अल-हिज्र · 7/99
अनुवाद उच्चारण — अल-हिज्र
لَّوْ مَا تَأْتِينَا بِالْمَلَائِكَةِ إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ ۝٧
Law maa taateenaa bil malaaa`ikati in kunta minas saadiqeen
📖 हिंदी अर्थ
अगर तू अपने दावे में सच्चा है तो फरिश्तों को हमारे सामने क्यों नहीं ला खड़ा करता
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لَوْ مَا: क्यों नहीं? / काश तुम लाते।
  • تَأْتِينَا بِالْمَلَائِكَةِ: हमारे पास फ़रिश्तों को लेकर आते।
  • إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ: यदि तुम सच्चे लोगों में से हो।

तफ़सीर:

जब नबी करीम ﷺ ने क़ौम को अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाया और उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराया, तो क़ौम के मुकज़्ज़िब (झुठलाने वाले) लोगों ने मज़ाक़ और उपहास के अंदाज़ में कहा: "ऐ वह शख़्स जिस पर क़ुरआन उतारा गया है! तुम तो पागल हो गए हो। अगर तुम सच्चे हो कि अल्लाह ने तुम्हें पैग़म्बर बनाकर भेजा है, तो हमारे पास फ़रिश्तों को लेकर क्यों नहीं आते? वे हमारे सामने तुम्हारी नबुव्वत की गवाही दें और हमें बताएँ कि अल्लाह का अज़ाब हम पर आने वाला है।"

यानी उन्होंने यह माँग इसलिए नहीं की कि वे हिदायत पाना चाहते थे, बल्कि यह उनकी ज़िद, सरकशी और नबी ﷺ का मज़ाक़ उड़ाने का ज़रिया था। वे जानते थे कि फ़रिश्ते उनकी शर्तों पर नहीं आते, बल्कि अल्लाह के हुक्म से आते हैं। उनका असली मक़सद सच्चाई को मानने से इनकार करना था, न कि सच्चाई को जानना।

फ़ायदे:

  1. अल्लाह के रसूल ﷺ की सच्चाई का सबूत यह है कि उन्होंने कभी भी अपनी मनमानी से कोई माँग पूरी नहीं की, बल्कि हर मामले में अल्लाह के हुक्म का इंतज़ार किया। यही उनकी सच्ची नबुव्वत की निशानी है।
  2. मुशरिकों की यह माँग सिर्फ़ बहाना थी। अल्लाह तआला ने क़ुरआन में कई जगह बताया कि अगर फ़रिश्ते भी आ जाते, तो भी वे ईमान नहीं लाते। इससे हमें सबक़ मिलता है कि हिदायत अल्लाह के हाथ में है, और जिसे अल्लाह हिदायत देना चाहे, उसे दलीलें काफ़ी होती हैं; और जिसे गुमराह करना चाहे, उसके लिए मोजिज़े भी नाकाफ़ी हैं।
  3. इस आयत से पता चलता है कि नबी ﷺ पर ईमान लाने के लिए फ़रिश्तों का देखना ज़रूरी नहीं, बल्कि क़ुरआन और सुन्नत ही हमारे लिए काफ़ी हैं। यह हमारे लिए रहमत है कि अल्लाह ने हमें ग़ैब पर ईमान लाने की तौफ़ीक़ दी।
  4. मुसलमान को चाहिए कि वह हर हाल में सब्र और इस्तिक़ामत से काम ले, चाहे लोग उसका मज़ाक़ उड़ाएँ या उस पर बेतुके इल्ज़ाम लगाएँ। नबी ﷺ ने इस मुश्किल वक़्त में भी अपना पैग़ाम पहुँचाना जारी रखा और अल्लाह पर भरोसा किया।
🎧 सुनें

📜 आयत 5-9 — अल-हिज्र

5مَّا تَسْبِقُ مِنْ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسْتَأْخِرُونَ
कोई उम्मत अपने वक्त से न आगे बढ़ सकती है न पीछे हट सकती है
6وَقَالُوا يَا أَيُّهَا الَّذِي نُزِّلَ عَلَيْهِ الذِّكْرُ إِنَّكَ لَمَجْنُونٌ
(ऐ रसूल कुफ्फ़ारे मक्का तुमसे) कहते हैं कि ऐ शख़्श (जिसको ये भरम है) कि उस पर 'वही' व किताब नाज़िल हुईहै तो (अच्छा ख़ासा) सिड़ी है
7لَّوْ مَا تَأْتِينَا بِالْمَلَائِكَةِ إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ
अगर तू अपने दावे में सच्चा है तो फरिश्तों को हमारे सामने क्यों नहीं ला खड़ा करता
8مَا نُنَزِّلُ الْمَلَائِكَةَ إِلَّا بِالْحَقِّ وَمَا كَانُوا إِذًا مُّنظَرِينَ
(हालॉकि) हम फरिश्तों को खुल्लम खुल्ला (जिस अज़ाब के साथ) फैसले ही के लिए भेजा करते हैं और (अगर फरिश्ते नाज़िल हो जाए तो) फिर उनको (जान बचाने की) मोहलत भी न मिले
9إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ
बेशक हम ही ने क़ुरान नाज़िल किया और हम ही तो उसके निगेहबान भी हैं
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Tuesday, August 18, 2026

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