अन-नहल · 61/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
وَلَوْ يُؤَاخِذُ اللَّهُ النَّاسَ بِظُلْمِهِم مَّا تَرَكَ عَلَيْهَا مِن دَابَّةٍ وَلَٰكِن يُؤَخِّرُهُمْ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى ۖ فَإِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ ۝٦١
Wa law yu`aakhizul laahun naasa bizulminhim maa taraka `alaihaa min daaabbatinw wa laakiny yu`akhkhiruhum ilaaa ajalim musamman fa izaa jaaa`a ajaluhum laa yastaakhiroona saa`atanw wa laa yastaqdimoon
📖 हिंदी अर्थ
और अगर (कहीं) ख़ुदा अपने बन्दों की नाफरमानियों की गिरफ़त करता तो रुए ज़मीन पर किसी एक जानदार को बाक़ी न छोड़ता मगर वह तो एक मुक़र्रर वक्त तक उन सबको मोहलत देता है फिर जब उनका (वह) वक्त अा पहुँचेगा तो न एक घड़ी पीछे हट सकते हैं और न आगे बढ़ सकते हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يُؤَاخِذُ: पकड़ना, सज़ा देना, हिसाब लेना।
  • بِظُلْمِهِم: उनके अत्याचार, कुफ्र और पापों के कारण।
  • دَابَّةٍ: धरती पर चलने-फिरने वाला कोई भी जीव (इंसान और जानवर)।
  • أَجَلٍ مُسَمًّى: एक निश्चित और मुक़र्रर किया हुआ समय, जो अल्लाह के इल्म में तय है।
  • لَا يَسْتَأْخِرُونَ: वे पीछे नहीं हट सकते।
  • وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ: और वे आगे नहीं बढ़ सकते।

तफ़सीर:

अगर अल्लाह तआला लोगों को उनके अत्याचारों, कुफ्र और गुनाहों की वजह से तुरंत पकड़ लेता, यानी उन्हीं के किए की सज़ा उन्हें इसी दुनिया में दे देता, तो धरती पर कोई भी चलने-फिरने वाला जीव बाक़ी न बचता। क्योंकि इंसानों का ज़ुल्म और नाफ़रमानी इतनी बढ़ चुकी है कि उसकी वजह से सारी मख़लूक़ात (सृष्टि) तबाह हो जाती। लेकिन अल्लाह रहीम और हलीम है, वह अपने बंदों पर रहम करता है और उन्हें मौका देता है। वह उन्हें एक निश्चित समय तक टालता है, जो उसके इल्म में उनकी उम्र और अज़ल (मृत्यु) के लिए मुक़र्रर है। जब वह समय आ जाता है, तो न वे एक पल के लिए भी पीछे हट सकते हैं, न आगे बढ़ सकते हैं। यानी मौत का वक़्त बिल्कुल तय है, न उसमें ताखीर हो सकती है और न ताक़दीम।

फ़ायदे:

  1. इस आयत से अल्लाह की अज़ीम रहमत और हिल्म (सहनशीलता) का पता चलता है। वह गुनाहगारों को फौरन सज़ा नहीं देता, बल्कि उन्हें तौबा और इस्लाह का मौका देता है। यह हमारे लिए रहमत का पैग़ाम है कि हम अपनी ग़लतियों से बाज़ आएँ और अल्लाह की तरफ़ रुजू करें।
  2. अल्लाह की सज़ा से कोई नहीं बच सकता। जब उसका फ़ैसला आ जाता है, तो न किसी की सिफ़ारिश काम आती है और न कोई भाग सकता है। इसलिए हमें अल्लाह के हुक्म के आगे सर झुकाना चाहिए और उसकी नाफ़रमानी से बचना चाहिए।
  3. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हमारी ज़िंदगी की मुद्दत मुक़र्रर है। हमें इस मुक़र्रर वक़्त को ग़नीमत जानकर नेक अमल करने चाहिए, क्योंकि मौत का वक़्त किसी को मालूम नहीं।
  4. अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है, लेकिन उसकी रहमत उसके ग़ज़ब से पहले है। हमें उसकी रहमत की उम्मीद रखनी चाहिए और उसके ग़ज़ब से डरना चाहिए। यही दोनों चीज़ें (ख़ौफ़ और उम्मीद) एक मुसलमान के दिल में होनी चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 59-63 — अन-नहल

59يَتَوَارَىٰ مِنَ الْقَوْمِ مِن سُوءِ مَا بُشِّرَ بِهِ ۚ أَيُمْسِكُهُ عَلَىٰ هُونٍ أَمْ يَدُسُّهُ فِي التُّرَابِ ۗ أَلَا سَاءَ مَا يَحْكُمُونَ
और वह ज़हर का सा घूँट पीकर रह जाता है (बेटी की) जिसकी खुशखबरी दी गई है अपनी क़ौम के लोगों से छिपा फिरता है (और सोचता है) कि क्या इसको ज़िल्लत उठाके ज़िन्दा रहने दे या (ज़िन्दा ही) इसको ज़मीन में गाड़ दे-देखो तुम लोग किस क़दर बुरा एहकाम (हुक्म) लगाते हैं
60لِلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ مَثَلُ السَّوْءِ ۖ وَلِلَّهِ الْمَثَلُ الْأَعْلَىٰ ۚ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
बुरी (बुरी) बातें तो उन्हीं लोगों के लिए ज्यादा मुनासिब हैं जो आख़िरत का यक़ीन नहीं रखते और ख़ुदा की शान के लायक़ तो आला सिफते (बहुत बड़ी अच्छाइया) हैं और वही तो ग़ालिब है
61وَلَوْ يُؤَاخِذُ اللَّهُ النَّاسَ بِظُلْمِهِم مَّا تَرَكَ عَلَيْهَا مِن دَابَّةٍ وَلَٰكِن يُؤَخِّرُهُمْ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى ۖ فَإِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ
और अगर (कहीं) ख़ुदा अपने बन्दों की नाफरमानियों की गिरफ़त करता तो रुए ज़मीन पर किसी एक जानदार को बाक़ी न छोड़ता मगर वह तो एक मुक़र्रर वक्त तक उन सबको मोहलत देता है फिर जब उनका (वह) वक्त अा पहुँचेगा तो न एक घड़ी पीछे हट सकते हैं और न आगे बढ़ सकते हैं
62وَيَجْعَلُونَ لِلَّهِ مَا يَكْرَهُونَ وَتَصِفُ أَلْسِنَتُهُمُ الْكَذِبَ أَنَّ لَهُمُ الْحُسْنَىٰ ۖ لَا جَرَمَ أَنَّ لَهُمُ النَّارَ وَأَنَّهُم مُّفْرَطُونَ
और ये लोग खुद जिन बातों को पसन्द नहीं करते उनको ख़ुदा के वास्ते क़रार देते हैं और अपनी ही ज़बान से ये झूठे दावे भी करते हैं कि (आख़िरत में भी) उन्हीं के लिए भलाई है (भलाई तो नहीं मगर) हाँ उनके लिए जहन्नुम की आग ज़रुरी है और यही लोग सबसे पहले (उसमें) झोंके जाएँगें
63تَاللَّهِ لَقَدْ أَرْسَلْنَا إِلَىٰ أُمَمٍ مِّن قَبْلِكَ فَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ أَعْمَالَهُمْ فَهُوَ وَلِيُّهُمُ الْيَوْمَ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
(ऐ रसूल) ख़ुदा की (अपनी) कसम तुमसे पहले उम्मतों के पास बहुतेरे पैग़म्बर भेजे तो शैतान ने उनकी कारस्तानियों को उम्दा कर दिखाया तो वही (शैतान) आज भी उन लोगों का सरपरस्त बना हुआ है हालॉकि उनके वास्ते दर्दनाक अज़ाब है
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अनुवाद — अन-नहल 61

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Tuesday, August 18, 2026

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