यूसुफ · 109/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
وَمَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ إِلَّا رِجَالًا نُّوحِي إِلَيْهِم مِّنْ أَهْلِ الْقُرَىٰ ۗ أَفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۗ وَلَدَارُ الْآخِرَةِ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ اتَّقَوْا ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ۝١٠٩
Wa maaa arsalnaa min qablika illaa rijaalan nooheee ilaihim min ahlil quraa; afalam yaseeroo fil ardi fa yanzuroo kaifa kaana `aaqibatul lazeena min qablihim; wa la Daarul Aakhirati Khairul lillazeenat taqaw; afalaa ta`qiloon
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) तुमसे पहले भी हम गाँव ही के रहने वाले कुछ मर्दों को (पैग़म्बर बनाकर) भेजा किए है कि हम उन पर वही नाज़िल करते थे तो क्या ये लोग रुए ज़मीन पर चले फिरे नहीं कि ग़ौर करते कि जो लोग उनसे पहले हो गुज़रे हैं उनका अन्जाम क्या हुआ और जिन लोगों ने परहेज़गारी एख्तेयार की उनके लिए आख़िरत का घर (दुनिया से) यक़ीनन कहीं ज्यादा बेहतर है क्या ये लोग नहीं समझते
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • رِجَالًا: पुरुष (मर्द), फ़रिश्ते नहीं।
  • نُوحِي إِلَيْهِم: हम उनकी ओर वह्य (प्रकाशना) भेजते हैं।
  • أَهْلِ الْقُرَى: बस्तियों/शहरों के निवासी, बद्दू (जंगल में रहने वाले) नहीं।
  • عَاقِبَةُ: अंजाम, परिणाम।
  • وَلَدَارُ الْآخِرَةِ: आख़िरत का घर (यानी आख़िरत का इनाम और सुख)।
  • اتَّقَوْا: जिन्होंने अल्लाह का डर रखा और उसकी अवज्ञा से बचे।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! हमने आपसे पहले भी जो रसूल भेजे, वे सब इंसान ही थे — फ़रिश्ते नहीं — और वे भी आपकी तरह बस्तियों (शहरों) के रहने वाले थे, जंगलों में रहने वाले जाहिल लोग नहीं। हम उन्हीं की ओर अपना वह्य (प्रकाशना) उतारते थे, जैसे आपकी ओर उतारी गई। उन रसूलों को उनकी क़ौमों ने झुठलाया, और हमने उन झुठलाने वालों को हलाक कर दिया।

क्या ये मक्का के मुशरिकीन ज़मीन पर चलते-फिरते नहीं कि वे देखते कि उनसे पहले के झुठलाने वालों का अंजाम क्या हुआ? वे कैसे तबाह और बर्बाद कर दिए गए? क्या उन्होंने अपनी आँखों से उनके खंडहर नहीं देखे? क्या उन्होंने उनके अंजाम से सबक़ नहीं सीखा?

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है कि आख़िरत का घर (यानी उसका इनाम और सुख) उन लोगों के लिए बेहतर है जो अल्लाह से डरते हैं और उसकी नाफ़रमानी से बचते हैं। दुनिया की चंद रोज़ा ज़िंदगी और उसके फ़ानी सुख-आराम आख़िरत की हमेशा की नेमतों के मुक़ाबले कुछ भी नहीं हैं।

क्या तुम लोग (ऐ मुशरिकीन!) यह नहीं समझते कि आख़िरत का इनाम ही असली इनाम है? क्या तुम्हारी अक़्ल इतनी भी नहीं कि तुम इस हक़ीक़त को समझ लो और ईमान ले आओ?


फ़ायदे (उपदेश):

  1. रसूलों का इंसान होना: अल्लाह ने हमेशा इंसानों में से ही रसूल चुने, ताकि लोग उनसे सीधे मिल सकें, उनसे सीख सकें और उनकी ज़िंदगी को अपने लिए नमूना बना सकें। यह अल्लाह की रहमत है कि उसने हमारी ही जिंस (प्रजाति) के लोगों को पैग़म्बर बनाया।
  2. इतिहास से सबक़: ज़मीन पर अल्लाह के क़ानून (सुन्नत) के निशान मौजूद हैं। जो क़ौमें सच्चाई को झुठलाती हैं, उनका अंजाम बर्बादी है। यह सिर्फ़ पढ़ने की चीज़ नहीं, बल्कि देखने और समझने की चीज़ है।
  3. आख़िरत ही असली ठिकाना है: दुनिया की ज़िंदगी चंद रोज़ा है, लेकिन आख़िरत हमेशा की है। जो लोग अल्लाह से डरते हैं और उसकी मरज़ी के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारते हैं, उनके लिए आख़िरत में वो सुख हैं जिनका अंदाज़ा नहीं किया जा सकता।
  4. अक़्ल का इस्तेमाल: अल्लाह ने इंसान को अक़्ल दी है ताकि वह सोचे, समझे और सही रास्ता अपनाए। जो लोग अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करके ईमान लाते हैं, वही कामयाब हैं। यह आयत हमें सोचने-समझने और सही फ़ैसला करने की तरग़ीब देती है।
  5. तक़वा ही कामयाबी की कुंजी है: दुनिया में भी और आख़िरत में भी, अल्लाह का डर और उसकी रज़ा की तलब ही इंसान को बुलंदियों तक पहुँचाती है।
🎧 सुनें

📜 आयत 107-111 — यूसुफ

107أَفَأَمِنُوا أَن تَأْتِيَهُمْ غَاشِيَةٌ مِّنْ عَذَابِ اللَّهِ أَوْ تَأْتِيَهُمُ السَّاعَةُ بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
तो क्या ये लोग इस बात से मुतमइन हो बैठें हैं कि उन पर ख़ुदा का अज़ाब आ पड़े जो उन पर छा जाए या उन पर अचानक क़यामत ही आ जाए और उनको कुछ ख़बर भी न हो
108قُلْ هَٰذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللَّهِ ۚ عَلَىٰ بَصِيرَةٍ أَنَا وَمَنِ اتَّبَعَنِي ۖ وَسُبْحَانَ اللَّهِ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ
(ऐ रसूल) उन से कह दो कि मेरा तरीका तो ये है कि मै (लोगों) को ख़ुदा की तरफ बुलाता हूँ मैं और मेरा पैरव (पीछे चलने वाले) (दोनों) मज़बूत दलील पर हैं और ख़ुदा (हर ऐब व नुक़स से) पाक व पाकीज़ा है और मै मुशरेकीन से नहीं हूँ
109وَمَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ إِلَّا رِجَالًا نُّوحِي إِلَيْهِم مِّنْ أَهْلِ الْقُرَىٰ ۗ أَفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۗ وَلَدَارُ الْآخِرَةِ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ اتَّقَوْا ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
और (ऐ रसूल) तुमसे पहले भी हम गाँव ही के रहने वाले कुछ मर्दों को (पैग़म्बर बनाकर) भेजा किए है कि हम उन पर वही नाज़िल करते थे तो क्या ये लोग रुए ज़मीन पर चले फिरे नहीं कि ग़ौर करते कि जो लोग उनसे पहले हो गुज़रे हैं उनका अन्जाम क्या हुआ और जिन लोगों ने परहेज़गारी एख्तेयार की उनके लिए आख़िरत का घर (दुनिया से) यक़ीनन कहीं ज्यादा बेहतर है क्या ये लोग नहीं समझते
110حَتَّىٰ إِذَا اسْتَيْأَسَ الرُّسُلُ وَظَنُّوا أَنَّهُمْ قَدْ كُذِبُوا جَاءَهُمْ نَصْرُنَا فَنُجِّيَ مَن نَّشَاءُ ۖ وَلَا يُرَدُّ بَأْسُنَا عَنِ الْقَوْمِ الْمُجْرِمِينَ
पहले के पैग़म्बरो ने तबलीग़े रिसालत यहाँ वक कि जब (क़ौम के ईमान लाने से) पैग़म्बर मायूस हो गए और उन लोगों ने समझ लिया कि वह झुठलाए गए तो उनके पास हमारी (ख़ास) मदद आ पहुँची तो जिसे हमने चाहा नजात दी और हमारा अज़ाब गुनेहगार लोगों के सर से तो टाला नहीं जाता
111لَقَدْ كَانَ فِي قَصَصِهِمْ عِبْرَةٌ لِّأُولِي الْأَلْبَابِ ۗ مَا كَانَ حَدِيثًا يُفْتَرَىٰ وَلَٰكِن تَصْدِيقَ الَّذِي بَيْنَ يَدَيْهِ وَتَفْصِيلَ كُلِّ شَيْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةً لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ
इसमें शक़ नहीं कि उन लोगों के किस्सों में अक़लमन्दों के वास्ते (अच्छी ख़ासी) इबरत (व नसीहत) है ये (क़ुरान) कोई ऐसी बात नहीं है जो (ख्वाहामा ख्वाह) गढ़ ली जाए बल्कि (जो आसमानी किताबें) इसके पहले से मौजूद हैं उनकी तसदीक़ है और हर चीज़ की तफसील और ईमानदारों के वास्ते (अज़सरतापा) हिदायत व रहमत है
यूसुफकुरान सूची
111आयत
मक्कीRevelation
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अनुवाद — यूसुफ 109

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Tuesday, August 18, 2026

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