ﷺ की समझदारी और दूरदर्शिता पर कीचड़ उछालें और लोगों को उनकी नबुव्वत पर शक में डालें।

अल्लाह तआला ने नबी ﷺ को सिखाया कि आप इन्हें जवाब दें: "अगर वह कान हैं, तो वह कान तुम्हारे लिए भलाई का कान है।" यानी नबी ﷺ हर बात सुनते हैं, लेकिन वह बुराई के लिए नहीं, बल्कि भलाई के लिए सुनते हैं। वह अल्लाह पर ईमान रखते हैं और सच्चे मोमिनों की बात को सच मानते हैं, क्योंकि मोमिन सच बोलते हैं। यह सुनना उनके लिए रहमत है, क्योंकि वह लोगों की परेशानियाँ सुनकर उनका हल निकालते हैं, उनकी मदद करते हैं और उन्हें सही रास्ता दिखाते हैं। यह रहमत ख़ास उन लोगों के लिए है जो ईमान लाए हैं।

फिर अल्लाह तआला सख़्त चेतावनी देता है कि जो लोग अल्लाह के रसूल को किसी भी तरह की तकलीफ़ पहुँचाते हैं — चाहे बातों से, चाहे किसी और तरीक़े से — उनके लिए दर्दनाक अज़ाब तैयार है। यह अज़ाब आख़िरत में उन्हें ज़रूर मिलेगा।

फ़ायदे और सबक़:

  1. नबी ﷺ की शान में कोई बुरा कहना या उन्हें तकलीफ़ पहुँचाना बहुत बड़ा गुनाह है, जिसकी सज़ा बहुत सख़्त है।
  2. नबी ﷺ की सुनने की आदत कोई कमज़ोरी नहीं थी, बल्कि यह उनकी रहमत और हिकमत थी कि वह हर किसी की बात सुनते थे ताकि सच और झूठ में फ़र्क़ कर सकें।
  3. एक मुसलमान को चाहिए कि वह नबी ﷺ की सीख को अपने जीवन में अपनाए — अच्छी बात सुने, सच पर ईमान रखे, और दूसरों के लिए रहमत का ज़रिया बने।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि दूसरों की बात सुनना और उनकी परेशानी समझना एक अच्छी आदत है, बशर्ते वह भलाई के लिए हो।
  5. अल्लाह और उसके रसूल की मुहब्बत का तक़ाज़ा है कि हम नबी ﷺ के साथ अदब और इज़्ज़त का बर्ताव करें और उनके बताए रास्ते पर चलें।


📜 आयत 59-63 — अत-तौबा

59وَلَوْ أَنَّهُمْ رَضُوا مَا آتَاهُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَقَالُوا حَسْبُنَا اللَّهُ سَيُؤْتِينَا اللَّهُ مِن فَضْلِهِ وَرَسُولُهُ إِنَّا إِلَى اللَّهِ رَاغِبُونَ
और जो कुछ ख़ुदा ने और उसके रसूल ने उनको अता फरमाया था अगर ये लोग उस पर राज़ी रहते और कहते कि ख़ुदा हमारे वास्ते काफी है (उस वक्त नहीं तो) अनक़रीब ही खुदा हमें अपने फज़ल व करम से उसका रसूल दे ही देगा हम तो यक़ीनन अल्लाह ही की तरफ लौ लगाए बैठे हैं
60۞ إِنَّمَا الصَّدَقَاتُ لِلْفُقَرَاءِ وَالْمَسَاكِينِ وَالْعَامِلِينَ عَلَيْهَا وَالْمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمْ وَفِي الرِّقَابِ وَالْغَارِمِينَ وَفِي سَبِيلِ اللَّهِ وَابْنِ السَّبِيلِ ۖ فَرِيضَةً مِّنَ اللَّهِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
(तो उनका क्या कहना था) ख़ैरात तो बस ख़ास फकीरों का हक़ है और मोहताजों का और उस (ज़कात वग़ैरह) के कारिन्दों का और जिनकी तालीफ़ क़लब की गई है (उनका) और (जिन की) गर्दनों में (गुलामी का फन्दा पड़ा है उनका) और ग़द्दारों का (जो ख़ुदा से अदा नहीं कर सकते) और खुदा की राह (जिहाद) में और परदेसियों की किफ़ालत में ख़र्च करना चाहिए ये हुकूक़ ख़ुदा की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और ख़ुदा बड़ा वाक़िफ कार हिकमत वाला है
61وَمِنْهُمُ الَّذِينَ يُؤْذُونَ النَّبِيَّ وَيَقُولُونَ هُوَ أُذُنٌ ۚ قُلْ أُذُنُ خَيْرٍ لَّكُمْ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَيُؤْمِنُ لِلْمُؤْمِنِينَ وَرَحْمَةٌ لِّلَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ ۚ وَالَّذِينَ يُؤْذُونَ رَسُولَ اللَّهِ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
और उसमें से बाज़ ऐसे भी हैं जो (हमारे) रसूल को सताते हैं और कहते हैं कि बस ये कान ही (कान) हैं (ऐ रसूल) तुम कह दो कि (कान तो हैं मगर) तुम्हारी भलाई सुन्ने के कान हैं कि ख़ुदा पर ईमान रखते हैं और मोमिनीन की (बातों) का यक़ीन रखते हैं और तुममें से जो लोग ईमान ला चुके हैं उनके लिए रहमत और जो लोग रसूले ख़ुदा को सताते हैं उनके लिए दर्दनाक अज़ाब हैं
62يَحْلِفُونَ بِاللَّهِ لَكُمْ لِيُرْضُوكُمْ وَاللَّهُ وَرَسُولُهُ أَحَقُّ أَن يُرْضُوهُ إِن كَانُوا مُؤْمِنِينَ
(मुसलमानों) ये लोग तुम्हारे सामने ख़ुदा की क़समें खाते हैं ताकि तुम्हें राज़ी कर ले हालॉकि अगर ये लोग सच्चे ईमानदार है
63أَلَمْ يَعْلَمُوا أَنَّهُ مَن يُحَادِدِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَأَنَّ لَهُ نَارَ جَهَنَّمَ خَالِدًا فِيهَا ۚ ذَٰلِكَ الْخِزْيُ الْعَظِيمُ
तो ख़ुदा और उसका रसूल कहीं ज्यादा हक़दार है कि उसको राज़ी रखें क्या ये लोग ये भी नहीं जानते कि जिस शख़्स ने ख़ुदा और उसके रसूल की मुख़ालेफ़त की तो इसमें शक़ ही नहीं कि उसके लिए जहन्नुम की आग (तैयार रखी) है
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अनुवाद — अत-तौबा 61

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Tuesday, August 18, 2026

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