अल-हिज्र · 6/99
अनुवाद उच्चारण — अल-हिज्र
وَقَالُوا يَا أَيُّهَا الَّذِي نُزِّلَ عَلَيْهِ الذِّكْرُ إِنَّكَ لَمَجْنُونٌ ۝٦
Wa qaaloo yaaa aiyuhal lazee nuzzila `alaihiz Zikru innaka lamajnoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल कुफ्फ़ारे मक्का तुमसे) कहते हैं कि ऐ शख़्श (जिसको ये भरम है) कि उस पर 'वही' व किताब नाज़िल हुईहै तो (अच्छा ख़ासा) सिड़ी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الذِّكْرُ (अज़-ज़िक्र): यहाँ इससे अभिप्राय क़ुरआन करीम है।
  • لَمَجْنُونٌ (ला-मजनून): अर्थात "निश्चय ही तुम पागल हो" — यह उनका अपमानजनक और उपहासपूर्ण कथन था।

तफ़सीर (व्याख्या):

मक्का के मुशरिकीन (बहुदेववादियों) ने नबी करीम ﷺ से उपहास और ठट्ठे के अंदाज़ में कहा: "ऐ वह शख्स जिस पर (तुम्हारे दावे के मुताबिक) ज़िक्र (क़ुरआन) उतारा गया है! निश्चय ही तुम पागल हो।" उनका कहने का मतलब यह था कि तुम जो यह दावा करते हो कि अल्लाह तुम पर क़ुरआन नाज़िल करता है, यह तो पागलों की सी बात है। वे इस तरह उनकी नबुव्वत का मज़ाक उड़ाते थे और उन्हें पागल कहकर उनकी बात को बदनाम करना चाहते थे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर तुम सच्चे हो तो फ़रिश्ते क्यों नहीं लाते जो तुम्हारे नबी होने की गवाही दें? यह उनकी जिद, सरकशी और सच्चाई से मुँह मोड़ने की स्पष्ट निशानी थी। अल्लाह ने आगे की आयतों में उन्हें जवाब दिया कि हम फ़रिश्तों को हक़ (सच्चाई) के साथ ही उतारते हैं, और जब वे आएँगे तो काफ़िरों को कोई मोहलत न दी जाएगी।

फ़ायदे (सबक़ और नसीहतें):

  1. नबी करीम ﷺ को भी अपनी उम्मत के लोगों की तरफ़ से तकलीफ़ और बदज़ुबानी का सामना करना पड़ा, फिर भी उन्होंने सब्र और दृढ़ता से काम लिया। इससे हमें सबक़ मिलता है कि हक़ (सच्चाई) की राह पर चलने वालों को लोगों की तरफ़ से मुख़ालफ़त और तानों का सामना करना पड़ता है, लेकिन हमें अपने ईमान और मिशन पर क़ायम रहना चाहिए।
  2. मुशरिकीन का यह क़ौल उनकी नादानी और हठधर्मिता को दिखाता है कि उन्होंने सबसे बड़ी नेमत (क़ुरआन) को पहचाना तक नहीं, बल्कि उसे पागलपन की बात कहकर ठुकरा दिया। यह उन लोगों की मिसाल है जो हिदायत के बजाय गुमराही को पसंद करते हैं।
  3. इस आयत से हमें यह भी सीख मिलती है कि अल्लाह के दीन की दावत देने वालों को बुद्धिमानी, सब्र और हिकमत से काम लेना चाहिए, चाहे सामने वाले कितनी ही बुरी बातें क्यों न कहें।
  4. क़ुरआन को "ज़िक्र" कहा गया है, यानी यह वह किताब है जो इंसान को उसके रब की याद दिलाती है और उसे ज़िन्दगी की सही राह दिखाती है। इसलिए हमें इसकी तिलावत और अमल को अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बनाना चाहिए।


📜 आयत 4-8 — अल-हिज्र

4وَمَا أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ إِلَّا وَلَهَا كِتَابٌ مَّعْلُومٌ
अनक़रीब ही (इसका नतीजा) उन्हें मालूम हो जाएगा और हमने कभी कोई बस्ती तबाह नहीं की मगर ये कि उसकी तबाही के लिए (पहले ही से) समझी बूझी मियाद मुक़र्रर लिखी हुई थी
5مَّا تَسْبِقُ مِنْ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسْتَأْخِرُونَ
कोई उम्मत अपने वक्त से न आगे बढ़ सकती है न पीछे हट सकती है
6وَقَالُوا يَا أَيُّهَا الَّذِي نُزِّلَ عَلَيْهِ الذِّكْرُ إِنَّكَ لَمَجْنُونٌ
(ऐ रसूल कुफ्फ़ारे मक्का तुमसे) कहते हैं कि ऐ शख़्श (जिसको ये भरम है) कि उस पर 'वही' व किताब नाज़िल हुईहै तो (अच्छा ख़ासा) सिड़ी है
7لَّوْ مَا تَأْتِينَا بِالْمَلَائِكَةِ إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ
अगर तू अपने दावे में सच्चा है तो फरिश्तों को हमारे सामने क्यों नहीं ला खड़ा करता
8مَا نُنَزِّلُ الْمَلَائِكَةَ إِلَّا بِالْحَقِّ وَمَا كَانُوا إِذًا مُّنظَرِينَ
(हालॉकि) हम फरिश्तों को खुल्लम खुल्ला (जिस अज़ाब के साथ) फैसले ही के लिए भेजा करते हैं और (अगर फरिश्ते नाज़िल हो जाए तो) फिर उनको (जान बचाने की) मोहलत भी न मिले
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अनुवाद — अल-हिज्र 6

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Tuesday, August 18, 2026

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