यूनुस · 100/109
अनुवाद उच्चारण — यूनुस
وَمَا كَانَ لِنَفْسٍ أَن تُؤْمِنَ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۚ وَيَجْعَلُ الرِّجْسَ عَلَى الَّذِينَ لَا يَعْقِلُونَ ۝١٠٠
Wa maa kaana linafsin an tu`mina illaa bi iznil laah; wa yaj`alur rijsa `alal lazeena laa ya`qiloon
📖 हिंदी अर्थ
कि बगैर ख़ुदा की इजाज़त ईमान ले आए और जो लोग (उसूले दीन में) अक़ल से काम नहीं लेते उन्हीं लोगें पर ख़ुदा (कुफ़्र) की गन्दगी डाल देता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَا كَانَ لِنَفْسٍ: किसी प्राणी/आत्मा के लिए संभव नहीं है।
  • بِإِذْنِ اللَّهِ: अल्लाह की अनुमति, इच्छा और तौफ़ीक़ (सहायता) के बिना।
  • الرِّجْسَ: यहाँ अर्थ है यातना, अपमान और गंदगी (शिर्क और पाप का मैल)।

विस्तृत व्याख्या:

यह आयत ईमान की वास्तविकता को स्पष्ट करती है कि किसी भी व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं है कि वह अपनी इच्छा या प्रयास से अकेले ईमान ले आए, जब तक कि अल्लाह स्वयं उसे ईमान लाने की अनुमति न दे। ईमान पूर्ण रूप से अल्लाह की इच्छा, उसके ज्ञान और उसकी तौफ़ीक़ (सहायता) पर निर्भर है। अल्लाह जिसे चाहता है, हिदायत देता है और जिसे चाहता है, उसे उसके अपने हठ और अहंकार के कारण गुमराह छोड़ देता है। इसलिए, हे नबी! आप उन लोगों के पीछे अपनी जान खपा कर हलाक न हों जो ईमान नहीं ला रहे हैं, क्योंकि आपका काम केवल संदेश पहुँचाना है, जबकि दिलों को बदलने का काम केवल अल्लाह के हाथ में है।

फिर अल्लाह ने बताया कि वह "रिज्स" (यातना, अपमान और गंदगी) उन लोगों पर डालता है जो अक़्ल (बुद्धि) का इस्तेमाल नहीं करते, यानी जो अल्लाह के आदेशों और निषेधों पर विचार नहीं करते, उसकी निशानियों पर ध्यान नहीं देते, और अपनी समझ को हठ और अंधानुकरण के आगे बेच देते हैं। ऐसे लोगों पर अल्लाह की ओर से यातना और अपमान अनिवार्य हो जाता है। यहाँ "रिज्स" का अर्थ यातना, अपमान, या शिर्क और पाप की गंदगी से लिया गया है, जो उनके दिलों पर चढ़ जाती है और उन्हें सत्य देखने से अंधा कर देती है।

आयत से लाभ और शिक्षाएँ:

  1. ईमान अल्लाह की देन है: यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान केवल अल्लाह की कृपा और सहायता से मिलता है। इसलिए हमें हमेशा अल्लाह से हिदायत की दुआ करनी चाहिए और अपने अच्छे कर्मों पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह सब उसी की तौफ़ीक़ से है।
  2. प्रचार में संतुलन: दावत और प्रचार का काम करते समय हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारी ज़िम्मेदारी केवल संदेश पहुँचाना है, लोगों को ईमान लाने पर मजबूर करना या उनके इनकार पर अत्यधिक दुखी होना हमारा काम नहीं है। यह अल्लाह का काम है, जो अपनी बुद्धि के अनुसार करता है।
  3. अक़्ल का इस्तेमाल ईमान की कुंजी है: अल्लाह ने उन लोगों को यातना की धमकी दी है जो अक़्ल का इस्तेमाल नहीं करते। यह हमें सिखाता है कि इस्लाम अंधानुकरण का धर्म नहीं है, बल्कि यह बुद्धि, चिंतन और विचार को बहुत महत्व देता है। जो व्यक्ति अल्लाह की निशानियों पर विचार करता है, वह सत्य तक पहुँचता है, और जो विचार करना छोड़ देता है, वह गुमराही में डूब जाता है।
  4. अल्लाह की रहमत की उम्मीद: यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि जब तक अल्लाह किसी को हिदायत न दे, कोई ईमान नहीं ला सकता। इसलिए हमें अपने उन प्रियजनों के लिए जो अभी तक ईमान नहीं लाए हैं, निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके लिए दुआ करते रहना चाहिए, क्योंकि अल्लाह की रहमत और हिदायत का दरवाज़ा हमेशा खुला है।


📜 आयत 98-102 — यूनुस

98فَلَوْلَا كَانَتْ قَرْيَةٌ آمَنَتْ فَنَفَعَهَا إِيمَانُهَا إِلَّا قَوْمَ يُونُسَ لَمَّا آمَنُوا كَشَفْنَا عَنْهُمْ عَذَابَ الْخِزْيِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَمَتَّعْنَاهُمْ إِلَىٰ حِينٍ
कोई बस्ती ऐसी क्यों न हुई कि ईमान क़ुबूल करती तो उसको उसका ईमान फायदे मन्द होता हाँ यूनूस की क़ौम जब (अज़ाब देख कर) ईमान लाई तो हमने दुनिया की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी में उनसे रुसवाई का अज़ाब दफा कर दिया और हमने उन्हें एक ख़ास वक्त तक चैन करने दिया
99وَلَوْ شَاءَ رَبُّكَ لَآمَنَ مَن فِي الْأَرْضِ كُلُّهُمْ جَمِيعًا ۚ أَفَأَنتَ تُكْرِهُ النَّاسَ حَتَّىٰ يَكُونُوا مُؤْمِنِينَ
और (ऐ पैग़म्बर) अगर तेरा परवरदिगार चाहता तो जितने लोग रुए ज़मीन पर हैं सबके सब ईमान ले आते तो क्या तुम लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हो ताकि सबके सब ईमानदार हो जाएँ हालॉकि किसी शख़्स को ये एख्तेयार नहीं
100وَمَا كَانَ لِنَفْسٍ أَن تُؤْمِنَ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۚ وَيَجْعَلُ الرِّجْسَ عَلَى الَّذِينَ لَا يَعْقِلُونَ
कि बगैर ख़ुदा की इजाज़त ईमान ले आए और जो लोग (उसूले दीन में) अक़ल से काम नहीं लेते उन्हीं लोगें पर ख़ुदा (कुफ़्र) की गन्दगी डाल देता है
101قُلِ انظُرُوا مَاذَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَمَا تُغْنِي الْآيَاتُ وَالنُّذُرُ عَن قَوْمٍ لَّا يُؤْمِنُونَ
(ऐ रसूल) तुम कहा दो कि ज़रा देखों तो सही कि आसमानों और ज़मीन में (ख़ुदा की निशानियाँ क्या) क्या कुछ हैं (मगर सच तो ये है) और जो लोग ईमान नहीं क़ुबूल करते उनको हमारी निशानियाँ और डरावे कुछ भी मुफीद नहीं
102فَهَلْ يَنتَظِرُونَ إِلَّا مِثْلَ أَيَّامِ الَّذِينَ خَلَوْا مِن قَبْلِهِمْ ۚ قُلْ فَانتَظِرُوا إِنِّي مَعَكُم مِّنَ الْمُنتَظِرِينَ
तो ये लोग भी उन्हें सज़ाओं के मुन्तिज़र (इन्तजार में) हैं जो उनसे क़ब्ल (पहले) वालो पर गुज़र चुकी हैं (ऐ रसूल उनसे) कह दो कि अच्छा तुम भी इन्तज़ार करो मैं भी तुम्हारे साथ यक़ीनन इन्तज़ार करता हूँ
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Tuesday, August 18, 2026

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