यूनुस · 8/109
अनुवाद उच्चारण — यूनुस
أُولَٰئِكَ مَأْوَاهُمُ النَّارُ بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ ۝٨
Ulaaa`ika maawaahumun Naaru bimaa kaanoo yaksiboon
📖 हिंदी अर्थ
यही वह लोग हैं जिनका ठिकाना उनकी करतूत की बदौलत जहन्नुम है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • مَأْوَاهُمُ: उनका ठिकाना, निवास स्थान, जहाँ वे जाकर बसेंगे।
  • النَّارُ: आग, यहाँ अर्थ है जहन्नम की आग।
  • بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ: उसके बदले में जो वे कमाते थे, अर्थात अपने कर्मों के परिणामस्वरूप।

तफ़सीर:

यह आयत उन लोगों के अंजाम को बयान कर रही है जिन्होंने आख़िरत (परलोक) को झुठलाया और अपने जीवन में कुफ़्र (इनकार) और झुठलाने का रास्ता अपनाया। ऐसे लोगों का अंतिम ठिकाना और स्थायी निवास जहन्नम की आग है। यह उनका बदला है उन कर्मों का जो उन्होंने दुनिया में किए — यानी शिर्क (ईश्वर के साथ साझीदार ठहराना), कुफ़्र (सत्य को झुठलाना), और आख़िरत के दिन को न मानना। उन्होंने जो कुछ भी बुरे कर्म कमाए, उन्हीं के कारण यह दंड उन्हें मिलेगा। यह कोई ज़ुल्म (अन्याय) नहीं, बल्कि उनके अपने किए का फल है। जिस तरह अच्छे कर्मों का बदला जन्नत है, उसी तरह बुरे कर्मों और सत्य से इनकार का परिणाम आग है। यह आयत पिछली आयतों से जुड़ी हुई है जिनमें उन लोगों की विशेषताएँ बताई गईं जो अल्लाह से मुलाक़ात (मिलने) की उम्मीद नहीं रखते और दुनिया की ज़िंदगी पर ही मगन रहते हैं।

फ़ायदे (सीख):

  1. कर्मों का हिसाब: यह आयत सिखाती है कि इंसान के हर कर्म का हिसाब होगा। जो व्यक्ति दुनिया में बुराई कमाता है, उसे उसका बुरा परिणाम अवश्य भुगतना पड़ेगा। यह न्याय का सिद्धांत है जो इंसान को ज़िम्मेदारी का एहसास कराता है।
  2. आख़िरत पर ईमान की अहमियत: यह आयत हमें याद दिलाती है कि आख़िरत (परलोक) पर विश्वास करना कितना आवश्यक है। जो लोग इस पर विश्वास नहीं करते, वे अपने कर्मों में लापरवाह हो जाते हैं और उनका अंजाम बहुत बुरा होता है।
  3. अल्लाह का न्याय: इस आयत से पता चलता है कि अल्लाह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता। जो दंड मिलेगा, वह इंसान के अपने किए का परिणाम होगा। यह बात इंसान को न्याय और सच्चाई की राह पर चलने की प्रेरणा देती है।
  4. तौबा का दरवाज़ा: यह आयत डराने के साथ-साथ रहमत की ओर इशारा करती है — जब तक इंसान ज़िंदा है, वह अपने कर्मों को सुधार सकता है और अल्लाह से माफ़ी माँग सकता है। इसलिए निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि अच्छे कर्मों की ओर लौटना चाहिए।
  5. दुनिया की ज़िंदगी की हक़ीक़त: यह आयत बताती है कि दुनिया की ज़िंदगी अस्थायी है और असली जीवन आख़िरत का है। इसलिए इंसान को अपने जीवन का उद्देश्य केवल दुनिया की खुशियाँ नहीं बनाना चाहिए, बल्कि आख़िरत की सफलता के लिए प्रयास करना चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 6-10 — यूनुस

6إِنَّ فِي اخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ وَمَا خَلَقَ اللَّهُ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يَتَّقُونَ
इसमें ज़रा भी शक़ नहीं कि रात दिन के उलट फेर में और जो कुछ ख़ुदा ने आसमानों और ज़मीन में बनाया है (उसमें) परहेज़गारों के वास्ते बहुतेरी निशानियाँ हैं
7إِنَّ الَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَاءَنَا وَرَضُوا بِالْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَاطْمَأَنُّوا بِهَا وَالَّذِينَ هُمْ عَنْ آيَاتِنَا غَافِلُونَ
इसमें भी शक़ नहीं कि जिन लोगों को (क़यामत में) हमारी (बारगाह की) हुज़ूरी का ठिकाना नहीं और दुनिया की (चन्द रोज़) ज़िन्दगी से निहाल हो गए और उसी पर चैन से बैठे हैं और जो लोग हमारी आयतों से ग़ाफिल हैं
8أُولَٰئِكَ مَأْوَاهُمُ النَّارُ بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ
यही वह लोग हैं जिनका ठिकाना उनकी करतूत की बदौलत जहन्नुम है
9إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ يَهْدِيهِمْ رَبُّهُم بِإِيمَانِهِمْ ۖ تَجْرِي مِن تَحْتِهِمُ الْأَنْهَارُ فِي جَنَّاتِ النَّعِيمِ
बेशक जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उन्हें उनका परवरदिगार उनके ईमान के सबब से मंज़िल मक़सूद तक पहुँचा देगा कि आराम व आसाइश के बाग़ों में (रहेगें) और उन के नीचे नहरें जारी होगी
10دَعْوَاهُمْ فِيهَا سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَتَحِيَّتُهُمْ فِيهَا سَلَامٌ ۚ وَآخِرُ دَعْوَاهُمْ أَنِ الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ
उन बाग़ों में उन लोगों का बस ये कौल होगा ऐ ख़ुदा तू पाक व पाकीज़ा है और उनमें उनकी बाहमी (आपसी) खैरसलाही (मुलाक़ात) सलाम से होगी और उनका आख़िरी क़ौल ये होगा कि सब तारीफ ख़ुदा ही को सज़ावार है जो सारे जहाँन का पालने वाला है
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अनुवाद — यूनुस 8

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Tuesday, August 18, 2026

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