Mishary Rashid Alafasy
✓
Mahmoud Khalil Al-Husary
✓
Abdurrahman As-Sudais
✓
Mohamed Siddiq Al-Minshawi
✓
Abdul Basit Abdul Samad
✓
Ali Al-Hudhaify
✓
Ahmed ibn Ali al-Ajamy
✓
Abu Bakr Ash-Shaatree
✓
Muhammad Ayyoub
✓
Abdullah Basfar
✓
Abdullah Al-Juhani
✓
Maher Al Muaiqly
✓
अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- يَحْلِفُونَ بِاللَّهِ: वे अल्लाह की क़समें खाते हैं।
- لِيُرْضُوكُمْ: ताकि तुम्हें (मुसलमानों को) प्रसन्न कर सकें।
- أَحَقُّ: अधिक हक़दार / अधिक योग्य।
- أَن يُرْضُوهُ: कि वे उसे (अल्लाह और उसके रसूल को) प्रसन्न करें।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत मुनाफ़िक़ों (कपटियों) के उस हाल का वर्णन करती है जब वे पैग़म्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और मुसलमानों के सामने झूठी क़समें खाते थे। वे अपनी बातों और हरकतों से यह साबित करने की कोशिश करते थे कि उन्होंने कोई बुराई नहीं की, और उनका मक़सद केवल यह होता था कि मुसलमान उनसे राज़ी हो जाएँ और उन्हें अपना भाई समझें। लेकिन अल्लाह तआला उनके इस हथकंडे का पर्दाफ़ाश करते हुए फ़रमाता है कि अगर वे सच्चे ईमान वाले होते, तो उन्हें अपनी सारी कोशिशें अल्लाह और उसके रसूल को राज़ी करने में लगानी चाहिए थीं, न कि सिर्फ़ लोगों को ख़ुश करने में।
अल्लाह और उसका रसूल ही असल में राज़ी होने के हक़दार हैं, क्योंकि उनकी राज़ी ही आख़िरत में नजात का ज़रिया है। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि अल्लाह ने "उसे राज़ी करें" (يُرْضُوهُ) एकवचन का सर्वनाम इस्तेमाल किया, क्योंकि अल्लाह की राज़ी उसके रसूल की राज़ी में है और रसूल की राज़ी अल्लाह की राज़ी में। दोनों एक ही सच्चाई के दो पहलू हैं। अगर ये लोग सच्चे मोमिन होते, तो वे अल्लाह और उसके रसूल की इताअत (आज्ञापालन) को सबसे बड़ा लक्ष्य बनाते, न कि लोगों को धोखा देने को।
फ़ायदे (सबक़):
- ईमान की कसौटी: सच्चा ईमान वही है जो अल्लाह और उसके रसूल की राज़ी को हर चीज़ पर मुक़द्दम रखे। जो इंसान सिर्फ़ लोगों को ख़ुश करने के लिए झूठी क़समें खाए या दिखावा करे, वह अपने ईमान में कमज़ोर है।
- झूठी क़समों की मज़म्मत: यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के नाम को झूठ का ज़रिया नहीं बनाना चाहिए। क़समें सिर्फ़ सच्चाई पर खानी चाहिए।
- अल्लाह की राज़ी सबसे बड़ी कामयाबी: इंसान की सारी कोशिशें अगर अल्लाह की राज़ी के लिए हों, तो उसे दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी मिलती है। लोगों की राज़ी फ़ानी (अस्थायी) है, लेकिन अल्लाह की राज़ी बाक़ी रहने वाली है।
- रसूल की इताअत ही अल्लाह की इताअत है: जो मुसलमान पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सुन्नत पर चलता है, वह अल्लाह को राज़ी करता है। यह आयत मुसलमानों को रसूल की मुहब्बत और इताअत की तरफ़ राग़िब करती है।
📜 आयत 60-64 — सूरा अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 62
सूरा अत-तौबा आयत 62 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (मुसलमानों) ये लोग तुम्हारे सामने ख़ुदा की क़समें खाते हैं…सूरा आयत 62/129 — सूरा अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अत-तौबा सुनें, सूरा अत-तौबा अनुवाद, सूरा अत-तौबा mp3, सूरा अत-तौबा pdf. आयत 60–64. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, September 29, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए

