यूसुफ · 108/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा यूसुफ
قُلْ هَٰذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللَّهِ ۚ عَلَىٰ بَصِيرَةٍ أَنَا وَمَنِ اتَّبَعَنِي ۖ وَسُبْحَانَ اللَّهِ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ ۝١٠٨
Qul haazihee sabeeleee ad`ooo ilal laah; `alaa baseera tin ana wa manit taba`anee wa Subhaanal laahi wa maaa ana minal mushrikeen
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) उन से कह दो कि मेरा तरीका तो ये है कि मै (लोगों) को ख़ुदा की तरफ बुलाता हूँ मैं और मेरा पैरव (पीछे चलने वाले) (दोनों) मज़बूत दलील पर हैं और ख़ुदा (हर ऐब व नुक़स से) पाक व पाकीज़ा है और मै मुशरेकीन से नहीं हूँ

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
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A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سَبِيلِي: मेरा मार्ग, मेरी राह।
  • بَصِيرَةٍ: स्पष्ट प्रमाण, दृढ़ विश्वास, ज्ञान और यक़ीन पर आधारित दृष्टि।
  • وَمَنِ اتَّبَعَنِي: और जिन्होंने मेरा अनुसरण किया (मेरे अनुयायी)।
  • سُبْحَانَ اللَّهِ: अल्लाह पाक है, वह हर कमी और दोष से मुक्त है।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप उन लोगों से कह दीजिए जो आपको झुठला रहे हैं और जो आपके मार्ग के बारे में संदेह में हैं: "यह मेरा मार्ग है, मेरी राह है। मैं लोगों को अल्लाह की ओर बुलाता हूँ—उसकी एकता और उसकी इबादत की ओर। यह बुलावा किसी अंधी परंपरा या मनगढ़ंत बात पर आधारित नहीं है, बल्कि स्पष्ट ज्ञान, दृढ़ विश्वास और ठोस प्रमाण पर टिका हुआ है। मैं स्वयं इस मार्ग पर चलता हूँ और जो लोग मेरा अनुसरण करते हैं, वे भी इसी ज्ञान और यक़ीन के साथ लोगों को अल्लाह की ओर बुलाते हैं।"

"मैं अल्लाह को हर उस चीज़ से पाक और मुक्त घोषित करता हूँ जो उसके साथ जोड़ी जाती है—चाहे वह मूर्तियाँ हों, सितारे हों या कोई और। मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो अल्लाह के साथ किसी को साझीदार ठहराते हैं। मेरा विश्वास पूर्ण एकेश्वरवाद (तौहीद) पर है, और मैं शिर्क से पूरी तरह मुक्त हूँ।"

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. दावत का सही तरीक़ा: यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की ओर बुलाने का काम ज्ञान और स्पष्ट प्रमाण के साथ होना चाहिए, न कि अज्ञानता और अंधी नक़ल के साथ। एक दाई (बुलाने वाला) को चाहिए कि वह जो कहे उसे ख़ुद समझे और उस पर यक़ीन रखे।
  2. अनुयायियों की ज़िम्मेदारी: यह आयत सिर्फ़ नबी ﷺ तक सीमित नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो नबी ﷺ का अनुसरण करता है। हर मुसलमान को अपनी हैसियत और ज्ञान के अनुसार अल्लाह की ओर बुलाने का काम करना चाहिए।
  3. शिर्क से बराअत (मुक्ति): यह आयत हमें सिखाती है कि एक सच्चे मुसलमान का विश्वास पूरी तरह से शिर्क से पाक होना चाहिए। अल्लाह को हर उस चीज़ से पाक मानना चाहिए जो उसके लिए उचित नहीं है।
  4. इस्लाम की स्पष्टता: इस्लाम एक स्पष्ट और प्रमाण-आधारित धर्म है। इसमें कोई रहस्यवाद या अंधी आस्था नहीं है, बल्कि हर बात तर्क और ज्ञान पर आधारित है। यही इसकी सच्चाई की निशानी है।
  5. आत्मविश्वास और साहस: नबी ﷺ ने बड़े आत्मविश्वास के साथ अपने मार्ग की घोषणा की। यह हमें सिखाता है कि सच्चाई पर होने का विश्वास हो तो उसे बेझिझक और साहस के साथ पेश करना चाहिए, चाहे लोग कितना भी विरोध करें।


📜 आयत 106-110 — सूरा यूसुफ

106وَمَا يُؤْمِنُ أَكْثَرُهُم بِاللَّهِ إِلَّا وَهُم مُّشْرِكُونَ
और अक्सर लोगों की ये हालत है कि वह ख़ुदा पर ईमान तो नहीं लाते मगर शिर्क किए जाते हैं
107أَفَأَمِنُوا أَن تَأْتِيَهُمْ غَاشِيَةٌ مِّنْ عَذَابِ اللَّهِ أَوْ تَأْتِيَهُمُ السَّاعَةُ بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
तो क्या ये लोग इस बात से मुतमइन हो बैठें हैं कि उन पर ख़ुदा का अज़ाब आ पड़े जो उन पर छा जाए या उन पर अचानक क़यामत ही आ जाए और उनको कुछ ख़बर भी न हो
108قُلْ هَٰذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللَّهِ ۚ عَلَىٰ بَصِيرَةٍ أَنَا وَمَنِ اتَّبَعَنِي ۖ وَسُبْحَانَ اللَّهِ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ
(ऐ रसूल) उन से कह दो कि मेरा तरीका तो ये है कि मै (लोगों) को ख़ुदा की तरफ बुलाता हूँ मैं और मेरा पैरव (पीछे चलने वाले) (दोनों) मज़बूत दलील पर हैं और ख़ुदा (हर ऐब व नुक़स से) पाक व पाकीज़ा है और मै मुशरेकीन से नहीं हूँ
109وَمَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ إِلَّا رِجَالًا نُّوحِي إِلَيْهِم مِّنْ أَهْلِ الْقُرَىٰ ۗ أَفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۗ وَلَدَارُ الْآخِرَةِ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ اتَّقَوْا ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
और (ऐ रसूल) तुमसे पहले भी हम गाँव ही के रहने वाले कुछ मर्दों को (पैग़म्बर बनाकर) भेजा किए है कि हम उन पर वही नाज़िल करते थे तो क्या ये लोग रुए ज़मीन पर चले फिरे नहीं कि ग़ौर करते कि जो लोग उनसे पहले हो गुज़रे हैं उनका अन्जाम क्या हुआ और जिन लोगों ने परहेज़गारी एख्तेयार की उनके लिए आख़िरत का घर (दुनिया से) यक़ीनन कहीं ज्यादा बेहतर है क्या ये लोग नहीं समझते
110حَتَّىٰ إِذَا اسْتَيْأَسَ الرُّسُلُ وَظَنُّوا أَنَّهُمْ قَدْ كُذِبُوا جَاءَهُمْ نَصْرُنَا فَنُجِّيَ مَن نَّشَاءُ ۖ وَلَا يُرَدُّ بَأْسُنَا عَنِ الْقَوْمِ الْمُجْرِمِينَ
पहले के पैग़म्बरो ने तबलीग़े रिसालत यहाँ वक कि जब (क़ौम के ईमान लाने से) पैग़म्बर मायूस हो गए और उन लोगों ने समझ लिया कि वह झुठलाए गए तो उनके पास हमारी (ख़ास) मदद आ पहुँची तो जिसे हमने चाहा नजात दी और हमारा अज़ाब गुनेहगार लोगों के सर से तो टाला नहीं जाता
यूसुफकुरान सूची
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अनुवाद — यूसुफ 108

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Saturday, October 3, 2026

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