और (वह वक्त भी याद करो) जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि ऐ मेरी क़ौम तुमने बछड़े को (ख़ुदा) बना के अपने ऊपर बड़ा सख्त जुल्म किया तो अब (इसके सिवा कोई चारा नहीं कि) तुम अपने ख़ालिक की बारगाह में तौबा करो और वह ये है कि अपने को क़त्ल कर डालो तुम्हारे परवरदिगार के नज़दीक तुम्हारे हक़ में यही बेहतर है, फिर जब तुमने ऐसा किया तो खुदा ने तुम्हारी तौबा क़ुबूल कर ली बेशक वह बड़ा मेहरबान माफ़ करने वाला है
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اور جب موسیٰ نے اپنی قوم کے لوگوں سے کہا کہ بھائیو، تم نے بچھڑے کو (معبود) ٹھہرانے میں (بڑا) ظلم کیا ہے، تو اپنے پیدا کرنے والے کے آگے توبہ کرو اور اپنے تئیں ہلاک کر ڈالو۔ تمہارے خالق کے نزدیک تمہارے حق میں یہی بہتر ہے۔ پھر اس نے تمہارا قصور معاف کر دیا۔ وہ بے شک معاف کرنے والا (اور) صاحبِ رحم ہے
فَاقْتُلُوا أَنفُسَكُمْ: तुममें से जो लोग बच गए हैं, वे उन लोगों को क़त्ल करें जिन्होंने बछड़े की पूजा की थी। यह एक आज़माइश और कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) था।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला अपने बंदों को उस ज़बरदस्त एहसान की याद दिलाता है जब मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम से कहा: "ऐ मेरी क़ौम! तुमने बछड़े को माबूद बनाकर अपनी जानों पर बहुत बड़ा ज़ुल्म किया है। यह शिर्क सबसे बड़ा ज़ुल्म है जो इंसान अपनी रूह पर करता है। अब इस गुनाह से तौबा करने का एक ही रास्ता है—अपने रचयिता की तरफ पलटो और उसके हुक्म के आगे सर झुकाओ। तुम्हारी तौबा यह है कि तुममें से जो लोग बछड़े की पूजा से बचे रहे, वे उन लोगों को क़त्ल करें जिन्होंने उसकी पूजा की। यह क़त्ल तुम्हारे लिए उस अज़ाब से बेहतर है जो तुम्हें आख़िरत में हमेशा के लिए मिलता।"
यह हुक्म सुनकर बनी इसराइल ने अल्लाह के हुक्म की तामील की। जिन लोगों ने बछड़े की पूजा नहीं की थी, उन्होंने तलवारें उठाईं और गुनाहगारों को क़त्ल करना शुरू कर दिया। यह उनके लिए बहुत बड़ी आज़माइश थी, लेकिन उन्होंने अल्लाह के हुक्म के सामने पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर दिया। अल्लाह ने उनकी इस सच्ची तौबा को क़बूल फ़रमाया और उन पर रहमत की। अल्लाह तआला बहुत तौबा क़बूल करने वाला और अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है।
फ़ायदे (सबक):
सच्ची तौबा वही है जो गुनाह को छोड़ने के साथ-साथ अल्लाह के हुक्म के आगे पूरी तरह सर झुकाने पर आधारित हो, चाहे वह हुक्म कितना भी सख्त क्यों न हो।
अल्लाह की रहमत उसके गज़ब से कहीं बढ़कर है—जब बंदा सच्चे दिल से पलटता है, तो अल्लाह उसे न सिर्फ़ माफ़ करता है बल्कि उसकी तौबा को क़ुबूलियत का दर्जा देता है।
गुनाह सिर्फ़ अल्लाह के हुक्म की खिलाफ़वाज़ी नहीं, बल्कि इंसान की अपनी रूह पर ज़ुल्म है। इसलिए तौबा करना दरअसल अपनी ही भलाई के लिए है।
अल्लाह के हुक्म की तामील में जो सब्र और अटलता दिखाई जाए, वही इंसान को अल्लाह की मोहब्बत और मग़फिरत का हक़दार बनाती है।
यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि अल्लाह की राह में अपनी जान की क़ुरबानी देने से भी बड़ी कोई क़ीमत नहीं, और यही सच्ची बंदगी की निशानी है।
और (वह वक्त भी याद करो) जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि ऐ मेरी क़ौम तुमने बछड़े को (ख़ुदा) बना के अपने ऊपर बड़ा सख्त जुल्म किया तो अब (इसके सिवा कोई चारा नहीं कि) तुम अपने ख़ालिक की बारगाह में तौबा करो और वह ये है कि अपने को क़त्ल कर डालो तुम्हारे परवरदिगार के नज़दीक तुम्हारे हक़ में यही बेहतर है, फिर जब तुमने ऐसा किया तो खुदा ने तुम्हारी तौबा क़ुबूल कर ली बेशक वह बड़ा मेहरबान माफ़ करने वाला है
और (वह वक्त भी याद करो) जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि ऐ मेरी क़ौम तुमने बछड़े को (ख़ुदा) बना के अपने ऊपर बड़ा सख्त जुल्म किया तो अब (इसके सिवा कोई चारा नहीं कि) तुम अपने ख़ालिक की बारगाह में तौबा करो और वह ये है कि अपने को क़त्ल कर डालो तुम्हारे परवरदिगार के नज़दीक तुम्हारे हक़ में यही बेहतर है, फिर जब तुमने ऐसा किया तो खुदा ने तुम्हारी तौबा क़ुबूल कर ली बेशक वह बड़ा मेहरबान माफ़ करने वाला है
और (वह वक्त भी याद करो) जब तुमने मूसा से कहा था कि ऐ मूसा हम तुम पर उस वक्त तक ईमान न लाएँगे जब तक हम खुदा को ज़ाहिर बज़ाहिर न देख ले उस पर तुम्हें बिजली ने ले डाला, और तुम तकते ही रह गए
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