अल-अंबिया · 26/112
अनुवाद उच्चारण — अल-अंबिया
وَقَالُوا اتَّخَذَ الرَّحْمَٰنُ وَلَدًا ۗ سُبْحَانَهُ ۚ بَلْ عِبَادٌ مُّكْرَمُونَ ۝٢٦
Wa qaalut takhazar Rahmaanu waladan Subhaanah; bal `ibaadum mkkramoon
📖 हिंदी अर्थ
और (अहले मक्का) कहते हैं कि खुदा ने (फरिश्तों को) अपनी औलाद (बेटियाँ) बना रखा है (हालाँकि) वह उससे पाक व पकीज़ा हैं बल्कि (वह फ़रिश्ते) (खुदा के) मोअज्ज़ि बन्दे हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • اتَّخَذَ: बना लिया, अपना लिया
  • وَلَدًا: बेटा, संतान
  • سُبْحَانَهُ: वह पाक-पवित्र है (हर दोष से)
  • عِبَادٌ مُّكْرَمُونَ: सम्मानित बंदे, जिन्हें प्रतिष्ठा दी गई है

तफसीर (व्याख्या):

मुशरिकीन (बहुदेववादी) कहते थे कि अल्लाह रहमान ने अपने लिए कोई संतान बना ली है। उनका दावा था कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं। यह उनकी झूठी कल्पना और मनगढ़ंत बात थी, जिसका कोई आधार नहीं था। अल्लाह तआला इन बातों से बिल्कुल पाक है—वह हर उस चीज़ से मुक्त है जो उसकी शान के खिलाफ हो। वह न तो किसी का बेटा है और न ही उसकी कोई संतान हो सकती है, क्योंकि संतान होना एक मख़लूक (प्राणी) की विशेषता है, जिसे ज़रूरत और कमज़ोरी होती है, जबकि अल्लाह तआला हर ज़रूरत से परे है।

फिर अल्लाह तआला ने उनके इस झूठे दावे का खंडन करते हुए फ़रमाया: "बल्कि वे (फ़रिश्ते) अल्लाह के सम्मानित बंदे हैं।" यानी फ़रिश्ते अल्लाह की संतान नहीं हैं, बल्कि वे उसके आज्ञाकारी और इज़्ज़तदार बंदे हैं। उन्हें अल्लाह ने अपनी ख़ास इज़्ज़त और बुज़ुर्गी दी है। वे उसकी इबादत में हमेशा मशगूल रहते हैं और उसके हुक्म के बिना कोई काम नहीं करते। वे न तो उसकी नाफ़रमानी करते हैं और न ही उसके आदेश से आगे बढ़ते हैं।

यहाँ एक अहम नुक़्ता यह है कि अगर फ़रिश्ते अल्लाह के बंदे हैं, तो वे उसकी औलाद कैसे हो सकते हैं? क्योंकि बंदगी और औलाद होना दो अलग चीज़ें हैं। एक बंदा अपने मालिक की औलाद नहीं हो सकता। यह आम फ़ितरत और समझ के खिलाफ है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला की शान के बारे में सोचते समय हमें पूरे अदब और एहतिराम से काम लेना चाहिए। हमें अपनी ज़बान को उन बातों से बचाना चाहिए जो अल्लाह की पाकी और बुज़ुर्गी के खिलाफ हों। साथ ही, यह भी सबक है कि फ़रिश्ते जैसे पाक और नेक बंदे भी अल्लाह के सामने सजदा करते हैं और उसकी इबादत में लगे रहते हैं, तो हम इंसानों को कितनी ज़्यादा इबादत और आज्ञाकारिता दिखानी चाहिए। अल्लाह तआला ने हमें इंसान बनाकर, अक्ल और समझ देकर, और रसूल भेजकर बहुत बड़ा एहसान किया है। हमें चाहिए कि हम उसके शुक्रगुज़ार बनें और उसकी इबादत में अपनी ज़िंदगी गुज़ारें, ताकि हम भी उन मुकर्रम (सम्मानित) बंदों में शामिल हो सकें जिनसे अल्लाह रज़ा है।



📜 आयत 24-28 — अल-अंबिया

24أَمِ اتَّخَذُوا مِن دُونِهِ آلِهَةً ۖ قُلْ هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ ۖ هَٰذَا ذِكْرُ مَن مَّعِيَ وَذِكْرُ مَن قَبْلِي ۗ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ الْحَقَّ ۖ فَهُم مُّعْرِضُونَ
(हाँ) और उन लोगों से बाज़पुर्स होगी क्या उन लोगों ने खुदा को छोड़कर कुछ और माबूद बना रखे हैं (ऐ रसूल) तुम कहो कि भला अपनी दलील तो पेश करो जो मेरे (ज़माने में) साथ है उनकी किताब (कुरान) और जो लोग मुझ से पहले थे उनकी किताबें (तौरेत वग़ैरह) ये (मौजूद) हैं (उनमें खुदा का शरीक बता दो) बल्कि उनमें से अक्सर तो हक़ (बात) को तो जानते ही नहीं
25وَمَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ مِن رَّسُولٍ إِلَّا نُوحِي إِلَيْهِ أَنَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدُونِ
तो (जब हक़ का ज़िक्र आता है) ये लोग मुँह फेर लेते हैं और (ऐ रसूल) हमने तुमसे पहले जब कभी कोई रसूल भेजा तो उसके पास ''वही'' भेजते रहे कि बस हमारे सिवा कोई माबूद क़ाबिले परसतिश नहीं तो मेरी इबादत किया करो
26وَقَالُوا اتَّخَذَ الرَّحْمَٰنُ وَلَدًا ۗ سُبْحَانَهُ ۚ بَلْ عِبَادٌ مُّكْرَمُونَ
और (अहले मक्का) कहते हैं कि खुदा ने (फरिश्तों को) अपनी औलाद (बेटियाँ) बना रखा है (हालाँकि) वह उससे पाक व पकीज़ा हैं बल्कि (वह फ़रिश्ते) (खुदा के) मोअज्ज़ि बन्दे हैं
27لَا يَسْبِقُونَهُ بِالْقَوْلِ وَهُم بِأَمْرِهِ يَعْمَلُونَ
ये लोग उसके सामने बढ़कर बोल नहीं सकते और ये लोग उसी के हुक्म पर चलते हैं
28يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلَا يَشْفَعُونَ إِلَّا لِمَنِ ارْتَضَىٰ وَهُم مِّنْ خَشْيَتِهِ مُشْفِقُونَ
जो कुछ उनके सामने है और जो कुछ उनके पीछे है (ग़रज़ सब कुछ) वह (खुदा) जानता है और ये लोग उस शख्स के सिवा जिससे खुदा राज़ी हो किसी की सिफारिश भी नहीं करते और ये लोग खुद उसके ख़ौफ से (हर वक्त) ड़रते रहते हैं
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अनुवाद — अल-अंबिया 26

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Tuesday, August 18, 2026

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