इब्राहीम · 33/52
अनुवाद उच्चारण — इब्राहीम
وَسَخَّرَ لَكُمُ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ دَائِبَيْنِ ۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ ۝٣٣
Wa sakhkhara lakumush shamsa walqamara daaa`ibaini wa sakhkhara lakumul laila wannahaar
📖 हिंदी अर्थ
और सूरज और चाँद को तुम्हारा ताबेदार बना दिया कि सदा फेरी किया करते हैं और रात और दिन को तुम्हारे क़ब्ज़े में कर दिया कि हमेशा हाज़िर रहते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سَخَّرَ: वश में करना, अधीन करना, सेवा में लगाना।
  • دَائِبَيْنِ: लगातार चलने वाले, कभी न रुकने वाले, अपने काम में निरंतर लगे रहने वाले।
  • اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ: रात और दिन, जो एक-दूसरे के बाद आते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने अपनी असीम कृपा और दया से सूर्य और चंद्रमा को तुम्हारे लिए वश में कर दिया है। ये दोनों अपनी गति में कभी आलस्य नहीं करते, बल्कि लगातार और नियमित रूप से चलते रहते हैं। सूर्य दिन में प्रकाश और गर्मी देता है, जिससे फसलें पकती हैं, मौसम बदलते हैं और जीवन के असंख्य कार्य संपन्न होते हैं। चंद्रमा रात में प्रकाश फैलाता है, जिससे अंधेरे में भी लोगों को राहत मिलती है और वे अपने काम कर सकते हैं। ये दोनों अपने नियत समय पर उगते और अस्त होते हैं, जिससे दिन-रात का हिसाब और महीनों-वर्षों का निर्धारण होता है।

इसी प्रकार, अल्लाह ने रात और दिन को भी तुम्हारे लिए वश में कर दिया है। रात को उसने अंधेरा और सुकून का समय बनाया, ताकि तुम उसमें आराम करो, अपनी थकान दूर करो और अपने शरीर को नई ऊर्जा मिले। दिन को उसने روشن और روشن बनाया, ताकि तुम उसमें अपनी रोज़ी-रोटी की तलाश करो, व्यापार करो, खेती करो, सीखो और जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करो। रात और दिन बारी-बारी से आते हैं—कभी दिन लंबा होता है और रात छोटी, कभी इसका उल्टा। यह बदलाव भी अल्लाह की रहमत है, जिससे मौसम बदलते हैं और जीवन के विभिन्न पहलू संतुलित रहते हैं।

फ़ायदे (सबक):

  1. अल्लाह की इस नेमत पर ग़ौर करना चाहिए कि उसने सूर्य, चंद्रमा, रात और दिन को हमारे लिए वश में कर रखा है। ये सब उसकी कुदरत के निशान हैं और हमें उसकी याद दिलाते हैं।
  2. इन नियमित चीज़ों से हमें सबक लेना चाहिए कि हम भी अपने जीवन में नियमितता और लगन अपनाएँ—इबादत में, काम में और अच्छे कामों में।
  3. रात और दिन के बदलाव से हमें यह समझना चाहिए कि जैसे ये बदलते हैं, वैसे ही हमारी ज़िंदगी के हालात भी बदलते रहते हैं। कठिनाई के बाद आसानी आती है, और रात के बाद सुबह ज़रूर होती है।
  4. यह आयत हमें अल्लाह का शुक्रिया अदा करना सिखाती है, क्योंकि उसने ये सब कुछ बिना किसी कीमत के हमारी सेवा में लगा दिया है। हमें चाहिए कि इन नेमतों का सही उपयोग करें और अल्लाह की इबादत में समय बिताएँ।
  5. सूर्य और चंद्रमा की नियमित गति हमें याद दिलाती है कि इस कायनात का एक नियंता है, जो सब कुछ अपनी हिकमत से चला रहा है। यह हमारे ईमान को मज़बूत करता है और हमें अल्लाह के करीब लाता है।


📜 आयत 31-35 — इब्राहीम

31قُل لِّعِبَادِيَ الَّذِينَ آمَنُوا يُقِيمُوا الصَّلَاةَ وَيُنفِقُوا مِمَّا رَزَقْنَاهُمْ سِرًّا وَعَلَانِيَةً مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَ يَوْمٌ لَّا بَيْعٌ فِيهِ وَلَا خِلَالٌ
(ऐ रसूल) मेरे वह बन्दे जो ईमान ला चुके उन से कह दो कि पाबन्दी से नमाज़ पढ़ा करें और जो कुछ हमने उन्हें रोज़ी दी है उसमें से (ख़ुदा की राह में) छिपाकर या दिखा कर ख़र्च किया करे उस दिन (क़यामत) के आने से पहल जिसमें न तो (ख़रीदो) फरोख्त ही (काम आएगी) न दोस्ती मोहब्बत काम (आएगी)
32اللَّهُ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَأَنزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَخْرَجَ بِهِ مِنَ الثَّمَرَاتِ رِزْقًا لَّكُمْ ۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ الْفُلْكَ لِتَجْرِيَ فِي الْبَحْرِ بِأَمْرِهِ ۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ الْأَنْهَارَ
ख़ुदा ही ऐसा (क़ादिर तवाना) है जिसने सारे आसमान व ज़मीन पैदा कर डाले और आसमान से पानी बरसाया फिर उसके ज़रिए से (मुख्तलिफ दरख्तों से) तुम्हारी रोज़ा के वास्ते (तरह तरह) के फल पैदा किए और तुम्हारे वास्ते कश्तियां तुम्हारे बस में कर दी-ताकि उसके हुक्म से दरिया में चलें और तुम्हारे वास्ते नदियों को तुम्हारे एख्तियार में कर दिया
33وَسَخَّرَ لَكُمُ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ دَائِبَيْنِ ۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ
और सूरज और चाँद को तुम्हारा ताबेदार बना दिया कि सदा फेरी किया करते हैं और रात और दिन को तुम्हारे क़ब्ज़े में कर दिया कि हमेशा हाज़िर रहते हैं
34وَآتَاكُم مِّن كُلِّ مَا سَأَلْتُمُوهُ ۚ وَإِن تَعُدُّوا نِعْمَتَ اللَّهِ لَا تُحْصُوهَا ۗ إِنَّ الْإِنسَانَ لَظَلُومٌ كَفَّارٌ
(और अपनी ज़रुरत के मुवाफिक) जो कुछ तुमने उससे माँगा उसमें से (तुम्हारी ज़रूरत भर) तुम्हे दिया और तुम ख़ुदा की नेमतो गिनती करना चाहते हो तो गिन नहीं सकते हो तू बड़ा बे इन्साफ नाशुक्रा है
35وَإِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ رَبِّ اجْعَلْ هَٰذَا الْبَلَدَ آمِنًا وَاجْنُبْنِي وَبَنِيَّ أَن نَّعْبُدَ الْأَصْنَامَ
और (वह वक्त याद करो) जब इबराहीम ने (ख़ुदा से) अर्ज़ की थी कि परवरदिगार इस शहर (मक्के) को अमन व अमान की जगह बना दे और मुझे और मेरी औलाद को इस बात को बचा ले कि बुतों की परसतिश करने लगे
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मक्कीRevelation
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अनुवाद — इब्राहीम 33

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Wednesday, August 19, 2026

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