अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- لَا يَرْجُونَ لِقَاءَنَا – हमारी भेंट (मुलाक़ात) की आशा नहीं रखते, अर्थात् पुनरुत्थान और हिसाब-किताब पर विश्वास नहीं करते।
- رَضُوا بِالْحَيَاةِ الدُّنْيَا – उन्होंने सांसारिक जीवन को ही सब कुछ मान लिया और उसी पर संतुष्ट हो गए।
- وَاطْمَأَنُّوا بِهَا – उसी में दिल को शांति और चैन पाया, उसी से लगाव और प्रेम कर बैठे।
- عَنْ آيَاتِنَا غَافِلُونَ – हमारी निशानियों (चमत्कारों, प्रमाणों और शिक्षाओं) से बेख़बर और ग़ाफ़िल हैं।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन लोगों का हाल बयान करती है जो आख़िरत और क़यामत के दिन को नहीं मानते। वे अल्लाह से मिलने की कोई उम्मीद नहीं रखते, क्योंकि उनका दिल पुनरुत्थान को झुठला चुका होता है। नतीजतन, वे इसी फ़ानी (नाशवान) दुनिया की ज़िंदगी को ही अपना सब कुछ समझ लेते हैं और उसी पर राज़ी हो जाते हैं। वे इस दुनिया की चमक-दमक, माल-दौलत और खुशियों में इतने डूब जाते हैं कि उनका दिल उसी में सुकून पा लेता है और वे उसी से चिपक जाते हैं। उन्हें यह ख़्याल तक नहीं आता कि यह ज़िंदगी तो बस एक इम्तिहान है, और असली ज़िंदगी तो आख़िरत की है।
इसके साथ ही, वे अल्लाह की निशानियों से भी ग़ाफ़िल रहते हैं — चाहे वे निशानियाँ क़ुरआन की आयतें हों, या आसमान-ज़मीन की पैदाइश, या इंसान के अपने वजूद में बिखरे हुए अल्लाह के कुदरती नमूने। वे इन पर न तो ग़ौर-ओ-फ़िक्र करते हैं और न ही इनसे कोई सबक़ लेते हैं। उनकी आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं, मगर दिल अंधे और बहरे हैं। यही वह लोग हैं जिनका अंजाम अल्लाह की तरफ़ से बहुत बुरा होगा, जैसा कि अगली आयतों में बयान किया गया है।
फ़ायदे (सीख):
- आख़िरत का यक़ीन ही इंसान को सही रास्ते पर चलाता है – जो लोग अल्लाह से मिलने की उम्मीद रखते हैं, वे दुनिया को आज़माइश समझते हैं और अपने अमल को सुधारते हैं। आख़िरत का विश्वास ही इंसान को गुनाहों से रोकता है और नेकियों की तरफ़ प्रेरित करता है।
- दुनिया की मोहब्बत दिल को अंधा कर देती है – जो इंसान सिर्फ़ दुनिया को ही सब कुछ समझ लेता है, वह अल्लाह की याद से ग़ाफ़िल हो जाता है और उसका दिल सख़्त हो जाता है। इसलिए दुनिया को कमाई का ज़रिया बनाए रखें, मगर उसे अपना निशाना न बनाएँ।
- अल्लाह की निशानियों पर ग़ौर करना इबादत है – क़ुरआन की आयतें, कुदरत के नज़ारे, और अपने अंदर के अजीबो-ग़रीब सिस्टम — ये सब अल्लाह की तरफ़ बुलाने वाली निशानियाँ हैं। इन पर सोचना और सीखना हर मुसलमान का काम है।
- आशा और डर का संतुलन – “लिक़ा” (अल्लाह से मुलाक़ात) की आशा रखने से इंसान में अच्छे काम करने का जोश पैदा होता है, और उसके डर से वह बुराइयों से बचता है। यही ईमान की रूह है।
- ग़ाफ़िल लोगों की पहचान – यह आयत हमें सचेत करती है कि हम उन लोगों में न हों जो दुनिया में मशग़ूल होकर आख़िरत को भूल जाएँ। हर पल याद रखें कि हमें एक दिन अल्लाह के सामने हाज़िर होना है।
📜 आयत 5-9 — यूनुस
अनुवाद — यूनुस 7
सूरा यूनुस आयत 7 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : इसमें भी शक़ नहीं कि जिन लोगों को (क़यामत में)…सूरा आयत 7/109 — यूनुस يونس (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: यूनुस सुनें, यूनुस अनुवाद, यूनुस mp3, यूनुस pdf. आयत 5–9. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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