अन-नहल · 62/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
وَيَجْعَلُونَ لِلَّهِ مَا يَكْرَهُونَ وَتَصِفُ أَلْسِنَتُهُمُ الْكَذِبَ أَنَّ لَهُمُ الْحُسْنَىٰ ۖ لَا جَرَمَ أَنَّ لَهُمُ النَّارَ وَأَنَّهُم مُّفْرَطُونَ ۝٦٢
Wa yaj`aloona lillaahi maa yakrahoona wa tasifu alsinatuhumul kaziba anna lahumul husnaa laa jarama anna lahumun Naara wa annahum mufratoon
📖 हिंदी अर्थ
और ये लोग खुद जिन बातों को पसन्द नहीं करते उनको ख़ुदा के वास्ते क़रार देते हैं और अपनी ही ज़बान से ये झूठे दावे भी करते हैं कि (आख़िरत में भी) उन्हीं के लिए भलाई है (भलाई तो नहीं मगर) हाँ उनके लिए जहन्नुम की आग ज़रुरी है और यही लोग सबसे पहले (उसमें) झोंके जाएँगें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَجْعَلُونَ لِلَّهِ مَا يَكْرَهُونَ: वे अल्लाह के लिए वह चीज़ ठहराते हैं जिसे वे स्वयं अपने लिए नापसंद करते हैं, जैसे बेटियाँ।
  • وَتَصِفُ أَلْسِنَتُهُمُ الْكَذِبَ: उनकी ज़ुबानें झूठ बोलती हैं।
  • الْحُسْنَى: अच्छा परिणाम या अच्छा दर्जा।
  • لَا جَرَمَ: निस्संदेह, यक़ीनन, सच्चाई यह है।
  • مُفْرَطُونَ: आगे बढ़ाए गए, (नरक में) छोड़ दिए गए, या भुला दिए गए।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन मुशरिकीन (बहुदेववादियों) के बुरे कृत्यों और उनकी मूर्खतापूर्ण सोच को उजागर करती है। वे अल्लाह के लिए वह चीज़ ठहराते हैं जिसे वे स्वयं अपने लिए पसंद नहीं करते — यानी बेटियाँ। जब उनमें से किसी को बेटी होने की ख़बर दी जाती थी तो उसका चेहरा काला पड़ जाता था, फिर भी वे कहते थे कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं। यह उनकी सबसे बड़ी नादानी और कुत्सित सोच थी।

इसके साथ ही, उनकी ज़ुबानें झूठ बोलती थीं कि उनके लिए अच्छा परिणाम है — यानी वे कहते थे कि यदि क़ियामत आएगी भी, तो हमें अच्छा दर्जा मिलेगा, या वे अपने लिए बेटों को "अच्छाई" कहते थे और अल्लाह के लिए बेटियों को ठहराते थे। यह उनका पूर्ण अज्ञान और अहंकार था।

अल्लाह तआला फ़रमाता है: "निस्संदेह, उनके लिए आग (नरक) है और वे उसमें आगे बढ़ाए गए (छोड़ दिए गए) होंगे।" यानी उनका दावा झूठा है; सच्चाई यह है कि उनका अंजाम नरक है, और वे उसमें इस तरह छोड़ दिए जाएँगे कि वहाँ से कभी निकल नहीं पाएँगे — न भुलाए जाने की राहत मिलेगी, न मौत आएगी, और न ही किसी तरह की कोई राहत। वे उस यातना में हमेशा के लिए पड़े रहेंगे।


फ़ायदे (सीख):

  1. अल्लाह के लिए कोई ऐसी चीज़ ठहराना जो स्वयं इंसान अपने लिए पसंद नहीं करता, सबसे बड़ा अन्याय और अज्ञान है। यह शिर्क की जड़ है।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि बेटियाँ अल्लाह की ओर से एक नेमत (वरदान) हैं, न कि कोई बुराई या शर्म की बात। इस्लाम ने बेटियों को सम्मान दिया और उनकी परवरिश को जन्नत का ज़रिया बताया।
  3. झूठे दावे और ख़ोखले अहंकार से इंसान अल्लाह की नज़र में कुछ नहीं बदल सकता। अंतिम फ़ैसला अल्लाह के पास है, और वही सच्चा इन्साफ़ करने वाला है।
  4. जो लोग अल्लाह के साथ साझीदार ठहराते हैं और उसकी नेमतों की नाशुक्री करते हैं, उनका अंजाम नरक है — यह अल्लाह का स्थायी नियम है, जो कभी नहीं बदलता।
  5. यह आयत मुसलमान को सच्चाई, विनम्रता और अल्लाह की तरफ़ पूर्ण समर्पण की शिक्षा देती है — कि हम अपनी सोच, अपनी ज़ुबान और अपने कृत्यों को अल्लाह की पसंद के अनुसार ढालें, न कि अपनी इच्छाओं के अनुसार।


📜 आयत 60-64 — अन-नहल

60لِلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ مَثَلُ السَّوْءِ ۖ وَلِلَّهِ الْمَثَلُ الْأَعْلَىٰ ۚ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
बुरी (बुरी) बातें तो उन्हीं लोगों के लिए ज्यादा मुनासिब हैं जो आख़िरत का यक़ीन नहीं रखते और ख़ुदा की शान के लायक़ तो आला सिफते (बहुत बड़ी अच्छाइया) हैं और वही तो ग़ालिब है
61وَلَوْ يُؤَاخِذُ اللَّهُ النَّاسَ بِظُلْمِهِم مَّا تَرَكَ عَلَيْهَا مِن دَابَّةٍ وَلَٰكِن يُؤَخِّرُهُمْ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى ۖ فَإِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ
और अगर (कहीं) ख़ुदा अपने बन्दों की नाफरमानियों की गिरफ़त करता तो रुए ज़मीन पर किसी एक जानदार को बाक़ी न छोड़ता मगर वह तो एक मुक़र्रर वक्त तक उन सबको मोहलत देता है फिर जब उनका (वह) वक्त अा पहुँचेगा तो न एक घड़ी पीछे हट सकते हैं और न आगे बढ़ सकते हैं
62وَيَجْعَلُونَ لِلَّهِ مَا يَكْرَهُونَ وَتَصِفُ أَلْسِنَتُهُمُ الْكَذِبَ أَنَّ لَهُمُ الْحُسْنَىٰ ۖ لَا جَرَمَ أَنَّ لَهُمُ النَّارَ وَأَنَّهُم مُّفْرَطُونَ
और ये लोग खुद जिन बातों को पसन्द नहीं करते उनको ख़ुदा के वास्ते क़रार देते हैं और अपनी ही ज़बान से ये झूठे दावे भी करते हैं कि (आख़िरत में भी) उन्हीं के लिए भलाई है (भलाई तो नहीं मगर) हाँ उनके लिए जहन्नुम की आग ज़रुरी है और यही लोग सबसे पहले (उसमें) झोंके जाएँगें
63تَاللَّهِ لَقَدْ أَرْسَلْنَا إِلَىٰ أُمَمٍ مِّن قَبْلِكَ فَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ أَعْمَالَهُمْ فَهُوَ وَلِيُّهُمُ الْيَوْمَ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
(ऐ रसूल) ख़ुदा की (अपनी) कसम तुमसे पहले उम्मतों के पास बहुतेरे पैग़म्बर भेजे तो शैतान ने उनकी कारस्तानियों को उम्दा कर दिखाया तो वही (शैतान) आज भी उन लोगों का सरपरस्त बना हुआ है हालॉकि उनके वास्ते दर्दनाक अज़ाब है
64وَمَا أَنزَلْنَا عَلَيْكَ الْكِتَابَ إِلَّا لِتُبَيِّنَ لَهُمُ الَّذِي اخْتَلَفُوا فِيهِ ۙ وَهُدًى وَرَحْمَةً لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ
और हमने तुम पर किताब (क़ुरान) तो इसी लिए नाज़िल की ताकि जिन बातों में ये लोग बाहम झगड़ा किए हैं उनको तुम साफ साफ बयान करो (और यह किताब) ईमानदारों के लिए तो (अज़सरतापा) हिदायत और रहमत है
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अनुवाद — अन-नहल 62

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Tuesday, August 18, 2026

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